अमेरिका से कृषि आयात !

भारत और अमेरिका के बीच हो रहे व्यापार समझौते पर दोनों देशों की ओर से जारी संयुक्त वक्तव्य से स्पष्ट हो गया है कि देश की मोदी सरकार ने अपने कृषि क्षेत्र और किसानों के हितों को पूरी तरह संरक्षित किया है और अमेरिका में भारतीय कृषि जन्य उत्पादों के निर्यात को नई ऊंचाई पर पहुंचाने की गरज से इनमें से कई पर अमेरिका को शून्य शुल्क दर लगाने पर भी मना लिया है। इस प्रकार भारत में इस करार को लेकर विपक्ष व कुछ अन्य क्षेत्रों द्वारा जो आशंका जताई जा रही थी वह पूर्ण रूपेण निर्मूल साबित हुई है जिसके लिए वाणिज्यमन्त्री पीयूष गोयल व मोदी सरकार बधाई की पात्र है। इसके साथ ही संयुक्त वक्तव्य में घोषणा की गई है कि भारत अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए अपने बाजार नहीं खोलेगा तथा लघु व मध्यम क्षेत्र में उत्पादित होकर अमेरिका में निर्यात होने वाले कुछ उत्पादों पर भी अमेरिका शुल्क दर शून्य रखेगा।
कृषि के क्षेत्र में केवल पशुचारे के एेसे आयात को खोला गया है जिसकी भारत के बाजार में मांग है और उससे भारतीय किसानों को लाभ हो सकता है। जहां तक दोनों देशों के बीच 500 अरब डाॅलर के अमेरिकी निर्यात कारोबार का लक्ष्य है तो इसे अगले पांच वर्षों में बढ़ाकर इस सीमा तक किये जाने का लक्ष्य रखा गया है। वाणिज्यिक करार में भारत अमेरिका से एेसी शुल्क छूट लेने में कामयाब रहा है जिससे भारत का निर्यात कारोबार लगातार बढ़ता रहे। विशेषकर कृषि क्षेत्र में भारत के निर्यात कारोबार को इस समझौते के बाद नई गति मिल सकती है। भारत के किसानों को इस समझौते के बाद सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि उनकी कृषि उपजों का घरेलू बाजार में भाव नीचे नहीं गिरेगा और दूसरी तरफ भारतीय उपभोक्ताओं को भी लाभ मिलेगा तथा एेसी वस्तुओं की भारत में सप्लाई बढे़गी जिनका उत्पादन भारत में कम होता है।
वैसे अभी विभिन्न उत्पादों की सिलसिलेवार सूची तैयार होने में कुछ समय और लगेगा मगर करार को लेकर देश के कृषि क्षेत्र में जो आशंकाएं फैलाई जा रही थीं उन पर पानी फिर गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि बिना समझौता हुए भी दोनों देशों के बीच कृषि उत्पादों के आयात-निर्यात कारोबार में पिछले कुछ वर्षों से वृद्धि हो रही है और अमेरिका का निर्यात अपेक्षाकृत रूप से बढ़ रहा है। हालांकि भारत-अमेरिका को अपने कृषि उत्पादों का निर्यात अमेरिका से आयात किये जाने के मुकाबले अधिक कर रहा है। इसकी मूल वजह यह है कि समझौते की घोषणा करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह लिखा कि अमेरिका भारत को अब 500 अरब डाॅलर की मूल्य की विभिन्न वस्तुओं का निर्यात करेगा और इनमें कृषि उत्पादों का क्षेत्र भी खोल दिया जायेगा। ट्रम्प के इस कथन में केवल इतनी ही सच्चाई थी कि दोनों देशों के बीच में घोषित प्रतिस्पर्धी नई शुल्क दर 18 प्रतिशत के बाद आपसी कारोबार में वृद्धि होगी। दूसरी ओर भारत के वाणिज्यमन्त्री श्री पीयूष गोयल ने विश्वास व्यक्त किया था कि भारत अपने कृषि व डेयरी उद्योग के हितों को पूरी तरह संरक्षित रखते हुए ही व्यापार समझौते को अन्तिम रूप देगा।
