अक्सर सुना जाता है कि अधिकतर बेटे समय के साथ बदल जाते हैं। मां-बाप की सेवा नहीं करते, उन्हें अंतिम समय में तंग करते हैं या प्रोपर्टी के लिए झगड़ा करते हैं परन्तु आज जब पिछले लगभग 24 सालों से मैं बुजुर्गों के लिए काम कर रही हूं तो जहां बेटियां अच्छे कार्यों में बेटों से कम नहीं, वहां कुछ बेटियां बुरे कामों में भी कुछ बुरे बेटों से कम नहीं। मुझे बड़ी हैरानगी होती है कि बेटियां तो कभी ऐसी नहीं होती थीं, क्योंकि बेटियां तो हमारे देश में पूजी जाती हैं। जहां कन्या को देवी का रूप माना जाता है, जहां गार्गी, मैत्रेयी, रानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर और कल्पना चावला जैसी महान बेटियां हुई हैं। लेकिन आज जब समाचारों में सुनती हूं कि कहीं कोई बेटी अपने माता-पिता के साथ क्रूरता करती है, कहीं रिश्तों को लालच और स्वार्थ के लिए तोड़ा जा रहा है। कहीं गलत संगत और क्षणिक क्रोध में अपराध हो रहे हैं। अभी-अभी सुना कि एक बेटी ने अपनी मां को मार दिया। कुछ दिनों पहले एक बेटी ने अपने मंगेतर को विवाह से पहले मार दिया। कई नई विवाहित महिलाओं ने अपने पति को मौत के घाट उतार दिया।
आखिर हम कहां जा रहे हैं। हमारे संस्कार, हमारे रिश्तों की मर्यादा कहां जा रही है। मैं सभी बेटियों को दोष नहीं देती। आज भी हमारी लाखों-करोड़ों बेटियां अपने माता-पिता की समर्पित भाव से सेवा कर रही हैं। विभिन्न क्षेत्रों में देश का नाम रोशन कर रही हैं और हर क्षेत्र में सफलता के नए इतिहास लिख रही हैं। लेकिन जो बेटियां गलत रास्ते पर जा रही हैं उनसे मैं हाथ जोड़कर कहना चाहती हूं, बेटियां कोई भी कदम उठाने से पहले एक बार अपनी मां का चेहरा याद कर लेना। वह बचपन याद कर लेना, जब तुम्हारी एक छोटी-सी चोट पर तुम्हारे माता-पिता की आंखों में आंसू आ जाते थे। जिस मां ने तुम्हें नौ महीने अपनी कोख में रखा, जिस पिता ने तुम्हारे सपनों के लिए अपनी इच्छाएं त्याग दीं उनका दिल कभी मत दुखाना।
आधुनिक बनो, आगे बढ़ो, अपने अधिकारों के लिए खड़ी हो, आसमान छुओ लेकिन अपनी जड़ों और संस्कारों को मत भूलो। आजादी का अर्थ मनमानी नहीं है। आधुनिकता का अर्थ रिश्तों को भूल जाना नहीं है और अधिकारों के साथ हमारे कुछ कत्र्तव्य भी होते हैं। बेटियों तुम शक्ति हो, तुम ममता हो, तुम संस्कार हो, तुम घर की रौनक हो और समाज का भविष्य हो। ऐसा कोई भी काम मत करना जिससे तुम्हारे माता-पिता को दुनिया के सामने सिर झुकाना पड़े। ऐसा जीवन जियो कि वे गर्व से कहें ”हां यह हमारी बेटी है।ÓÓ तुम बेटी हो उड़ो, खूब ऊंचा उड़ो लेकिन अपनी जड़ों को मत भूलो। दुनिया को बदलो, लेकिन अपने संस्कार मत बदलो। आधुनिक बनो, आत्मनिर्भर बनो, शक्तिशाली बनो लेकिन इंसानियत, ममता और रिश्तों की मर्यादा को हमेशा अपने दिल में जीवित रखो। क्योंकि बेटी केवल एक परिवार की पहचान नहीं बेटी समाज का संस्कार और राष्ट्र का भविष्य है। बेटी सशक्त संस्कारवान होगी तो परिवार सशक्त संस्कारवान होगा, परिवार सशक्त संस्कारवान होगा तो समाज भी सशक्त होगा, समाज होगा तो देश भी सशक्त और संस्कारवान होगा। क्योंकि एक बेटी किसी भी रूप में परिवार की धुरी होती है। अभी मैं लिख ही रही थी कि एक हमारी सदस्या अपनी कलियुगी बेटी की समस्या लेकर आई है, मेरा मन सुनकर बहुत विचलित है। इसे अगली बार आपसे साझा करूंगी। अभी तो बेटी के आसपास के लोगों से बात कर रही हूं कि वह अपनी मां के साथ ऐसा न करें और मुझे लिखने पर मजबूर न करें क्योंकि मैं पहले प्रार्थना करती हूं फिर लिखती हूं। मेरा काम है हर बुजुर्ग को इंसाफ मिले, उसे उसके बच्चे प्यार करें, सम्मान दें। क्योंकि आज जहां वो खड़े हैं कल वहीं उनके बच्चे होंगे। यह आज और कल का सिलसिला चलता रहेगा, जो बोओगे वो काटोगे।
हमारे रिश्तों की मर्यादा
Summary :
अक्सर सुना जाता है कि अधिकतर बेटे समय के साथ बदल जाते हैं। मां-बाप की सेवा नहीं करते, उन्हें अंतिम समय में तंग करते हैं या प्रोपर्टी के लिए झगड़ा करते हैं परन्तु आज जब पिछले लगभग 24 सालों से मैं बुजुर्गों के लिए काम कर रही हूं तो जहां बेटियां अच्छे कार्यों में बेटों से कम नहीं, वहां कुछ बेटियां बुरे कामों में भी कुछ बुरे बेटों से कम नहीं। मुझे बड़ी हैरानगी होती है कि बेटियां तो कभी ऐसी नहीं होती थीं, क्योंकि बेटियां तो हमारे देश में पूजी जाती हैं। जहां कन्या को देवी का रूप माना…


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