छोटी पार्टियों का भाजपा में विलय होगा!

‘लड़ना है, भिड़ना है, नहीं डरना है, जुगनुओं ने भी सिर पर कफ़न बांध लिया है
अंधेरों के हाथ तो कानून से भी लंबे हैं, उसने भी तो सबके गिरेबां झांक लिया है’
अपनी उद्दात सियासी महत्त्वाकांक्षाओं के जोश से लबरेज़ भाजपा के अश्वमेध का घोड़ा अपनी दुल्की चाल से कश्मीर से कन्याकुमारी तक की दूरी नापने को बेकरार है। सच पूछिए तो देश की यह सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी पूरे भारतवर्ष में उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से ​पश्चिम तक अपना एक ‘पैन इंडिया फुट प्रिंट’ बनाना चाहती है, यह फुट प्रिंट ठीक वैसा ही है जिस पर खड़े होकर कांग्रेस पार्टी ने आजादी प्राप्त होने के इतने वर्षों बाद तक पूरे देश में अपना भौकाल कायम कर रखा था। भाजपा शीर्ष से जुड़े विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि आने वाले 2029 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ‘सोलो’ ही मैदान में जाना चाहती है, सहयोगी पार्टियों की बैसाखियों पर इसको इतना ऐतबार नहीं रह गया है, 2029 के लिए भाजपा ने अभी से 400 सीटों का अपना लक्ष्य तय कर लिया है, वह भी सिर्फ अपने दम पर। सूत्रों की माने तो पिछले दिनों इसी मुद्दे को लेकर भाजपा रणनीतिकारों की एक अहम बैठक ​िदल्ली में आहूत थी, इस बैठक में पीयूष गोयल से लेकर बीएल संतोष तक की उपस्थिति दर्ज हुई। इस बैठक के कुछ रोज पहले ही पीयूष गोयल चेन्नई में थे, बताया जाता है वहां उनकी दो नेताओं से बैठक पहले से तय थी, इसमें से एक थे जी.के. मूपनार के पुत्र जी.के. वासन जो तमिल मनीला कांग्रेस के अध्यक्ष हैं, दूसरे एएमएमए (अम्मा मक्काल मुनेत्रकषगम)के टीटीवी दिनाकरण थे, समझा जाता है कि इन दोनों नेताओं के समक्ष भी पीयूष गोयल ने भाजपा में शामिल होने का और अपनी पार्टियों को भाजपा में विलय करने का प्रस्ताव रखा। विलय तो नहीं पर दिनाकरण ने एनडीए में शामिल होने पर सहमति दे दी। वहीं जी.के. वासन अभी भी किंचित असमंजस में हैं, उनका मत है कि तमिलनाडु की द्रविड़ राजनीति की पूरी तासीर भाजपा व हिंदी विरोध की आंच में पक कर तैयार हुई है, सीधे भाजपा में जाने का फैसला आत्मघाती हो सकता है, सो भाजपा-एनडीए से बाहर रह कर ही अपनी राजनीति सलामत रखी जा सकती है। अभी केंद्र की सरकार भले ही चंद्रबाबू नायडू के समर्थन पर टिकी हो पर भाजपा नायडू की जायज-नाजायज मांगों की फेहरिस्त से परेशान हैं, सो आंध्र में भाजपा रणनीतिकारों ने पवन कल्याण से बात की है, 54 वर्षीय पवन जनसेना पार्टी के प्रमुख हैं और फिलवक्त आंध्र के डिप्टी सीएम भी हैं। समझा जाता है कि भाजपा रणनीतिकारों ने पवन कल्याण से कहा है कि वह अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर दें और राज्य में भाजपा का चेहरा बन कर चुनाव में जाएं जिससे कि चंद्रबाबू और जगन मोहन रेड्डी दोनों को शिकस्त दी जा सके। सूत्रों की मानें तो पवन से यह भी कहा गया है कि इस कार्य को अंजाम देने में वे पैसों की चिंता बिल्कुल न करें, इसकी व्यवस्था कर दी जाएगी।
शिंदे की फिक्र जाती नहीं
जब इस बार बीएमसी चुनाव में अपने चुने हुए 29 नगर सेवकों को उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने मुंबई के बांद्रा स्थित एक होटल में सिर्फ अपनी पहुंच के दायरे में कैद कर लिया तो भाजपा की पेशानियों पर बल पड़ गए। वैसे भी अब महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़णवीस बनाम शिंदे की अघोषित जंग सड़कों पर उतर आई है। इस बार महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में भाजपा का शानदार प्रदर्शन रहा है, इसके बाद से फडणवीस के हौसले कुछ ज्यादा ही बम-बम हैं, समझा जाता है कि पार्टी शीर्ष के समक्ष फड़णवीस ने दावा किया है कि ’2029 के चुनाव में भाजपा अपने दम पर यहां 35 लोकसभा सीट जीत सकती है, इसके लिए उसे शिंदे या अजित किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है।’ हां विधानसभा चुनाव में जरूर फडणवीस अजित पवार की पार्टी के लिए पश्चिम महाराष्ट्र की 25-30 सीटें छोड़ने को तैयार हैं। वहीं एकनाथ शिंदे से कहा गया है कि ‘वे अपनी पार्टी का विलय भाजपा में कर दें’, शिंदे इसके लिए कतई तैयार नहीं हैं, उनका कहना है कि ‘अगर एक बार उन्होंने अपनी पार्टी भाजपा में ‘मर्ज’ कर दी तो उनकी पार्टी का मराठी मानुष के बेस पर उद्धव ​िशवसेना का फिर से कब्जा हो जाएगा, बमुश्किल उन्होंने मराठी मानुष की नज़र में अपनी पार्टी को बाला साहेब की असली उत्तराधिकारी साबित करने की जंग लड़ी है।’ यही कारण है कि इस बार के निकाय चुनाव में शिंदे ने अपना पूरा दम लगाया, उन्होंने इसमें पैसे भी खूब झोंके और ग्रास रूट पर अपने पार्टी संगठन को मजबूती देने में जोर लगाया है। सो, शिंदे को नाथ पाना भाजपा के लिए किंचित इतना आसान नहीं रहेगा।
कब बनेगी नितिन की नबीन टीम?
