ममता दी का आलाप!

Summary :

प. बंगाल की मुख्यमन्त्री और तृणमूल कांग्रेस पार्टी की सर्वेसर्वा सुश्री ममता बनर्जी का यह कहना कि वह राज्य विधानसभा के चुनावों में करारी हार के बावजूद पद से इस्तीफा नहीं देंगी, पूरी तरह गैर संवैधानिक, अनैतिक और अलोकतान्त्रिक है। केवल इतना ही नहीं बल्कि उनका यह फैसला स्वयं उनके राजनैतिक सिद्धान्तों के भी खिलाफ है क्योंकि एक तरफ चुनाव आयोग पर वह संविधान के अनुसार काम न करने का आरोप लगा रही हैं और दूसरी ओर इसके समानान्तर स्वयं ही ऐसा काम कर रही हैं। संविधान कहता है कि किसी राज्य का मुख्यमन्त्री चुनावों में अपनी पार्टी के हार…

प. बंगाल की मुख्यमन्त्री और तृणमूल कांग्रेस पार्टी की सर्वेसर्वा सुश्री ममता बनर्जी का यह कहना कि वह राज्य विधानसभा के चुनावों में करारी हार के बावजूद पद से इस्तीफा नहीं देंगी, पूरी तरह गैर संवैधानिक, अनैतिक और अलोकतान्त्रिक है। केवल इतना ही नहीं बल्कि उनका यह फैसला स्वयं उनके राजनैतिक सिद्धान्तों के भी खिलाफ है क्योंकि एक तरफ चुनाव आयोग पर वह संविधान के अनुसार काम न करने का आरोप लगा रही हैं और दूसरी ओर इसके समानान्तर स्वयं ही ऐसा काम कर रही हैं। संविधान कहता है कि किसी राज्य का मुख्यमन्त्री चुनावों में अपनी पार्टी के हार जाने के बाद अपने पद से त्यागपत्र दे देगा जिससे नया जनादेश पाने वाली पार्टी का नेता नया मुख्यमन्त्री बन सके।

इस बारे में संविधान पूरी तरह स्पष्ट है कि चुनाव परिणाम आने के बाद काबिज मुख्यमन्त्री को नये मुख्यमन्त्री के लिए रास्ता साफ कर देना चाहिए जिससे हर पांच साल बाद (या जैसी परिस्थिति बने) होने वाले चुनावों में यदि काबिज मुख्यमन्त्री की पार्टी भी जीतती है तो उसे विधानसभा का जारी कार्यकाल पूरा होने से पहले ही अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप देना होगा, बेशक राज्यपाल उनसे यह कह सकते हैं कि जब तक नई विधानसभा का गठन नहीं होता है तब तक वह कार्यवाहक मुख्यमन्त्री बने रहें। प. बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई को पूरा हो रहा है और चुनाव आयोग ने नई विधानसभा गठित करने का प्रस्ताव राज्यपाल को दे दिया है अतः ममता दी केवल इसी दिन तक अपने पद पर हैं इसके बाद राज्यपाल के पास उन्हें बर्खास्त करने का उपाय बचता है।

मगर राज्यपाल यदि चाहें तो इससे पहले ही उनसे कह सकते हैं कि वह अपने पद से इस्तीफा दे दें। वास्तव में ममता दी ने यह रास्ता केवल अपनी राजनीति को गर्म रखने के लिए चुना है जो कि देश के लोकतन्त्र की प्रतिष्ठा को गिराने वाला है। स्वतन्त्र भारत की यह पहली घटना है जब कोई मुख्यमन्त्री चुनाव में हार जाने के बावजूद कह रहा हो कि वह अपना पद नहीं छोड़ेगा। भारत के लोग दुनिया के सबसे बड़े पारदर्शी व जवाबदेह अमेरिकी लोकतन्त्र की वह घटना अभी तक नहीं भूले हैं जब 2020 में चुनाव हार जाने के बावजूद राष्ट्रपति ट्रम्प ने पद छोड़ने की बजाय अपने समर्थकों को वहां के संसद भवन में घुसा दिया था और कहा था कि चुनाव नतीजा सही नहीं दिया गया है तथा वह चुनाव नहीं हारे हैं और मतगणना में धांधली हुई है।

