होर्मुज पर ठेकेदारी की जंग

Summary :

होर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का प्रमुख केन्द्र बन गया है। होर्मुज पर नियंत्रण को लेकर दोनों देश आमने-सामने आ गए। ईरान तो होर्मुज को अपना हथियार मानता है और उसकी इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूलने की योजना थी लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से 20वीं सदी का टोल टैक्स वसूलने का ऐलान कर दिया है। नेता कम और विशुद्ध व्यापारी बन चुके ट्रम्प ने होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण की प्रक्रिया जल्द शुरू करने का भी ऐलान किया। ट्रम्प अब होर्मुज का ठेकेदार बनना चाहते हैं…

होर्मुज जलडमरूमध्य अमेरिका और ईरान के बीच तनाव का प्रमुख केन्द्र बन गया है। होर्मुज पर नियंत्रण को लेकर दोनों देश आमने-सामने आ गए। ईरान तो होर्मुज को अपना हथियार मानता है और उसकी इस समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों से टोल टैक्स वसूलने की योजना थी लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से 20वीं सदी का टोल टैक्स वसूलने का ऐलान कर दिया है। नेता कम और विशुद्ध व्यापारी बन चुके ट्रम्प ने होर्मुज पर अमेरिकी नियंत्रण की प्रक्रिया जल्द शुरू करने का भी ऐलान किया। ट्रम्प अब होर्मुज का ठेकेदार बनना चाहते हैं और वह चाहते हैं कि अब अमेरिका को ‘गार्जियन ऑफ होर्मुज स्ट्रेट’ कहा जाए। अमेरिका होर्मुज में ईरान या उसके ग्राहकों के जहाजों को रोकेगा और अन्य सभी देशों के जहाजों से वसूली करेगा। अमेरिका अन्य देशों के जहाजों की सुरक्षा करेगा और इसकी एवज में टोल टैक्स वसूलेगा। दूसरी तरफ ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने ट्रम्प के ऐलान का मजाक उड़ाते हुए कहा है कि तेहरान होर्मुज का संरक्षक बना रहेगा। जो कोई भी जलमार्ग की सुरक्षा करेगा उसे टोल तो मिलना ही चाहिए। अमेरिका का 20 फीसदी टोल टैक्स काफी ज्यादा है। ईरान देखेगा कि क्या करना है। उधर अमेरिका ईरान पर ताबड़तोड़ हमले कर रहा है तो दूसरी तरफ ईरान भी खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमले कर रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका के पास होर्मुज पर टोल टैक्स लगाने का कोई कानूनी अधिकार है? ट्रम्प के पास ऐसा कोई कानूनी आधार नहीं है। अगर वो ऐसा करते हैं तो यह एक तरह से सीधी-सीधी दादागिरि होगी। संयुक्त राष्ट्र एजैंसी इंटरनैशनल मैरिटाइम ऑरगेनाइजेशन ने अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री आवागमन के लिए टोल टैक्स लगाए जाने का कड़ा विरोध किया। शिपिंग उद्योग ने इसे अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है।
संयुक्त राष्ट्र के नियम देशों को अपनी तटरेखा से 12 समुद्री मील (13.8 मील यानी करीब 22 किलोमीटर) तक के क्षेत्रीय समुद्री जल पर नियंत्रण रखने की अनुमति देते हैं। अपने सबसे संकरे हिस्से में होर्मुज़ स्ट्रेट और उसकी शिपिंग लेन्स पूरी तरह ईरान और ओमान के क्षेत्रीय समुद्री जल के भीतर आती हैं। यानी संयुक्त राष्ट्र के नियमों के मुताबिक़ इतने हिस्से पर ईरान और ओमान का नियंत्रण है। संयुक्त राष्ट्र के समुद्री क़ानून का आर्टिकल 38 दुनिया भर में 100 से ज़्यादा स्ट्रेट्स, जिनमें होर्मुज़ स्ट्रेट भी शामिल है, से होकर जहाज़ों को बिना किसी बाधा के “ट्रांज़िट पैसेज” का अधिकार देता है।
ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्म्स (आईआरजीसी) ने इससे पहले भी उसकी अनुमति के बिना होर्मुज़ स्ट्रेट से गुज़रने की कोशिश कर रहे कार्गो जहाज़ों पर गोलीबारी की थी और दो जहाज़ों को अपने क़ब्ज़े में ले लिया था। इसके बाद इस 1 स्ट्रेट से समुद्री यातायात में भारी गिरावट आई जिससे तेल की क़ीमतों में उछाल आ गया। अमेरिका ने अप्रैल में ईरान पर दबाव बनाने के लिए सबसे पहले सभी ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी कर दी थी। लगभग पांच हफ्ते बाद अमेरिकी सेना ने कहा कि उसने नाकेबंदी के दौरान 100 कार्गो जहाज़ों का रास्ता बदलवाया और चार जहाज़ों को निष्क्रिय कर दिया। युद्ध विराम खत्म होने के बाद अमेरिका और ईरान में होर्मुज का ठेकेदार बनने की होड़ मच गई है। होर्मुज में ईरानी मिसाइलों के जहाजों पर हमले में एक भारतीय की मौत हो चुकी है और 6 भारतीय नागरिकों समेत 8 लोग घायल हुए हैं। मिडिल ईस्ट युद्ध में कई भारतीय नागरिकों की मौत हो चुकी है। भारतीय नाविक खतरे में हैं, क्योंकि खाड़ी में आने-जाने वाले जहाजों के चालक दल में भारतीय नाविकों का बड़ा हिस्सा है। होर्मुज पर कब्जे की लड़ाई ने तेल की कीमतों में भूचाल ला दिया है जिससे एक बार फिर हाहाकार मच गया है।
अमेरिका-ईरान की इस तकरार में पूरी दुनिया चपेट में आ गई है। भारत भी इससे बच नहीं पाएगा। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत आयात बिल तो बढ़ाएगी ही, साथ ही साथ तेल की सप्लाई प्रभावित होने से ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ सकता है। चीन, जो ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार था, वो भांप चुका है कि ये युद्ध इतनी आसानी से खत्म होने वाला नहीं है, इसलिए उसने अपनी रिफाइनरियों को उत्पादन बढ़ाने का आदेश दे दिया है। भारत ने भी तैयारियां शुरू कर दी हैं, ताकि ऊर्जा संकट से निपटा जा सके। हालांकि होर्मुज पर बढ़े विवाद के चलते पैट्रोल-डीजल के बढ़े दाम जल्द कम होने की संभावना खत्म हो गई है। शिपिंग लागत और कच्चे तेल की कीमतों पर असर पैट्रोल-डीजल के दाम को आसानी से कम नहीं होने देगा।
युद्ध से पहले दुनिया का लगभग 5वां हिस्सा तेल और एलएनजी होर्मुज से होकर जाता था। यह एक ऐसा रास्ता है जिस पर भारत खाड़ी देशों की एनर्जी सप्लाई के लिए बहुत ज्यादा ​निर्भर है। अगर 20 फीसदी टोल टैक्स लागू होता है तो भारतीय रिफाइनरी कम्पनियों की लागत बढ़ जाएगी और घरेलू ईंधन की कीमतें बढ़ेंगी। भारत ने हमेशा स्वतंत्र समुद्री मार्गों का समर्थन किया है। भारत को अमेरिकी टोल टैक्स का विरोध करना पड़ेगा। ट्रम्प की यह दादागिरि घरेलू राजनीति में भी उनके लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। क्योंकि आम अमेरिकी नागरिकों का ट्रम्प पर भरोसा टूट चुका है। रिपब्लिक सांसद भी ट्रम्प का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं। क्योंकि ट्रम्प का हर दाव नाकाम साबित हो रहा है।

Aditya Chopra

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