ईसाई बन रहे सिख, लोगों को बरगला रहीं मिशनरियां

Summary :

हाल ही में, मैं पंजाब में बदलते घटनाक्रमों से संबंधित समाचार देख रहा था। अचानक, मैं कुछ मीडिया हाउसों द्वारा सिख-सामाजिक स्तरीकरण को वर्णित करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे नए शब्दों से आकर्षित हुआ। नया शब्द जो चर्चा में था वह था ‘दलित-सिख’। यह मुझे चकित कर गया क्योंकि हमारे भारत में जिन सिख गुरुओं को हम अपने पूजनीय गुरु मानते हैं, उनकी शिक्षाओं के अनुसार सिख धर्म जाति व्यवस्था या किसी भी सामाजिक असमानता को न तो मानता है और न ही उसका पालन करता है। दिलचस्प बात यह है कि सिख धर्म की स्थापना का मूल…

हाल ही में, मैं पंजाब में बदलते घटनाक्रमों से संबंधित समाचार देख रहा था। अचानक, मैं कुछ मीडिया हाउसों द्वारा सिख-सामाजिक स्तरीकरण को वर्णित करने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे नए शब्दों से आकर्षित हुआ। नया शब्द जो चर्चा में था वह था ‘दलित-सिख’। यह मुझे चकित कर गया क्योंकि हमारे भारत में जिन सिख गुरुओं को हम अपने पूजनीय गुरु मानते हैं, उनकी शिक्षाओं के अनुसार सिख धर्म जाति व्यवस्था या किसी भी सामाजिक असमानता को न तो मानता है और न ही उसका पालन करता है। दिलचस्प बात यह है कि सिख धर्म की स्थापना का मूल आधार ही सामाजिक समानता, समतावाद और भेदभाव का विरोध था। तो फिर दलित-सिख कौन है? इस शब्द का क्या अर्थ है?
पंजाब भारत का एकमात्र सिख-बहुल राज्य है। हाल के वर्षों में विशेष रूप से पिछले एक दशक में सिख धर्म एक संकट का सामना कर रहा है। यह संकट सिख धर्म की स्थापना के बाद से अब तक का सबसे गंभीर संकट है। सिखी, जो समानता और खालसा (पवित्रता) का प्रतीक है, खतरे में है। इस समय सिखी को दो प्रकार के खतरे हैं। ये दोनों खतरे आपस में जुड़े हुए हैं और उन मूल्यों के क्षरण के कारण उत्पन हो रहे हैं जिनके लिए सिख धर्म की स्थापना हुई थी और जिनके लिए वह खड़ा रहा। यदि हम बाहरी खतरे का विश्लेषण करें तो हमें भीतर के खतरे की स्पष्ट समझ मिल जाएगी जो बाहरी खतरे को जन्म दे रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार सिख धर्म का पालन 1.6 करोड़ लोग करते हैं जो पंजाब की कुल आबादी का 57.69% हैं। पंजाब के जिलों में तरनतारन में सिख आबादी का प्रतिशत सबसे अधिक 93.33% है, इसके बाद मोगा (82.24%) और बरनाला (78.54%) हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार पंजाब की आबादी में सिखों की हिस्सेदारी 59.9% थी जबकि ईसाइयों की संख्या मात्र 1.2% थी। 2011 तक सिख आबादी में उल्लेखनीय गिरावट आकर यह 57.69% रह गई, जबकि ईसाई धर्म मानने वालों का अनुपात बढ़कर 1.26% हो गया।जब मैंने आंकड़ों और तथ्यों की और गहराई से जांच की तो पंजाब राज्य के धार्मिक-जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल में हाल के बदलाव को देखकर मैं विचलित हो गया, जिसमें राज्य में ईसाइयों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ईसाई मिशनरियों के मुख्य लक्ष्य सिख समाज के निचले वर्ग और स्तर से जुड़े लोग तथा दलित-सिख हैं। पंजाब में ईसाई धर्म के इतिहास का पता लगाने पर कई समकालीन इतिहासकारों का मत है कि 18वीं से 20वीं सदी के दौरान पंजाब में ईसाई मिशनरी बहुत अधिक लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने में सफल नहीं हो सके, क्योंकि पंजाब बहुत देर से ब्रिटिश साम्राज्य के दायरे में आया था जिससे इस कार्य को सुगमता मिलती। लगभग दो दशक पहले तक पंजाब में ईसाई समुदाय मुख्यतः हिंदू समुदाय कन्वर्ट हुए लोगों का था। लेकिन हाल के समय में एक नया और स्पष्ट प्रवाह दिखाई दे रहा है, जिसमें विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के सिख समाज के निचले वर्गों का बड़े पैमाने पर ईसाई धर्म में सामूहिक धर्मांतरण हो रहा है। हजारों लोगों ने अपनी पुरानी आस्था सिख धर्म को छोड़कर ईसाई धर्म अपना लिया है। इतना ही नहीं इस सीमावर्ती राज्य की जनसांख्यिकी बहुत तेजी से बदल रही है। इस तीव्र और संभवतः अपरिवर्तनीय कन्वर्जन का मुख्य और सबसे प्रमुख कारण सिख धर्म के भीतर प्रचलित जाति आधारित असमानताएं हैं। सिख गुरुओं ने एक ऐसे जातिविहीन समाज की बात की थी जहां सभी को समान रूप से माना जाए और जाति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो। इसका उदाहरण लंगर (सामुदायिक रसोई) और गुरुद्वारा की परंपरा से देखा जा सकता है, जो सभी के लिए खुले हैं। पवित्र हरमंदिर साहिब के चार द्वार इस दर्शन का प्रतीक हैं कि यह चारों वर्णों के लिए खुला है।लेकिन वास्तविकता इससे बहुत अलग है। दलित सिख भेदभाव का शिकार हैं।
