देश की प्रतिष्ठित आईटी दिग्गज टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) में ‘कॉर्पोरेट एथिक्स’ और ‘वर्कप्लेस कल्चर’ को तार-तार करने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। महाराष्ट्र के नासिक में टीसीएस की शाखा में यौन उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन के प्रयासों के चौंकाने वाले आरोप परेशान करने वाले हैं। इस प्रकरण ने न केवल कंपनी के इंटरनल सुरक्षा प्रोटोकॉल पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पेशेवर दुनिया के भीतर सक्रिय एक गहरी साजिश की ओर भी इशारा किया है। लव जिहाद, कल्चरल जिहाद के बाद ये नया शब्द आया है कॉर्पोरेट जिहाद। आगे न जाने कितने इस तरह के शब्द सुनने को मिलेंगे।
निश्चित तौर पर यह दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम कॉर्पोरेट जगत में व्याप्त विद्रूपताओं और एक गहरी तथा व्यापक विफलता की ओर ही इशारा करता है। जबकि दावा यह किया जाता रहा है कि कॉर्पोरेट जगत की प्राथमिकता कर्मचारियों की सुरक्षा और गरिमा को सुनिश्चित करना है। टीसीएस के नासिक कार्यालय में आठ महिला कर्मचारियों ने यौन उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन का आरोप लगाया है। प्रकरण में यह आरोप है कि पुरुष कर्मचारियों का एक समूह महिला सहकर्मियों को निशाना बनाने के लिए एक ‘संगठित गिरोह’ की तरह काम कर रहा था। पीड़ित महिलाओं जिनकी उम्र 18 से 25 वर्ष के बीच बताई जा रही है, उनका आरोप है कि उन्हें अलग-अलग कार्यस्थलों पर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उनके पहनावे और शारीरिक बनावट पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं और उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली बातें कही गईं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपियों ने महिलाओं को उनके व्यक्तिगत और वैवाहिक समस्याओं का फायदा उठाकर निशाना बनाया। यह उत्पीड़न पिछले दो से तीन वर्षों से जारी था।
पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने पहले कंपनी के मानव संसाधन विभाग से शिकायत की थी, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। वही दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि मानव संसाधन प्रबंधक ने कथित तौर पर पीड़िता को शिकायत दर्ज कराने से यह कहकर रोका कि ‘ऐसी चीजें होती रहती हैं।’ आक्षेप लगाया गया है कि इस प्रकरण में आरोपी का ही पक्ष लिया गया। टीसीएस ने अपने बयान में कहा है कि वह किसी भी प्रकार के उत्पीड़न या दबाव को लेकर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाती है। कंपनी के अनुसार, जैसे ही मामला संज्ञान में आया, संबंधित कर्मचारियों को जांच लंबित रहने तक निलंबित कर दिया गया है और स्थानीय प्रशासन के साथ पूरा सहयोग किया जा रहा है। हालांकि, यह सवाल उठ रहे हैं कि पहले की गई शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई। कंपनी के बयान में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ‘उत्पीड़न और दबाव में किन-किन आरोपों को शामिल किया गया है। निश्चित रूप से यह घटनाक्रम कंपनी प्रबंधन की उस घोर लापरवाही को ही उजागर करता है जिसके चलते समय रहते इस तरह के यौन उत्पीड़न व धर्म परिवर्तन की कोशिशों पर अंकुश नहीं लग सका।
इसमें दो राय नहीं है कि जब यौन उत्पीड़न रोकथाम ढांचे को लागू करने के लिये जिम्मेदार उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों पर दुर्व्यवहार को सामान्य या मामूली बात समझने का आरोप लगता है, तो सारे संस्थागत सुरक्षा उपाय ध्वस्त हो जाते हैं। निर्विवाद रूप से यह एक दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्ति है, जब पीड़ित महिला कर्मचारी को न केवल अपराधियों द्वारा बल्कि उनकी सुरक्षा का दायित्व संभालने वालों द्वारा भी चुप कराने के प्रयास किये जाते हैं। एक बार फिर से पुलिस के हस्तक्षेप और परामर्श के बाद ही कई पीड़ित महिला कर्मचारियों ने आगे आने का साहस जुटाया है। जिसके बाद ही मामले में प्राथमिकी दर्ज हो पाई है। महाराष्ट्र सरकार ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया है। एसआईटी 9 शिकायतों की जांच कर रही है। अब तक सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें छह पुरुष और एक महिला शामिल हैं। एक महिला कर्मचारी अभी फरार है।
