बात दिल्ली के बहावलपुर-हाउस या पंजाब-हरियाणा में स्थापित बहावलपुर-भवनों तक सीमित नहीं, न ही यह किस्सा वर्तमान पाक के बहावलपुर तक सीमित है। अब इतिहास के कुछ अनूठे पृष्ठ भी खुले हैं। इन्हें गर्व है अपनी संस्कृति, अपनी मां-बोली और अतीत की धर्मनिरपेक्ष जिंदगी पर। एक समय था इनके बहावलपुर के नवाब ने नवगठित पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल जिन्नाह को शुरूआती दौर में वर्ष 1947 में 7 करोड़ रुपए का कर्ज भी दिया था ताकि नए मुल्क के स्टाफ को दो माह का वेतन तो मिल सके।
मगर इन्हें आज इस बात की शर्मिंदगी है कि उनका बहावलपुर इन दिनों ‘जैश’ व लश्कर-तैयबा सरीखे आतंकी संगठनों का केंद्र बना हुआ है। ‘ऑपरेशन सिन्दूर’ के मध्य जिन आतंकी ठिकानों को भारतीय सेना के जवानों ने ठोका था, उनमें बहावलपुर के ये शिविर भी शामिल थे। हाल ही में कुरुक्षेत्र के एक फोटो जर्नलिस्ट एवं सोशल मीडिया कर्मी केशव मेहता ने महाराष्ट्र के धुलिया नामक शहर में बसे लगभग 4000 बहावलपुरी लोगों से भेंट की। केशव मेहता वहां बसे बहावलपुरी परिवारों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए वहां गया तो भारत-विभाजन के नए अध्याय भी खुले। देश को आजाद हुए 78 साल होने को हैं, लेकिन आज भी विभाजन का बेताल हमारे कंधों पर चढ़ा हुआ है, जिसे उतारने की कोशिश न तो हमारे बुजुर्गों ने की और न ही हमारी आने वाली नस्लें कर रही हैं।
विभाजन के समय बहावलपुर (अब पाक में) से भारत में आ बसे परिवारों में कई सारी बिरादरी आईं और इन्हीं में से एक बिरादरी का नाम है बहावलपुर बिरादरी।
इस बिरादरी का जब भी जिक्र आता है तो पहले श्रीगंगानगर की याद आती है जहां सबसे ज्यादा बहावलपुर के लोग वहां आकर बसे थे क्योंकि वह भारत-पाक सरहद के बिल्कुल नजदीक था। उसके अलावा राजपुरा का जिक्र आता है जो कि छोटा बहावलपुर माना जाता है उसके बाद अलग-अलग शहरों में भी कुछ लोग हैं लेकिन वह रोजगार और रिश्तेदारियों की वजह से धीरे-धीरे वहां स्थानांतरित हुए। बीकानेर में भी बहावलपुर रियासत से आये हुए परिवारों ने अपने घर बनाए अपने परिवारों को यहां पर स्थाई रूप से एक आशियाना मिला और यहीं पर स्थापित होकर अपनी पहचान बना ली है। अब हर जगह एक बहावलपुर नगरी है या एक बहावलपुरी सभा है। उसी बहावलपुर के लगभग 4000 लोग, महाराष्ट्र जलगांव से 100 किलोमीटर दूर धुलिया नामक शहर में आ बसे थे। अचंभा होता है कि महाराष्ट्र में ये लोग कैसे चले गए ।
इनकी दास्तान कुछ यूं सामने आती है। पश्चिम पाकिस्तान की बहावलपुर स्टेट के रहीम यार खान जिले में सदीकाबाद नाम की तहसील है जो आज भी कायम है उसी तहसील में एक छोटा सा गांव था संजरपुर जो आज भी है, जिसके ये लोग निवासी हैं। ये बताते हैं कि, ‘उसी गांव में हम हिंदू और मुसलमान सदियों से भाईचारे से अपना निर्वाह भलीभांति कर रहे थे। किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं था प्रत्येक समाज अपने धर्म के अनुसार पूजा-अर्चना करता था, जीवन अच्छी तरह व्यतीत हो रहा था कि अचानक 14 अगस्त 1947 में तूफान आया और देखते ही देखते भारत के दो भाग हो गए, एक भारत और दूसरा पाकिस्तान। विभाजन के नाम पर वहां के लोगों में ‘नफरत अचानक सुलगी। वहां के मुसलमानों ने हम हिंदुओं को बुरी तरह से मार-पीट कर अपने देश से निकाल दिया।’ ‘संजरपुर गांव सिंध-पंजाब की सीमा पर स्थित एक महत्वपूर्ण कामकाज़ी गांव था, वहां की ज़मीन उपजाऊ थी, ‘आबादी 150 से 200 परिवारों की थी जिसमें 40 प्रतिशत हिंदू और 60 प्रतिशत मुसलमानों के परिवार थे। हमारे गांव के नज़दीक डंडी, कोट, अहमदपुर, भुंग, बल्हार आदि छोटे-छोटे गांव थे। उनमें बल्हार रेल वे स्टेशन था।’ तब हालात को बिगड़ते देख बहावलपुर समाज के मुखी लाला सतरामदास रेलन ने बिरादरी प्रमुखों की एक मीटिंग बुला ली और मौलवियों द्वारा दी धमकियों का ब्यौरा दिया। इस सारे विषय पर गंभीरता से सभी ने विचार कर एक सहमति से गांव की सुरक्षा के लिए और अपने बचाव के लिए वहां के खान साहब से मदद मांगी। वे 5 अक्तूबर 1947 सुबह ठीक 10 बजे मुखी साहब अपने शिष्टमंडल के साथ खान साहब के बंगले पर पहुंच गए। खान साहब ने सब का स्वागत किया, वे ‘वालेकुम असलाम’ कह कर सब खान साहब के साथ बैठ गए। मुखी ने गांव में हो रहे दंगों के बारे में गांव की सुरक्षा के बारे में विनती की। खान साहब ने कबूल किया कि वह जो हो रहा था, सब गलत हो रहा था। यह सिर्फ अपने गांव में नहीं बल्कि पूरे पाकिस्तान के हर शहर और गांवों में अत्याचार, खून-खराबा और आगजनी की घटनाएं हो रही हैं, जिस पर पाकिस्तान की सरकार काबू नहीं पा रही है। हालात सुधरने में वक्त लगेगा, इसलिए मैं आप को यह सलाह देता हूं कि जब तक हालात ठीक नहीं होते तब तक आप यहीं पर रहो, तब तक के लिए मैं सुरक्षा के इंतजाम करता हूं और यह भी सलाह देता हूं कि मामला शांत होने के बाद आप लोग बाल-बच्चों सहित अपने वतन हिन्दुस्तान (भारत) चले जाओ। आप को सुख से भारत पहुंचाने की जिम्मेदारी मेरी होगी आप लोग मुझ पर विश्वास रखो, मैं अपने गांव का एक परिंदा भी नहीं मरने दूंगा। आप लोगों को मैं बाल-बच्चों सहित भारत पहुंचाऊंगा।’ खान साहब के आश्वासन पर भरोसा कर समाज के मुखिया सतरामदास रेलन ने 12 अक्तूबर 1947 को धर्मशाला में समाज की आम सभा बुलाई। सब के विचारों के अनुसार आमराय बनी कि हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपनी संस्कृति और मां-बहनों की लाज बचाने के लिए हमें अपनी जन्मभूमि छोड़ना भी पड़े तो भी हमें कबूल है।’ सब ने एक ही आवाज में कहा कि वतन बदल सकते हैं, धर्म हरगिज़ नहीं बदलेंगे। सब की एक राय पर सदियों से रह रहे अपने संजरपुर गांव को जोड़ने के लिए मजबूर हो गए। हिन्दुस्तान में हमें कब, कहां और कैसे जाना होगा यह निश्चित करने के लिए ही एक कमेटी बनी और खान अब्दुल वाहिद खान अब्बासी की अध्यक्षता में 21 पंचों की एक सुरक्षा कमेटी बनाई गई। सुरक्षा कमेटी में कई बिरादरियों के प्रमुख कार्यकर्ताओं को शामिल किया गया। सुरक्षा कमेटी में तय