यह पीएम नरेन्द्र मोदी का युग है …

Summary :

नरेन्द्र मोदी अनजाने में ही रॉबर्ट फ्रॉस्ट के इस कथन पर भरोसा करते नजर आते हैं कि उन्होंने कम इस्तेमाल होने वाला रास्ता चुना और शायद इसी से सारा फर्क पड़ा। जवाहरलाल नेहरू और नरेन्द्र मोदी के रूप में भारत के प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व के दो अलग-अलग युगों का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें से प्रत्येक युग को उनकी सीमाओं, पसंदगियों और महत्वाकांक्षाओं के आधार पर परिभाषित किया जाता है। नेहरू ने जहां एक नाजुक एवं नवगठित संप्रभु राष्ट्र की अगुवाई की, वहीं मोदी ने वैश्विक झटकों से जूझते हुए एक विशाल, डिजिटल रूप से जुड़े एवं अति-प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र के शासन…

नरेन्द्र मोदी अनजाने में ही रॉबर्ट फ्रॉस्ट के इस कथन पर भरोसा करते नजर आते हैं कि उन्होंने कम इस्तेमाल होने वाला रास्ता चुना और शायद इसी से सारा फर्क पड़ा। जवाहरलाल नेहरू और नरेन्द्र मोदी के रूप में भारत के प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व के दो अलग-अलग युगों का प्रतिनिधित्व होता है। इनमें से प्रत्येक युग को उनकी सीमाओं, पसंदगियों और महत्वाकांक्षाओं के आधार पर परिभाषित किया जाता है। नेहरू ने जहां एक नाजुक एवं नवगठित संप्रभु राष्ट्र की अगुवाई की, वहीं मोदी ने वैश्विक झटकों से जूझते हुए एक विशाल, डिजिटल रूप से जुड़े एवं अति-प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र के शासन को संभाला है।

नेहरू का शासन संबंधी दर्शन ऊपर से नीचे की ओर संस्थाओं के निर्माण और राज्य-निर्देशित अर्थव्यवस्था पर केन्द्रित था। मोदी का दृष्टिकोण उस तरीके को उलट देता है और शासन को गरिमा एवं कार्यान्वयन द्वारा संचालित एक जन आंदोलन -“सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास” – के रूप में स्थापित करता है। बैंक खातों, डीबीटी, किफायती गैस कनेक्शन, आवास, शौचालय, तेज गति से सड़क निर्माण और डिजिटल कल्याणकारी योजनाओं जैसी नीचे से ऊपर की ओर जाने वाली यह लामबंदी राज्य से मिलने वाले फायदों को परिवार के स्तर पर दृश्यमान बनाती है जिससे परिणामों के साथ-साथ भरोसा भी बढ़ता है।

आकार ही दोनों नेताओं के कार्यकालों के बीच का मुख्य अंतर है। नेहरू ने जिस समय पदभार संभाला तब भारत की आबादी लगभग 34 करोड़ और दलीय प्रतिस्पर्धा नगण्य थी। मोदी के सत्ता संभालने के वक्त देश की आबादी 131 करोड़ से अधिक और एक ऐसी दलीय प्रणाली सामने थी जिसमें हजारों पंजीकृत संस्थाओं का अस्तित्व था और आम चुनाव के मतपत्रों में सैकड़ों संस्थाओं की मौजूदगी थी। भारत के पहले आम चुनाव में लगभग 17 करोड़ मतदाताओं ने मतदान किया था। जबकि, 2014 में मतदाताओं की तादाद 83 करोड़ से अधिक हो गई थी तथा 2024 तक इसमें और भी बढ़ौतरी हुई।

मोदी को बार-बार राष्ट्रीय जनादेश इस तीखे विखराव और चौबीसों घंटे सातों दिन डिजिटल निगरानी के बावजूद हासिल हुए हैं। पल-पल की डिजिटल निगरानी वाला मीडिया का यह माहौल नेहरू काल की संस्था-आधारित व प्रिंट-युग की राजनीति से बिल्कुल ही अलग है। निरंतर ऑनलाइन आलोचनाओं के बीच शासन चलाने से जवाबदेही और कथनात्मक प्रतिस्पर्धा की गति तेज हो जाती है। तीन लोकसभा चुनावों के दौरान मोदी का चुनावी रूप से केन्द्र में बने रहना और कई परिवारों के तीन पीढ़ियों के जेहन में प्रासंगिक बने रहना। नेटवर्क के इस युग में उनकी असाधारण राजनीतिक स्थिरता को दर्शाता है।

आर्थिक दृष्टि से, नेहरू के मॉडल ने आधारभूत उद्योगों और वैज्ञानिक संस्थानों को तराशा, लेकिन आखिरकार यह 3-4 प्रतिशत के आसपास की “हिंदू विकास दर” के रूप में जानी जाने वाली दर पर स्थिर हो गया। मोदी की अगुवाई वाला भारत वैश्विक विकास के इंजन के रूप में काम कर रहा है और कोविड-19, मुद्रास्फीति में उछाल, आपूर्ति शृंखला में झटके तथा भू-राजनीतिक संघर्ष से ग्रस्त एक दशक के दौरान इसकी औसत वृद्धि दर लगभग 6.5-7 प्रतिशत की रही है। सामाजिक स्तर पर, मोदी के नेतृत्व में मंत्रिमंडल की संरचना में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के प्रतिनिधित्व को अभूतपूर्व प्राथमिकता दी गई है और महिलाओं का प्रतिनिधित्व 1950 के दशक में निम्न इकाई अंकों से नारी शक्ति वंदन अधिनियम के जरिए बढ़कर एक तिहाई आरक्षण के विधायी मार्ग तक पहुंच गया है। यह सांकेतिक समावेशन से आगे बढ़कर संरचनात्मक गारंटी की दिशा में होने वाले बदलाव को इंगित करता है।

