लोकसभा चुनावों में अब 50 से भी कम दिनों का समय रह गया है और देश की सियासी फिजां भी अब रंगत बदलने के तेवरों में इस तरह आ रही है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियां विभिन्न क्षेत्रीय दलों से गठबन्धन करके खुद को मजबूत बनाने की कवायद में लग चुकी हैं। इस सिलसिले में भाजपा ने जिस तरह दक्षिण भारत के प्रमुख राज्य तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक पार्टी के साथ समझौता करने का एेलान किया है वह बताता है कि मूल रूप से उत्तर भारत की कही जाने वाली यह पार्टी अब दक्षिण की स्थानीय राजनीति में कदम जमाने के लिए वहीं के सियासी नुक्तों को पकड़ कर अपनी जमीन तैयार करना चाहती है। दूसरी तरफ देश की सबसे पुरानी और हर राज्य में अपनी पुख्ता विरासत के बूते पर पहचान रखने वाली कांग्रेस पार्टी का संकट बिल्कुल इसके उलट है। यह पार्टी पिछले 30 सालों से लगातार कटाव से कमजोर होती जा रही जमीन को थामे रखने के लिए विभिन्न क्षेत्रीय दलों से गठबन्धन कर रही है किन्तु इन दोनों गठबन्धनों में सबसे बड़ा और मूल अन्तर यह है कि भाजपा जहां अपनी विचारधारा को अन्य क्षेत्रीय दलों की मार्फत उनके राज्यों में फैलाना चाहती है वहीं कांग्रेस पहले से ही विभिन्न राज्यों में फैली अपनी विचारधारा को पुनः ऊपरी सतह पर लाना चाहती है।
मगर इसके बावजूद चुनावी युद्ध विचारधारा के केन्द्र में रहने की जगह सुविधापरक राजनैतिक समीकरणों के बीच होता इस तरह नजर आ रहा है कि हांसिल सिर्फ अधिक सीटें पाने का गणित रहे। लोकतन्त्र में निश्चित रूप से संख्या बल का महत्व होता है जिसके बूते पर सरकारें बनती और बिगड़ती हैं अतः राजनैतिक दलों का लक्ष्य इसे प्राप्त करने का न हो, एेसा सोचना व्यावहारिक नहीं हो सकता। इसलिए जमीनी सच्चाई के मद्देनजर भाजपा और कांग्रेस पार्टी जिस तरह के राजनैतिक समीकरण गढ़ रही हैं उनसे साफ होता जा रहा है कि अन्तिम मुकाबला इन्हीं दो प्रमुख पार्टियों के बीच इस प्रकार होकर रहेगा कि दोनों पार्टियां अपने-अपने सहयोगी दलों के साथ बहुमत का आंकड़ा पार कर सकें। इस सन्दर्भ में सबसे अहम भूमिका देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की हो सकती है जहां लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीटें हैं।
यह राज्य पिछले पांच साल से भाजपा के लिए ऐसी उपजाऊ जमीन बना हुआ है कि अगर वह यहां तिनका भी बो दे तो वह गन्ना बन कर फसल दे देता है। इसकी वजह राज्य की राजनीति का पूरी तरह जातिगत व साम्प्रदायिक दायरे में सिमट जाना रहा है। यह कार्य इसी राज्य के दो क्षेत्रीय दलों बसपा व सपा ने मिलकर इस करीने के साथ किया है कि एक मतदाता ही दूसरे मतदाता की जातिगत या धार्मिक पहचान को देखकर एक-दूसरे के खिलाफ ही गोलबन्द होकर अपनी चुनावी विजय का जश्न मनाने लगा। इस जश्न में न कहीं विचारधारा का कोई मतलब था और न सामाजिक व आर्थिक समस्याओं का, मतलब था तो केवल अपने समुदाय के रूआब का।