हुआ कि मार्च 1948 तक हमें पाकिस्तान छोड़कर कराची के रास्ते हिन्द महासागर लांघकर सौराष्ट्र होते हुए पानी के जहाज में बैठकर गुजरात राजस्थान सीमा पार करके बम्बई बदरगाह जाना है या रेलवे द्वारा सफर कर के नजदीक पाकिस्तान सीमा पार कर सौराष्ट्र या गुजरात के किसी अच्छे शहर में डेरा डाला जाए। खान साहब की सलाह के अनुसार, पाकिस्तान छोड़ने की योजना बनाई गई क्योंकि उनकी दोनों जगह अच्छी मान्यता थी। वह जो भी निर्णय लेते थे दोनों समाज उसे स्वीकार करते थे। इसलिए तब संजरपुर गांव सुरक्षित था। फिर भी इन दिनों गांव लूटने दंगे-फसाद करने की दो-तीन बार कोशिश की लेकिन विफल रहे। जनवरी 1948 के आखिर तक मामला धीरे-धीरे सामान्य (शान्त) हुआ। दोनों तरफ की सरकारों ने अपने-अपने देश में हुए दंगों और अत्याचारों पर काबू पा लिया। पंजाब, सिंध, बंगाल और बहावलपुर इन चारों राज्यों में रह रहे लाखों हिन्दू परिवार मुसलमानों के जुल्मों से तंग आकर मजबूर होकर अपना शहर गांव कस्बा जमीन जायदाद आदि छाेड़कर हिन्दुस्तान जत्थे के जत्थे बनाकर जाने लगे। भारत में कहां जाना है, किस के यहां ठहराना है, वापस आना है या नहीं, वहां हमारे लिए क्या व्यवस्था है, क्या वहां के लोग हमें वहां रहने देंगे या नहीं इस तरह के कई नकारात्मक विचार मन में आने लगे, फिर भी माथे पर गठरी, पीठ पर विस्तर, कमर में बच्चा बांधकर हजारों स्त्री-पुरुष नंगे पांव कड़ी धूप व बरसात सहते हुए, माता का गान करते हुए अपनी नई दिशा की तरफ चलते ही जा रहे थे। अब इन्होंने यहां महाराष्ट्र में अपने भवन बनाए हैं, अपने बाग-बगीचे बनाए हैं, अपने नामों पर व्यावसायिक संस्थान बनाए हैं। शोरूम बनाए हैं, सभाएं बनाई हैं। अपने विशेष दिवस मनाते हैं। हर वर्ष 13 अप्रैल को यह बहावलपुर दिवस मनाते हैं और इस दिवस को दूर-दूर से लोग देखने आते हैं, जिनके चर्चे अब दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं पिछले 13 वर्ष से यह उत्सव निरंतर एक बहुत बड़ा रूप लेता जा रहा है। आज यहां धूलिया में मराठी गुजराती सिंधी और हिंदी के बीच बहावलपुरी जुबान का बोलबाला है। ये जब भी आपस में मिलते हैं तो एक सम्मानजनक उत्साहवर्धक एक नारा बोलते हैं ‘जय बहावलपुरी, जीवे बहावलपुरी’।
महाराष्ट्र में भी फैला है बहावलपुरी समाज
Summary :
बात दिल्ली के बहावलपुर-हाउस या पंजाब-हरियाणा में स्थापित बहावलपुर-भवनों तक सीमित नहीं, न ही यह किस्सा वर्तमान पाक के बहावलपुर तक सीमित है। अब इतिहास के कुछ अनूठे पृष्ठ भी खुले हैं। इन्हें गर्व है अपनी संस्कृति, अपनी मां-बोली और अतीत की धर्मनिरपेक्ष जिंदगी पर। एक समय था इनके बहावलपुर के नवाब ने नवगठित पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर जनरल जिन्नाह को शुरूआती दौर में वर्ष 1947 में 7 करोड़ रुपए का कर्ज भी दिया था ताकि नए मुल्क के स्टाफ को दो माह का वेतन तो मिल सके। मगर इन्हें आज इस बात की शर्मिंदगी है कि उनका बहावलपुर इन…


Download Android App
Download iOS App



