मोबाइल फोन और ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों और युवाओं के लिए गंभीर समस्या बन चुकी है। जिस तकनीक को शिक्षा की जानकारी का सशक्त माध्यम माना गया था, वही अब बच्चों की मानसिक और शारीरिक हैल्थ के लिए खतरा बन रही है। पबजी और ब्लू व्हेल के बाद अब कोरियन गेम बच्चों तथा युवाओं की जान ले रही है। अत्यधिक मोबाइल और गेमिंग का उपयोग बच्चों के व्यवहार, सोच और सांस्कृतिक जीवन पर गहरा नकारात्मक असर डाल रहा है। हालत यह है कि बच्चे, किशोर और युवा आत्महत्या जैसे कदम उठाने लगे हैं तो कारण गेमिंग की लत ही है। विशेषज्ञ इस गेमिंग के चस्के को मीठा जहर करार दे रहे हैं और बच्चों को बचाने की चेतावनी दे रहे हैं। गाजियाबाद की सोसायटी में ऑनलाइन गेमिंग की लत का शिकार हुई तीन बहनों निशिका, प्राची और पाखी ने जिस तरह 9वीं मंजिल से कूदकर जान दी यह एक चौका देने वाला वाकया है और हमें चेतावनी दे रहा है कि बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग के साथ-साथ मोबाइल की लत मत लगने दें। मेरा यह भी मानना है कि युवाओं की अस्वाभाविक मौतें नहीं होनी चाहिए। जैसा िक पहले नोएडा में सड़क पर गड्ढे में गिरकर एक इंजीनियर युवराज की मौत हुई। अब ताजा वाकया जनकपुरी में एक बैंक मैनेजर की गड्ढे में िगरकर हुई दर्दनाक मौत का है। ऐसी घटनाएं नहीं होनी चाहिए। राज्य सरकरों व प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा।
ये तीनों बहनें जिस कोरियाई गेम की दिवानी रही, क्यों कोरियन गेम उनको जान से भी प्यारी बन गयी, यह सब इन बच्चियों के 8 पन्नों का सुसाइड नोट सब कुछ बयान करता है। बच्चों को करोना अवधि अर्थात 2019-20 में भी मोबाइल की लत थी। देखते ही देखते वे तीनों बहनें सोते-जागते एक ही मोबाइल से कोरियन ऑनलाइन गेम खेला करती थी। इसके प्रति बढ़ते क्रेज ने उन्हें क्रेजी कर दिया। वे अपने आपको कोरियाई समझने लगी। विशेषज्ञ बताते हैं कि गेमिंग ऐप में बच्चे किसी भी मामले में जब कुछ टॉस्क करते हैं तो वे अपने आपको वैसा ही समझते हैं जो टास्क उनको दिया जाता है। अपने आपको बहुत एक्सपर्ट मानना या जो गेम हमने खेली उसे कोई जीत नहीं सकता, केवल हम ही जीत सकते हैं, यह सोच बच्चों में पागलपन की हद तक बैठी हुई है। हम ऐसे भावनात्मक समर्थन को सही नहीं ठहरा सकते लेकिन बच्चे में परिवर्तन आ रहे हैं तो इसे ध्यान में रखकर सतर्क जरूर होना चाहिए। ये तीन बच्चियां तो चली गयी लेकिन आज भी भाई-बहन या साधारण और हाईफाई घरों के बच्चे सैकड़ों ऑनलाइन गेमिंग के दिवाने हैं। माता-पिता को उन पर नजर तो रखनी ही चाहिए लेकिन उन्हें समझाने-बुझाने का कोई ठोस तरीका अपनाना चाहिए और यह सब एकदम प्रेम से होना चाहिए। आज गेमिंग को बच्चे मनोरंजक तकनीक मानकर खेल रहे हैं। वे इस लत की दिशा में चल पड़े हैं जिसके परिणाम बड़े घातक निकल रहे हैं। हालांकि बच्चों की सुसाइड का कारण बच्चों द्वारा लिखे पत्र में बताया गया है लेकिन इस ऑनलाइन गेमिंग को कंट्रोल करने के लिए माता-पिता कुछ और विकल्प ढूंढ सकते हैं। मैं ये सब बातें सोशल मीडिया के आधार पर जो लोग शेयर कर रहे हैं उसी के अनुरूप बोल रही हूं।
ऑनलाइन गेमिंग के तौर-तरीके बच्चों में लत पैदा करते हैं। उन्हें ज्यादा से ज्यादा टॉस्क देकर विजेता बनने के लिए प्रलोभन दिये जाते हैं और उसकी तुलना कभी किसी कोरियाई स्टार से की जाती है जो कभी फ्रांस के सुंदर युवक-युवती से या फिर ब्रिटेन के गौरे चिट्टे बच्चों से की जाती है। यह फंटेसी बच्चों को एक आकर्षण तो लगती है लेकिन वैसा बनने की चाहत के आगे कोई कुछ नहीं कर सकता। मैं जब इससे पहले कई बार ऑनलाइन गेमिंग और रील मेकिंग को लेकर कितने ही बच्चों के साथ हुए हादसों का जिक्र करती थी तो हैरान होती थी कि कहीं आगे चलकर यह मामला और खराब न हो जाए लेकिन दु:ख के साथ लिखना पड़ रहा है कि हम इस दिशा में कोई हल नहीं ढूंढ पा रहे। मुझे याद है जब हम रामायण, श्रीमद्भगवत गीता पढ़ते थे या फिर सन् 1980 के दौर में टीवी पर रामायण और महाभारत धारावाहिक का दौर चला तो भगवान की लीलाओं और उनके प्रेरक प्रसंगों को देखकर हम उनसे शिक्षा लेते थे जो आगे चलकर संस्कार बन गए। बाद में इन सीरियल की तर्ज पर कॉमिक्स भी बनें और वे भी बहुत प्रेरणादायी थे लेकिन यह दौर इतनी जल्दी चला जायेगा और इतनी जल्दी टेक्रोलॉजी आ जायेगी, यह हमने नहीं सोचा था। अब टेक्रोलॉजी आ ही गयी है तो नई पीढ़ी इस पर अपना हक समझती है लेकिन इस टेक्रोलॉजी का प्रयोग करने के तौर- तरीके और कंट्रोल करने के लिए भी कुछ करना ही होगा। मेरी कितनी ही एक्सपर्ट्स से बात होती है कुछ लोग मुझसे विचार पूछते हैं तो मेरा यही कहना है कि ऑनलाइन गेमिंग की लत बच्चों की मानसिकता को बदल डालती है। वे भावनात्मक रूप से एक ऐसी अलग दुनिया में खुद को ले जाते हैं कि जहां उन्हें आनंद ही आनंद इस गेम में मिलता है। उनका खाना-पीना उनकी नींद, उनकी पढ़ाई सब खत्म हो जाता है। आपस में बातचीत भी इसी ऑनलाइन गेमिंग पर होती है। वक्त आ गया है कि इसके लिए सबको मिलकर कुछ करना होगा। बच्चे सबके साझे हैं लेकिन देश का भविष्य भी हैं, लिहाजा कुछ करना ही होगा ताकि फिर गाजियाबाद जैसा कांड न हो पाए।


