भाजपा की पहले योजना थी कि नए अध्यक्ष की ताजपोशी के मौके को बेहद खास बनाया जाए। पर बाद में पद ग्रहण सादगी से सम्पन्न हुआ। खुद नवनिर्वाचित अध्यक्ष चाहते हैं कि ‘उनकी टीम की जल्द से जल्द घोषणा हो जाए और यह काम आने वाले फरवरी माह में ही संपन्न हो जाए।’ वहीं भाजपा नेतृत्व की राय इससे दीगर है, वे चाहते हैं आने वाले विधानसभा चुनावों की समाप्ति के बाद यानी केरल, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी, बंगाल व असम चुनावों के बाद ही नबीन की नई टीम की घोषणा हो। जब तक मोदी सरकार 3.0 भी अपने कार्यकाल के दो साल पूरे कर लेगी तो पार्टी संगठन व केंद्रीय मंत्रिमंडल में साथ-साथ बदलाव किया जा सकता है। कुछ सीनियर लोगों की संगठन से सरकार और सरकार से संगठन में अदला-बदली भी हो सकती है। पार्टी नेताओं में भी इन पांच राज्यों के चुनाव में काम करने का जोश बना रहेगा, क्योंकि उनके मन के किसी कोने में यह आशा जीवित रहेगी कि उन्हें चुनाव में अच्छा कार्य करने का पुरस्कार मिल सकता है।
विनोद तावड़े को नई जिम्मेदारी तो कइयों की छुट्टी तय
इस बात को लेकर अभी अटकलें तेज हैं कि आखिरकार टीम नवीन का चेहरा कैसा होगा? यह परंपरागत होगा यानी युवा व अनुभवी चेहरों का मिश्रण या फिर 60 साल से कम उम्र वाला, जैसा कि नितिन स्वयं चाहते हैं, वे अपनी युवा टीम बनाना चाहते हैं, क्योंकि वे खुद भी अभी मात्र 45 साल के ही हैं। सूत्रों की मानें तो नबीन की महासचिवों की टीम से 3-4 चेहरों की छुट्टी हो सकती है, जिनके रूखसती के चर्चे हैं, वे हैं-तरूण चुग (इन्हें जेपी नड्डा अपनी पसंद से लेकर आए थे), अरूण सिंह, दुष्यंत गौतम और रामदास अग्रवाल। वहीं विनोद तावड़े और सुनील बंसल की गद्दी सलामत रह सकती है। बीएल संतोष के बारे में कहा जा रहा है कि वे 29 के चुनाव तक संगठन महामंत्री बने रहेंगे, क्योंकि दोनों भाजपा शीर्ष से उनका सामंजस्य बहुत अच्छा है। राम माधव जम्मू-कश्मीर, पूर्वोत्तर और विदेश नीति पर फिर से पीएम को सलाह देने के काम में बहाल होना चाहते हैं। चर्चे हैं कि नितिन नबीन की नई टीम में राम माधव को महासचिव या उपाध्यक्ष के तौर पर एक महती जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इसी प्रकार बिहार चुनाव में अच्छा काम करने के ईनाम के तौर पर विनोद तावड़े को केरल चुनाव का प्रभारी बनाया गया है और आशीष शेलार को तेलांगना के स्थानीय निकाय चुनाव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। ये दोनों ही नबीन की नई टीम में अहम जिम्मेदारियां हासिल करने के दावेदार हैं।
…और अंत में
ज्यों-ज्यों बंगाल चुनाव की घड़ी करीब आती जा रही है, शुभेन्दु अधिकारी की पेशानियों पर बल गहराते जा रहे हैं। पिछले दिनों अधिकारी ने अपने चार करीबी बंगाल के सांसदों को भाजपा चाणक्य से मिलने भेजा। इन सबने हाईकमान से समवेत स्वरों में गुहार लगाई-‘यदि बंगाल में आप पार्टी का कोई सीएम फेस प्रोजेक्ट नहीं करेंगे तो हमारे लिए वहां चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा।’ शाह मुस्कुराए और बोले, ‘भाजपा की नीति किसी राज्य में सीएम फेस प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ने की है ही नहीं, हम माननीय मोदी जी के चेहरे पर ही हर जगह चुनाव लड़ते हैं और जीतते हैं।’ इस पर एक सांसद ने कहा-‘हम यूपी में तो योगी जी के चेहरे पर चुनाव लड़े और जीते।’ कुछ पल चुप रह कर शाह ने उन चारों सांसदों से पूछ ही लिया-‘मान लीजिए हम बंगाल में कोई चेहरा प्रोजेक्ट करने को राजी हैं, तो कोई क्लीन इमेज वाला चेहरा है भी हमारे पास?’ अब इन चारों से शुभेंदु का नाम लेते नहीं बना, वे उल्टे पांव घर को लौट आए।

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