देश की राजनीति में जब कई मोर्चों पर खासा बवाल मचा हुआ है तो इसके समानान्तर भारत के गृहमन्त्री अमित शाह अपने लक्ष्य की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। यह लक्ष्य है 31 मार्च, 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त करना। इस दिशा में शाह के निर्देशन में विभिन्न नक्सल प्रभावित राज्यों की पुलिस और अर्धसैनिक सुरक्षा बल लगातार सफलता प्राप्त करते जा रहे हैं और एक के बाद एक शीर्षस्थ नक्सली व उनके नेता या तो मुठभेड़ाें में मारे जा रहे हैं अथवा शस्त्र त्याग कर आत्मसमर्पण कर रहे हैं। इसी क्रम में इस सप्ताह के शुरू में नक्सली समूहों को चलाने वाली प्रतिबन्धित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओ वादी) के सर्वोच्च शिखर नेताओं में से एक थिप्परी थिरूपति उर्फ देवुजी ने अपने 20 अन्य साथियों के साथ तेलंगाना में आत्मसमर्पण किया। देवु जी को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर एक करोड़ रुपए का इनाम था। देवुजी के आत्मसमर्पण के बाद देश में नक्सलवादी आन्दोलन द्वारा अपनी अंतिम सांसें गिनना लाजिमी माना जा रहा है, क्योंकि देवुजी जैसे नेता ही कई राज्यों में सक्रिय नक्सलियों को जरूरी वैचारिक शक्ति देकर उन्हें सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाते थे। शाह ने जब दो साल पहले यह कहा था कि वह देश से नक्सली आन्दोलन को समाप्त करने के लिए किसी भी प्रकार की बातचीत की प्रक्रिया के हिमायती नहीं हैं, क्योंकि यह विचारधारा ही भारतीय संविधान की स्थापित कानूनी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के पूर्णतः विरुद्ध है, तब उनके इस रुख का देश के कुछ खुद को उदार समझने वाले लाेकतान्त्रिक लोगों ने विरोध किया था और कहा था कि जनतन्त्र में संवाद के जरिये ही समस्याओं का हल ढूंढा जाता है। शाह ने तब इस मत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि संवाद केवल उन्हीं लोगों के बीच हो सकता है जो भारत की सुस्थापित संवैधानिक व्यवस्था में विश्वास रखते हों, जबकि नक्सली तो एक सिरे से संविधान की वैधता को नकारते हैं और बन्दूक की गोली व हिंसा के जरिये सत्ता को पलटने की वकालत करते हैं। अतः एेसे विचारों वाले लोगों से बातचीत का सांझा आधार क्या हो सकता है? इसीलिए शाह ने साफ किया कि नक्सलियों को या तो भारत की संवैधानिक सशस्त्र शक्तियों का मुकाबला करना होगा अथवा हथियार डालकर भारत की संवैधानिक सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा और संविधान के प्रति नतमस्तक होना होगा। अतः आज जो हम देख रहे हैं कि किस प्रकार नक्सली एक–एक करके आत्मसमर्पण करते जा रहे हैं वह सब अमित शाह के दृढ़ संकल्प का ही परिणाम है। देवुजी के आत्मसमर्पण के बाद अब प्रतिबन्धित माओवादी पार्टी का केवल एक शीर्ष नेता मिसिर बेसरा उर्फ सागर और बचा है, जबकि लक्ष्य अवधि पूरी होने में पूरा मार्च का महीना शेष है। इस पार्टी की सेंट्रल कमेटी में कभी 50 एेसे सदस्य हुआ करते थे जो विभिन्न प्रान्तों में नक्सली गतिविधियों के संचालन के लिए दिशा-निर्देश देते थे और नये नक्सलियों को भर्ती होने के लिए भी प्रेरित करते थे, परन्तु अब ये केवल पांच बचे हैं। पिछले दो वर्षों 2024 व 25 में पूरे देश में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ों में 520 के लगभग नक्सल आतंकवादी मारे जा चुके हैं। यह सबकुछ इसी वजह से हुआ भारत के गृहमन्त्री ने नक्सली मुद्दे पर अपने रुख में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं किया, जबकि उनसे पहले के गृहमन्त्री किसी न किसी स्तर पर लचीला रवैया अख्तियार कर लिया करते थे। 