ममता दी भी 4 मई को घोषित चुनाव परिणामों के बारे में ऐसे ही आरोप लगा रही हैं और कह रही हैं कि विजयी पार्टी भाजपा ने चुनाव आयोग के साथ साजिश करके ऐसे चुनाव परिणाम दिये हैं। वह कह रही हैं कि उहें षड्यन्त्र करके चुनावों में हराया गया है जिससे 294 सदस्यों की विधानसभा में उनकी पार्टी के केवल 80 विधायक जीते हैं और भाजपा के 207 प्रत्याशी नये विधायक बन गये हैं। मगर यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इन चुनावों में स्वयं ममता दी भी कोलकाता की भवानीपुर सीट से 15 हजार से भी अधिक मतों से भाजपा प्रत्याशी श्री शुभेन्दु अधिकारी से चुनाव हार गई हैं।

इससे यह आभास होता है कि ममता दी संविधान के रास्ते को छोड़कर अराजकता की ओर बढ़ना चाहती हैं। उनका यह कहना “मैं हारी नहीं हूं,मैं, इस्तीफा नहीं दूंगी, मेरे इस्तीफा देने के लिए राज्यपाल निवास जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। इन चुनावों में भाजपा व चुनाव आयोग ने मिलकर गन्दा खेल खेला है और जबरन वोटों को लूटा है’’ बताता है कि उनकी मंशा क्या है? यदि वह इस लड़ाई को सड़कों पर ले जाना चाहती हैं तो भारतीय संविधान उन्हें पूरी तरह अहिंसक रहते हुए शान्तिपूर्ण आन्दोलन करने की इजाजत देता है। मगर उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि वह चुनाव आयोग के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में भी लड़ रही हैं और न्यायालय ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण करने की संवैधानिकता के बारे में अपना निर्णय सुरक्षित रखा हुआ है।

बेशक इस पुनरीक्षण में बंगाल के 91 लाख मतदाताओं के नाम काटे गये हैं और इनमें 27 लाख ऐसे नागरिक हैं जिनके पास आयोग द्वारा पात्रता के लिए आवश्यक दस्तावेजों के प्रमाण भी बताये जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर इन मतदाताओं की तस्दीक करने के लिए राज्य में 19 ट्रिब्यूनलों का गठन भी हो चुका है मगर ये ट्रिब्यूनल मतदान से पूर्व इनकी सुनवाई नहीं कर सके। 27 लाख मतदाताओं में से कुछ तो ऐसे भी थे जो मतदाता बनने के देश के सर्वोच्च न्यायालय से ही आदेश लेकर आये और फिर उन्होंने चुनाव लड़ा और जीते भी। ऐसे ही लोगों में से एक फरक्का चुनाव क्षेत्र से विजयी कांग्रेस के उम्मीदवार मोताब शेख हैं।

इस चुनाव क्षेत्र में मतदान पहले चरण 23 अप्रैल को हुआ था। श्री शेख ने अपना नामांकन उसी दिन 6 अप्रैल को भरा जो पर्चा दाखिल करने का अन्तिम दिन था। अतः चुनाव आयोग के खिलाफ ममता दी की लड़ाई कायदे से न्यायालय में ही होनी चाहिए। यदि वह इस लड़ाई को सड़कों पर ले जाती हैं तो बंगाल के माहौल को देखते हुए इसमें हिंसा होने का अन्देशा रहेगा, क्योंकि प. बंगाल में चुनाव बाद हिंसा का प्रचलन भी नया नहीं है, हालांकि ममता दी कह रही हैं कि उनकी पार्टी ने केवल भाजपा से ही चुनाव नहीं लड़ा है बल्कि चुनाव आयोग से भी चुनाव लड़ा है जो भाजपा के लिए काम कर रहा था।

भारत के लोकतन्त्र में किसी राजनैतिक दल द्वारा चुनाव आयोग पर एेसे आरोप भी पहली बार ही लग रहे हैं। मगर ममता दी को यह भी याद रखना चाहिए कि 1975 में देश पर इमरजेंसी थोपने वाली तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. इन्दिरा गांधी ने अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में ही 1977 में हुए लोकसभा चुनावों का परिणाम सिर माथे लेते हुए अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था जबकि वह भी उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से खुद अपना चुनाव हार गई थीं। अतः ममता दी को भारत के लोकतन्त्र की प्रतिष्ठा किसी भी सूरत में ऊपर रखनी चाहिए।

Aditya Chopra

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