राजनीतिज्ञ किस तरह आम जनता को राजनीति से ही शून्य बना सकते हैं, उत्तर प्रदेश इसका जीता-जागता उदाहरण बनता चला गया। ऐसा केवल तभी होता है जब लोकतन्त्र के चुनावी युद्ध को कबीलों की लड़ाई में तब्दील करके मतदाता को कबीलों के ही हुक्मबरदारी का गुलाम बना दिया जाता है जिससे उनके वे सभी लोकतान्त्रिक अधिकार भी कबीलों के पास ही खुद-ब-खुद गिरवी हो जाते हैं जो बाबा साहेब अम्बेडकर ने उन्हें भारत का संविधान लिखते हुए दिये थे। इनमें सबसे बड़ा हक एक वोट का अधिकार ही था जो किसी भी सूरत मे परिवर्तनीय नहीं था मगर उत्तर प्रदेश में ऐसी राजनीति पनपी कि इस वोट को ही थोक के भाव परिवर्तनीय बताने की डींगें हांकी जाने लगी। इसलिए राज्य में समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी के बीच हुए गठबन्धन से किसी प्रकार के बदलाव की कोई ध्वनि पैदा नहीं हुई। इस गठबन्धन के पीछे मुख्य भाव आम मतदाता की हस्ती को कोई तवज्जो देना नहीं था क्योंकि यह मान लिया गया था कि उसकी सोच की जो सीमाएं इन पार्टियों ने पहले से तय कर दी हैं उनमें कोई बदलाव नहीं आ सकता परन्तु राज्य की राजनीति में श्रीमती प्रियंका गांधी के अचानक कूदने से जिस प्रकार का जोश और वैचारिक होश आम मतदाता ने महसूस किया है उससे जमीन पर वह बयार बहने लगी जिससे लोगों को दिमाग में नई खुशबू का एहसास होने लगा।
हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश यदि पं. नेहरू और इन्दिरा गांधी के बाद यदि किसी नेता की विरासत से भरपूर रहा है तो वह स्व. चौधरी चरण सिंह थे जिन्होंने राज्य की जनता को न तो धर्म और न जाति या बिरादरी के बूते पर संगठित करने का कमाल किया था बल्कि वैचारिक बोध की ताकत पर सभी वर्गों के वंचितों के लिए सत्ता में सीधे भागीदारी का रास्ता खोलने का आह्वान किया था। अतः उनकी विरासत को संभाले उनके पौत्र जयन्त चौधरी यदि सपा-बसपा गठबन्धन का साथ तोड़कर कांग्रेस महासचिव श्री ज्योतिरादित्य सिन्धिया के साथ सैर कर रहे हैं तो माना जायेगा कि वह उस विरासत की तरफ मुड़ रहे हैं जो उत्तर प्रदेश के हर गांव और कस्बे में फैली पड़ी है। यह विरासत चौधरी साहब की उस कड़ी मेहनत का फल है जिसे उन्होंने दलित-मजदूर-किसान पार्टी का नाम देकर अपना अन्तिम 1984 का लोकसभा चुनाव लड़ा था।
बेशक ये चुनाव श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या से उपजी परिस्थितियों के परिवेश में लड़े गये थे मगर उत्तर भारत के सभी प्रमुख राज्यों में चौधरी साहब की पार्टी ही कांग्रेस के बाद दूसरे नम्बर की सबसे बड़ी पार्टी थी। हम जो मुलायम सिंह यादव से लेकर लालू प्रसाद व राम विलास पासवान अथवा नीतीश कुमार या शरद यादव की पार्टियां देख रहे हैं ये सभी पार्टियां चौधरी चरण सिंह की तपस्या का ही मिला प्रसाद है। यह बात अलग है कि इन सभी नेताओं ने अपने-अपने निजी स्वार्थों की खातिर चौधरी साहब की विरासत का बंटवारा कर दिया और उनके पुत्र अजित सिंह इसे संभालने में असमर्थ रहे मगर उनके पौत्र जयन्त चौधरी को यदि समय रहते अपने दादा के उसूलों की याद आयी है तो उत्तर प्रदेश की राजनैतिक चेतना के जागृत होने को कैसे रोका जा सकता है। यह केवल गांधीवादी ताकतों के एक होने का मसला है क्योंकि चौधरी साहब आजादी के बाद के भारत में उत्तर प्रदेश के ऐसे चलते-फिरते गांधी के ही स्वरूप थे जिनके लिए ईमानदारी, सदाकत, सादा जीवन ही राजनीति थी।


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