बहरहाल, इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण को लेकर एक असहज करने वाला प्रश्न यह उठता है कि क्यों भय, सामाजिक कलंक अथवा संस्थागत उदासीनता के कारण देश भर के विभिन्न कार्यस्थलों में ऐसे कितने ही यौन उत्पीड़न के मामले उजागर नहीं हो पाते हैं? इसमें दो राय नहीं कि इस मामले में जांच बिना किसी पूर्वाग्रह के आगे बढ़नी चाहिए। निर्विवाद रूप से आईटी कंपनी के नासिक प्रकरण में सांप्रदायिक या राजनीतिक रंग देने का प्रयास इस संकट की मूल चिंताओं को धूमिल करने का जोखिम जरूर पैदा कर सकता है। निःसंदेह ऐसी घटनाओं को धार्मिक या वैचारिक नजरिये से देखना कॉर्पोरेट जवाबदेही और लैंगिक संवेदनशीलता वाले सुधारों की तत्काल आवश्यकता से ध्यान भटका सकता है।
धर्मांतरण का रैकेट अंतर्राष्ट्रीय रैकेट है। इसे क्रिश्चन मिशिनरीज भी चलाती रही हैं और अरब देशों से भी इसके लिए फंडिंग होती रही है। धोखा देकर शादी करना गलत है। नासिक की जो घटना है उसमें सबसे पहली जिम्मेदारी उस संस्थान की है जहां ये घटना हुई है। भले वो संस्थान कितना भी बड़ा हो या कितना भी छोटा हो। ये पूरा नेक्सस बड़े संगठित तरीके से काम करता है। इसमें पूरा रैकेट काम कर रहा था। टीसीएस प्रकरण में कंपनी के भीतर आरोपी न केवल खुद दबाव बना रहे थे, बल्कि मलेशियाई उपदेशक इरमान को वीडियो कॉल के जरिए जोड़कर लड़कियों का ‘ब्रेनवॉश’ किया जा रहा था। नासिक से जुड़े कथित धर्मांतरण मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बीती 16 अप्रैल को एक आवेदन दायर किया गया है। यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अधिवक्ता अश्वनी दुबे के माध्यम से दायर की है और इसमें कहा गया है कि नासिक में संगठित धर्म परिवर्तन ने “पूरे देश के नागरिकों की अंतरात्मा को झकझोर दिया है”। ऐसे कृत्य “संप्रभुता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, बंधुत्व, गरिमा, एकता और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा हैं।”
निःसंदेह, यह प्रकरण बेहद गंभीर है और इन आरोपों ने कार्यस्थल की सुरक्षा जैसे नजरअंदाज किए जा रहे महत्वपूर्ण मुद्दे पर फिर देश का ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि, कॉर्पोरेट जगत से जुड़े कार्यालयों में स्थायी परिवर्तन तभी संभव होगा जब कंपनियां ऐसे मामलों में शून्य सहिष्णुता’ की घोषणा करेंगी। इसके साथ ही जरूरत इस बात की भी कि कार्यालयों में ऐसा निर्भयतापूर्ण वातावरण तैयार किया जाए कि कोई भी महिला कर्मचारी बिना डर के बोलने के लिए सशक्त बन सके। उन्हें सशक्त बनाने के लिए आंतरिक तंत्र को सक्रिय रूप से मजबूत बनाने की जरूरत है।
इसके अलावा यह भी जरूरी है कि कंपनियों का शीर्ष प्रबंधन गाहे-बगाहे यह पड़ताल करता रहे कि सर्वाधिकार प्राप्त कोई अधिकारी असीमित अधिकारों की आड़ में उत्पीड़न के अपवित्र खेल में शामिल तो नहीं है। कानूनी प्रावधानों को लागू करने की जिम्मेदारी संबंधित संस्थानों की जरूर है, पर सबसे ज्यादा जरूरत निगरानी की है कि पालना हो रही है या नहीं। महिला स्वतंत्रता
और सुरक्षा के नारे जमीन पर तभी उतरेंगे जब एक पारदर्शी, सतर्क और निष्पक्ष व्यवस्था
बनाई जाएगी।
कार्पोरेट ऑफिस तक पहुँचा धर्मांतरण का खेल
Summary :
देश की प्रतिष्ठित आईटी दिग्गज टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) में ‘कॉर्पोरेट एथिक्स’ और ‘वर्कप्लेस कल्चर’ को तार-तार करने वाला एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। महाराष्ट्र के नासिक में टीसीएस की शाखा में यौन उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन के प्रयासों के चौंकाने वाले आरोप परेशान करने वाले हैं। इस प्रकरण ने न केवल कंपनी के इंटरनल सुरक्षा प्रोटोकॉल पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पेशेवर दुनिया के भीतर सक्रिय एक गहरी साजिश की ओर भी इशारा किया है। लव जिहाद, कल्चरल जिहाद के बाद ये नया शब्द आया है कॉर्पोरेट जिहाद। आगे न जाने कितने इस तरह के…


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