समान नागरिक संहिता का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। देश में वर्ष 1961 में गोवा सरकार ने सबसे पहले समान नागरिक संहिता कानून लागू किया था। एक देश में दो विधान क्यों चले इस पर राष्ट्रव्यापी बहस कई बार छिड़ चुकी है। भारत में इसे लागू करने की जरूरत 1985 की एक याचिका श्रीमती जॉर्डन डेगे बनाम एस.एस. चोपड़ा मामले में महसूस हुई थी। श्रीमती जॉर्डन ईसाई थीं जबकि एस.एस. चोपड़ा सिख थे। इनके तलाक की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समान नागरिक संहिता लागू करने की पहली बार जरूरत जाहिर की थी। इसके बाद ऐसी कई याचिकाएं अदालतों में आई, बहुत चर्चित हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कहा है कि अब समान नागरिक संहिता लागू करने का समय आ गया है। शीर्ष अदालत ने 1937 के शरिया कानून के प्रावधानों को मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे निरस्त करने वाली याचिका पर यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि यह बहुत अच्छा मामला है। सभी धर्मों की महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए एक समान कानून की जरूरत महसूस की जा सकती है लेकिन इस पर केवल सरकार को ही विचार करना चाहिए। याचिका में मुस्लिम महिलाओं को विरासत और उत्तराधिकार में बराबर अधिकार दिलाने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की मांग की गई थी। याचिका में कहा गया था कि फिलहाल मुस्लिम महिलाओं को अपने माता-पिता की सम्पत्ति में बहुत कम हिस्सा मिलता है जिसे बदलने की जरूरत है।
पीठ ने यह भी चेताया कि अगर 1937 का शरिया कानून पूरी तरह से हटा दिया जाता है तो इससे कानूनी खालीपन पैदा हो सकता है। अदालतें कानून नहीं बना सकतीं। इसलिए बेहतर होगा कि इस तरह के व्यापक कानून से जुड़े फैसले सरकार पर छोड़ देने चाहिए। समान नागरिक संहिता का विचार नया नहीं है। संविधान बनाने वालों ने इसकी कल्पना की थी और इसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में शामिल किया गया है। अनुच्छेद 44 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की कोशिश करे।
हालांकि अनुच्छेद 44 राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों में आता है, इसलिए इसे अदालतें सीधे लागू नहीं कर सकतीं। फिर भी यह इस संवैधानिक सोच को दर्शाता है कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण जैसे मामलों से जुड़े नागरिक कानूनों को अंततः धार्मिक आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय एक सामान्य कानूनी ढांचे के तहत लाया जाना चाहिए। यद्यपि उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन चुका है, जहां पिछले वर्ष समान नागरिक संहिता लागू हो चुकी है। इसके बाद मध्य प्रदेश, गुजरात और अन्य भाजपा शासित राज्यों ने समान नागरिक संहिता की ओर कदम बढ़ाए हैं।
सवाल है कि इस संंबंध में केन्द्रीय स्तर पर कानून बनाने का। समान नागरिक संहिता में देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक समान कानून होता है चाहे वह किसी धर्म या जाति का क्यों न हो। समान नागरिक संहिता का अर्थ धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर पूरे देश में एक समान कानून लागू करने से है। समान नागरिक संहिता में शादी, तलाक, जमीन-जायदाद के बंटवारे और उत्तराधिकार गोद लेने जैसे सामाजिक मुद्दे सभी एक कानून के अन्तर्गत आ जाते हैं। किसी धर्म के आधार पर कोई अलग कोर्ट या अलग व्यवस्था नहीं होती लेकिन भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां सभी धर्मों के लिए अलग-अलग नियम हैं। सम्पत्ति, विवाह, तलाक के नियम हिन्दुओं, मुस्लिमों, ईसाइयों के लिए अलग-अलग हैं।
यह सवाल बार-बार उठा है कि जब अापराधिक मामलों में सभी समुदायों के लिए एक कानून का पालन होता है तब सिविल मामलों में सभी के लिए अलग-अलग कानून क्यों है? कानूनों में बदलाव होते रहे हैं। अगर हिन्दू बिल नहीं लाया जाता तो न दहेज विरोधी कानून पास हो पाता और न ही सती प्रथा जैसी कुरीति का अंत हो पाता। जब भी इस मुद्दे पर आगे बढ़ा जाता है तो मुस्लिम संस्थाएं इसके विरोध में उतर आती हैं, जमकर राजनीति होती है और कहा जाता है कि यह कानून संविदान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन करता है। जिसमें कहा गया है कि संविधान ने देश के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया है।
परिवार और उत्तराधिकार के विषय संविधान की समवर्ती सूची में आते हैं। इसलिए राज्य सरकारों को यह अधिकार प्राप्त है कि वे अपने राज्य के नागरिकों के लिए एक समान कानून बना सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियां एक बार फिर यह याद दिलाती हैं कि संवैधानिक वादे को वास्तविकता में बदलने का समय आ चुका है। समानता के सिद्धांत पर चलने वाले लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्थाओं को नहीं बनाए रखा जा सकता जो धार्मिक पहचान के आधार पर मुस्लिम महिलाओं से गैर बराबरी का व्यवहार करता हो। समान नागरिक संहिता की दिशा में लगातार संवाद के साथ कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि ऐसा कानूनी ढांचा तैयार हो सके जिस पर व्यापक सहमति हो।
समान नागरिक संहिता महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करेगी। साथ ही इसकी एकरूपता से देश में राष्ट्रवादी भावना को बल मिलेगा। इससे कई विवाद अपने आप हल हो जाएंगे और इसके लागू होने से नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता, इबादत, खान-पान और धार्मिक परम्पराओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।


Download Android App
Download iOS App