विदेश नीति में शैलीगत और रणनीतिक अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। नेहरू की गुटनिरपेक्षता सैद्धांतिक थी, लेकिन यह द्विध्रुवीय विश्व में अक्सर अलग-थलग पड़ने का कारण बनी और भौतिक शक्ति की तुलना में नीतिक नेतृत्व पर अधिक आधारित थी। मोदी की विभिन्न शक्तियों के साथ जुड़ाव की नीति लेन-देन पर आधारित, बहु आयामी और स्पष्ट रूप से हितों पर केन्द्रित है। एक ही साथ अमेरिका, रूस, यूरोप, खाड़ी देशों और ग्लोबल साउथ के साथ संबंध स्थापित करना और भारत के बाजार, प्रौद्योगिकी की मांग और प्रवासी भारतीयों के प्रभाव को सौदेबाजी की शक्ति में बदलना इसका बेहतरीन उदाहरण है।

विदेशों में संसदीय संबोधनों की आवृत्ति और अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों का अंबार एक गहरी हकीकत के लक्षण हैं : भारत आज आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन से लेकर डिजिटल लोक कल्याण तक के एजेंडों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उन्हें आकार दे रहा है। सुरक्षा और शासन कला में भी बदलाव आया है। नेहरू के शासनकाल को अक्सर “शांतिपूर्ण” काल के रूप में याद किया जाता है, लेकिन उस दौरान भी कई संघर्ष हुए– प्रथम भारत-पाकिस्तान युद्ध से लेकर 1962 में चीन के साथ हुए संघर्ष तक। मोदी की नीति में प्रतिरोध, सुनियोजित प्रतिक्रिया और सक्रिय सीमा प्रबंधन का समावेश किया गया है ताकि अस्थिर पड़ोस में बड़े पैमाने पर पारंपरिक युद्ध से बचा जा सके। भारत फिर भी एक प्रमुख कृषि उत्पादक एवं निर्यातक देश बना हुआ है।

यह सिर्फ कल्याणकारी होने भर का मामला नहीं है। बल्कि यह एक ऐसी व्यापक स्थिरता है जो परिवारों को सहारा देती है ताकि वे शिक्षा, गतिशीलता और रोजगार पर ध्यान केन्द्रित कर सकें। पर्यावरण और सभ्यतागत संरक्षण के संदर्भ में नेहरू का काल आधुनिक संरक्षण व्यवस्थाओं से पहले का चरण था। मोदी के युग में संरक्षित क्षेत्रों, बाघ अभ्यारण्यों, रामसर स्थलों का विस्तार हुआ है और चीतों का ऐतिहासिक पुनर्प्रवेश हुआ है। इकोलॉजी के विस्तार के समानांतर, सभ्यता का सुनियोजित पुनर्केंद्रीकरण भी किया गया है। ये जनसांख्यकीय बदलाव एक ऐसे राज्य की मांग करते हैं जो सेवाओं का तेजी से विस्तार करने के साथ-साथ गुणवत्ता को भी बढ़ाए।

यही वो दोहरी चुनौती है जिससे मोदी का शासन मॉडल डिजिटल सुविधाओं और संस्थागत प्रसार के जरिए निपटना चाहता है। पीएम मोदी का कार्यकाल बेहद महत्वपूर्ण मोड़ पर है तथा उन्होंने इंदिरा गांधी के सबसे लंबे निरंतर कार्यकाल को पीछे छोड़ दिया है। वे नेहरू के निरंतर सेवा के रिकॉर्ड के करीब पहुंच गए हैं। उन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर के पदों पर निर्वाचित प्रमुख के रूप में देश मेंकुल मिलाकर सबसे लंबा कार्यकाल हासिल कर लिया है। एक ऐसा भारत जो पहले से कहीं बड़ा, अधिक गतिशील, अधिक जुड़ा हुआ, अधिक प्रतिस्पर्धी है – और फिर भी कई लोगों की सोच से कहीं अधिक शासन योग्य है।

संप्रभुता, संसदीय संस्कृति, वैज्ञानिक सोच और संस्थागत आधार। मोदी की खासियत इसके व्यापक कार्यान्वयन में है। आधारभूत संरचनाओं को ऐसी प्रणालियों में परिवर्तित करना जो रोजाना करोड़ों लोगों तक वास्तविक समय में मापने योग्य परिणामों के साथ पहुंचे और साथ ही भारत को नियम-निर्धारक शक्ति के रूप में फिर से स्थापित करना। अलग-अलग दौर में अलग-अलग तरह के नेतृत्व की जरूरत होती है। पहले युग ने ढांचा तैयार किया और दूसरे युग ने उसके कलपुर्जों को ठोस बनाया, रास्तों का विस्तार किया, तारों को डिजिटल बनाया और दुनिया के लिए रोशनी की व्यवस्था की।

समावेशिता, कार्यान्वयन, बुनियादी ढांचा और प्रभाव के मानकों पर मोदी एक घोर जटिल युग के एक बेहद प्रभावशाली प्रधानमंत्री और वैश्विक राजनेता साबित हुए हैं। यही कारण है कि मोदी के नेतृत्व का युग उनके कार्यकाल समाप्त होने (यानी जब भी वे पद छोड़ेंगे) के बाद भी लंबे समय तक जारी रहेगा। लाखों भारतीयों के लिए नरेन्द्र मोदी वह प्रेरक शक्ति साबित हुए हैं जिसकी भारत को सख्त जरूरत है।

Team Desk