2004 से 2014 तक केन्द्र में चली मनमोहन सरकार के दौरान नक्सलियों को भटके हुए युवा माना जाता था और कहा जाता था कि ये एेसे भारतीय हैं जो किन्हीं कारणों से मार्ग भूल गये हैं, परन्तु यह सत्य नहीं था, क्योंकि इनका विश्वास भारत के उस संविधान में नहीं था जिसका मूलाधार ही अहिंसा है जबकि भारत की पूरी लोकतान्त्रिक प्रणाली ही अहिंसा पर टिकी हुई है। भारत के चुनावों में केवल वहीं राजनीतिक दल भाग ले सकता है, जो अहिंसक तरीकों से अपने विचारों के प्रचार–प्रसार में यकीन रखता हो। सत्ता में परिवर्तन केवल भारत के लोगों को ही अपने एक वोट की ताकत से करने का अधिकार है, जबकि नक्सली या माओवादी मानते हैं कि सत्ता परिवर्तन हिंसक तरीके अपनाने से किया जा सकता है। ये लोग हिंसा के जरिये समानान्तर सरकारें गठित करने में यकीन रखते हैं । अतः सवाल उठना लाजिमी था कि गांधी के देश में एेसी सोच के लोगों की क्या जगह हो सकती है? शाह ने इस सन्दर्भ में पिछली सभी सरकारों की लचीली सोच को तिलांजिली देते हुए जिस दृढ़ता के साथ गांधी वादी विचारों से उपजे संविधान की सत्ता को प्रश्रय दिया उसी का परिणाम है कि नक्सलियों के शार्षस्थ नेता आत्मसमर्पण कर रहे हैं। इसी नीति के चलते वर्ष 2024 से अब तक दो दर्जन से अधिक शीर्ष माओवादी नक्सली नेताओं को सशस्त्र बलों ने मुठभेड़ों में मार गिराया है, मगर मई 2025 में जब छत्तीसगढ़ में इस पार्टी के प्रमुख नाम्बला केशव राव को पुलिस मुठभेड़ में ढेर किया गया तो उसके बाद से नक्सल मोर्चे पर पूरा परिदृश्य बदना शुरू हुआ। इसके बाद बहुत से नक्सल शीर्ष नेताओं ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें इस पार्टी का वैचारिक मुखिया व पार्टी का पोलित ब्यूरो सदस्य मालोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ सोनू शामिल था। 2024 के दौरान ही अकेले छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों ने 219 नक्सलियों को ढेर कर दिया था। इनमें अधिकतम नक्सल कमाडों ही थे, मगर छह एेसे भी थे जिन्हें दंडकारण्य वन में गतिविधियां संचालन करने के लिए माओवादियों ने अधिकृत किया था। इसी प्रकार वर्ष 2025 में कुल 285 नक्सली ढेर किये गये। इस प्रकार 2026 के आते –आते नक्सलियों के खेमों में हवाइयां उड़ने लगी है और अब एेसी संभावना व्यक्त की जा रही है कि मार्च के महीने तक अपनी जान की खैर मनाते हुए सभी नक्सली पूरी तरह निष्क्रिय कर दिये जाएंगे। भारत ने इससे पहले चम्बल के डाकुओं का भी आत्मसमर्पण देखा है कि किस प्रकार वे आचार्य विनोभा भावे व समाजवादी नेता स्व. जयप्रकाश नारायण के समक्ष अपने हथियार डाल कर पुलिस को खुद को सौंप देते थे, मगर कुख्यात माओवादी जिस प्रकार आत्मसमर्पण कर रहे हैं उसका असली मन्तव्य यह है कि वे देश की एेसी सत्ता के समक्ष आत्मसमर्पण कर रहे हैं जिसे इस देश के लोगों ने ही चुनावों के माध्यम से चुना है, जबकि नक्सली चुनावों की अवधारणा को ही नकारते हैं अतः देश से नक्सली आन्दोलन का समाप्त होना लोकतन्त्र की महान विजय के रूप मंे ही निरूपित होगा जिसका श्रेय निश्चित रूप से अमित शाह को ही दिया जायेगा, क्योंकि वह अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहे।
शाह की दृढ़ प्रतिज्ञा और नक्सली आन्दोलन
Summary :
देश की राजनीति में जब कई मोर्चों पर खासा बवाल मचा हुआ है तो इसके समानान्तर भारत के गृहमन्त्री अमित शाह अपने लक्ष्य की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। यह लक्ष्य है 31 मार्च, 2026 तक भारत को नक्सल मुक्त करना। इस दिशा में शाह के निर्देशन में विभिन्न नक्सल प्रभावित राज्यों की पुलिस और अर्धसैनिक सुरक्षा बल लगातार सफलता प्राप्त करते जा रहे हैं और एक के बाद एक शीर्षस्थ नक्सली व उनके नेता या तो मुठभेड़ाें में मारे जा रहे हैं अथवा शस्त्र त्याग कर आत्मसमर्पण कर रहे हैं। इसी क्रम में इस सप्ताह के शुरू में…


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