पंजाब के लगभग हर शहरी और ग्रामीण क्षेत्र में इन सामाजिक जातियों के लिए अलग गुरुद्वारे और अलग श्मशान स्थल हैं। वर्तमान समय के सिख सामुदायिक नेता, सामाजिक प्रभावक और धार्मिक उपदेशक, गुरुओं द्वारा कल्पित ऐसे समाज को बढ़ावा देने और विकसित करने में असफल रहे हैं। जबकि ये जाति आधारित भेदभाव व्यापक रूप से जारी हैं, सिख बुद्धिजीवी और नेता अपनी राजनीतिक और भौतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में व्यस्त हैं।निम्न जाति के सिखों के मोहभंग का एक और कारण यह है कि उनके अलगाव को दूर करने के लिए कोई धार्मिक या सामाजिक व्यवस्था नहीं है। वे आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से निचले स्तर पर हैं। यदि उनमें से कुछ लोग आर्थिक रूप से ऊपर उठ भी जाते हैं, तो भी उन्हें सिख समाज के उच्च जाति समूहों से सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती। इसलिए वे मिशनरियों द्वारा फैलाए गए कन्वर्जन के जाल में आसानी से फंस जाते हैं।पंजाब में सिखों के इस चिंताजनक धर्मांतरण का एक अन्य प्रमुख कारण सिख धार्मिक-सामाजिक संस्थानों के स्तर और प्रतिष्ठा में आई गिरावट है। इस दिशा में नेतृत्व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी को करना था, जिसे सिख धर्म की सर्वोच्च धार्मिक-प्रशासनिक संस्था माना जाता है। एसजीपीसी ने धार्मिक सिद्धांतों के प्रसार पर भी अपना ध्यान खो दिया है और अपने मूल कार्यक्षेत्र से भटक गई है। एसजीपीसी के कुल बजट का बहुत ही कम हिस्सा सिख धार्मिक और आध्यात्मिक विचारों के प्रसार पर खर्च किया जाता है, जो कि उसका मुख्य कार्य है। एक अन्य कारण यह है कि सिख बुद्धिजीवियों और अनुयायियों के मन में यह गलत धारणा बैठ गई है कि सिख धर्म के अस्तित्व के लिए हिंदू धर्म खतरा है, जबकि वास्तविक खतरा यह धर्मांतरण है।
वास्तव में हिंदू और सिख दोनों के सामने एक समान खतरा है। इसलिए मुख्य कारण पर प्रहार करने के बजाय ध्यान भटकाने के लिए इस कारण का बहाना बनाया जाता है।इन चिंताजनक धर्मांतरणों का एक अन्य कारण ईसाई मिशनरियों का उत्साह है। वे अपने प्रभाव को फैलाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हैं।
इन भोले-भाले लेकिन अलग-थलग पड़े लोगों को आकर्षित करने का एक तरीका यह है कि उन्हें यह वादा किया जाता है कि ईसाई बनने से उन्हें कनाडा, इंग्लैंड और अमेरिका का वीजा मिल सकता है। वे अशिक्षित और दिव्यांग लोगों को यह विश्वास दिलाकर बपतिस्मा दिलाते हैं कि ईश्वर उनकी पीड़ा और कष्ट दूर कर देगा। दूसरा तरीका यह है कि उन्हें विभिन्न प्रकार के लाभ दिए जाते हैं जैसे मिशनरी अस्पतालों में मुफ्त चिकित्सा सुविधा, मुफ्त शिक्षा, पुरानी बीमारियों का उपचार और अन्य आर्थिक लाभ आदि।
पूरे राज्य में, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में, हर जगह चर्च बनाए जा रहे हैं। उन्हें गुरुद्वारों के आकार के अनुरूप बनाया जाता है और ईसाई भजन “कीर्तन” (पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब के संगीतमय पाठ) के रूप में गाए जाते हैं। इतना ही नहीं, 21 नवंबर 2019 को लुधियाना के सर्किट हाउस में पंजाब के पादरी संघों की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि राज्य में ईसाइयों के हितों के लिए एक सर्वोच्च संस्था ‘शिरोमणि चर्च प्रबंधक कमेटी (एससीपीसी)’ बनाई जाएगी। पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है और सिख धर्म की जन्मभूमि भी है। यहां के धार्मिक-जनसांख्यिकीय स्वरूप पर कोई भी खतरा भारत की सुरक्षा पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
सिख धार्मिक नेताओं को इस संकट को पहचानना और स्वीकार करना चाहिए तथा इसके विरुद्ध संघर्ष करने के लिए कार्य करना चाहिए।

Shera Rajput