भारत अमेरिका से जिन कृषि जन्य उत्पादों का आयात करता है उनमें सूखे मेवे जैसे बादाम, पिस्ता, अखरोट के अलावा इथनोल, कपास व सोयाबीन तेल मुख्य रूप से शामिल है। जबकि भारत से अमेरिका को निर्यात किये जाने वाले उत्पादों में समुद्री खाद्य (मछलियां) मसाले, चावल, संसाधित फल व सब्जियां, बेक्ड फूड, आवश्यक तेल, चीनी, वनस्पति तेल व तैयार खाद्य (प्रिपेयर्ड फूड) शामिल हैं। भारत ने वर्ष 2025 के दौरान अमेरिका को कुल 591 करोड़ 41 लाख डाॅलर मूल्य की कृषि वस्तुओं का निर्यात किया जबकि इसका आयात केवल 285 करोड़ 37 लाख करोड़ डाॅलर का रहा। इससे यह नतीजा निकलता है कि कृषि कारोबार खाता भारत के पक्ष में है। बेशक अमेरिका चाहता था कि भारत इथनाल जैसे उत्पाद का आयात अपने पेट्रोलियम क्षेत्र के लिए भी खोले, जिससे इसका उपयोग पेट्रोल मिश्रण में हो सके क्योंकि भारत अभी तक इथनाल का आयात केवल औद्योगिक जरूरतों के लिए ही करता है। अमेरिका में इथनाल का उत्पादन मक्का से होता है और वहां पर मक्का का उत्पादन बहुत अधिक होता है। इसकी पैदावार भी अमेरिका में प्रति हैक्टेयर के हिसाब से पूरी दुनिया में सर्वाधिक है जबकि भारत में भी इथनाल का उत्पादन कृषिजन्य कच्चे माल जैसे गन्ना व चावल भूसी व मक्का से होता है।
अतः भारत को अपने इस क्षेत्र को संरक्षित रखना था और करार में एेसा ही हुआ। इथनाल का केवल एक उदाहरण है जो हमें यह बताता है कि भारत ने किस प्रकार अपने कृषि क्षेत्र को संरक्षित रखा। कृषि कारोबार के क्षेत्र में हमें यह ध्यान रखना होगा कि भारत में प्रति हैक्टेयर फसल उत्पादन अमेरिका के मुकाबले आज भी बहुत कम है। अतः अपने किसानों के हितों के संरक्षण के लिए हमें एेसे कदम उठाने होंगे कि घरेलू बाजार में उनकी उपज के दाम हर हालत में लाभप्रद बने रहें। इसी प्रकार हमें डेयरी उद्योग को भी देखना होगा। अमेरिका में गायों को मांसाहरी (समिष) भोजन भी दिया जाता है और उनसे दुग्ध उत्पादन सस्ते में किया जाता है जबकि भारत में प्रतिलीटर दूध उत्पादन की लागत अधिक आती है। इसके बावजूद भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश बन चुका है। अतः समझौते में अमेरिकी डेयरी उत्पादों का भारत में प्रवेश निषेध होगा।
दरअसल व्यापार समझौता इस प्रकार होना चाहिए जिससे भारत के किसानों की उपज के मूल्य घरेलू बाजार में किसी भी रूप में अमेरिकी सामान से कम न रह सकें। इस मामले में कृषि मन्त्री श्री शिवराज सिंह ने भी कहा है कि भारतीय किसानों के हित सर्वाधिकार सुरक्षित रहेंगे और इन पर किसी प्रकार की आंच नहीं आने दी जायेगी। परन्तु भारत में अमेरिकी कपास की आवक में भी वृद्धि हुई है। विगत अगस्त महीने से दिसम्बर महीने तक भारत सरकार ने जीरो शुल्क दर पर अमेरिकी कपास के आयात की अनुमति दी थी। मगर 1 जनवरी 26 से यह शुल्क दर 11 प्रतिशत कर दी गई। यही स्थिति सोयाबीन तेल में भी रही हालांकि इसमें शुल्क ढांचा दूसरा था। इस मामले में अमेरिकी राजनेताओं के वक्तव्य भारत में चिन्ता पैदा कर रहे थे क्योंकि वे कह रहे हैं कि समझौता होने के बाद भारत का बहुत बड़ा बाजार अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खुल जायेगा और इस मद में दोनों देशों के बीच हो रहा कारोबार अन्ततः अमेरिका के घाटे को पाट देगा। मगर संयुक्त वक्तव्य में इन सभी आशंकाओं को निर्मूल सिद्ध कर दिया है।

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