जरा सी आहट होती है तो दिल सोचता है…

पंजाब केसरी की डायरेक्टर व वरिष्ठ नागरिक केसरी क्लब की चेयरपर्सन श्रीमती किरण चोपड़ा

जरा सी आहट होती है तो दिल सोचता है कि अश्विनी जी तो नहीं, सच में आज 6 वर्ष हो रहे हैं तब भी मन को विश्वास नहीं होता कि वो फिजिकली नहीं हैं। क्योंकि वो उनके साथ एक-एक पल​​ बिताना और दूसरा वो इतने धनी व्यक्तित्व वाले इंसान से कि उनके न होने का अहसास कभी हो ही नहीं सकता। वो मेरे बचपन के साथी थे। एक सफल क्रिकेटर जिन्होंने क्रिकेट देश के लिए उस समय छोड़ी (इमरजैंसी के कारण) जब वह कैरियर की बुलंदी पर थे। फिर उन्होंने अपने पिता, दादा की इच्छा के अनुसार कलम उठाई आैर उनकी कलम में उनके दादा और पिता का मिश्रण था। निष्पक्ष, निर्भिक, निडर पत्रकार जिनकी कलम न किसी के आगे झुकी, न रुकी। यह उनकी कलम की ताकत थी कि उन्होंने पंजाब केसरी को राष्ट्रीय समाचारपत्र बना दिया। उनके सम्पादकीय जगह-जगह पढ़े जाते और फोटो कॉपी करके बांटे जाते। यही नहीं दिल्ली में अखबार चलाना खालाजी का घर नहीं था परन्तु उन्होंने हर विरोधी ताकत का डटकर मुकाबला किया। यहां तक कि हॉकरों के साथ बैठकर अखबार बेची और उनके साथ सुबह-सुबह चाय की चुसकियां भी लीं। इमरजैंसी में उन्होंने अपने दादा, पिता, चाचा के साथ मिलकर ट्रैक्टर से अखबार छापी। जब उनकी प्रेस की बिजली काट दी गई थी।
छोटी उम्र में दादा और पिता की शहीदी देखी, अपने ऊपर आतंकवादियों के वार सहे परन्तु कभी हिम्मत नहीं हारी। उस छोटी सी उम्र में वह दादा के गोलियों से छलनी शरीर और पिता का छलनी शरीर गोदी में उठाकर घर लाए। उस छोटी उम्र में अपने सारे परिवार का दायित्व सम्भाला। जब छोटी उम्र में ​िपता का साया उठ जाए तो कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। कई अपने बेगाने भी हो जाते हैं, पर अश्विनी जी मजबूती से डटे रहे। मुझे भी हर पल अपने साथ रखते और काम भी समझाते, क्योंकि आज मैं जो भी हूं, जो भी लिखना सीखा और मुसीबतों का डटकर मुकाबला करना सीखा सब उनकी देन है। वो मेरे पति, मित्र, गुरु सभी कुछ थे। हम दोनों एक-दूसरे को हमेशा सही-गलत बताते थे। एक-दूसरे के आलोचक भी थे और दो अलग स्तम्भ भी थे, परन्तु हमेशा साथ-साथ चलते, हमेशा साथ-साथ काम करते थे।
उन्होंने छोटों से लेकर टॉप तक मित्रता बनाई। सबके दिलों को अपनी सच्चाई से छुआ। आज भी उनके कई मित्र, कई ​लोग मिलते हैं जो उनकी अच्छाई, सच्चाई और भोलेपन को भी याद करते हैं। उनके चरित्र के दो पहलू थे। एक तरफ वो बहुत ज्ञानी थे, जिन्होंने वेद पढ़े हुए थे। हिस्ट्री, ज्योग्राफी, पोलिटिकल, धर्म, ज्योतिष का पूरा ज्ञान था। दूसरी तरफ बहुत शरारती, नटखट, सिंगर और बच्चों की तरह भोलापन था। कोई छल-कपट नहीं था। अगर वो किसी के हो जाते तो दिल से उसकी दोस्ती, रिश्ता निभाते। अगर किसी से नाराज होते तो उसको भी घर तक पहुंचाते थे। हां उनकी एक खासियत थी कि अगर कोई व्यक्ति अहंकार में होता या अवसरवादी हो तो उसकी परवाह नहीं करते थे। वह कहते थे उसे हमें याद करना चाहिए और दूसरी तरफ अगर किसी व्यक्ति के दिन बुरे होते तो वह उसको उठाते थे, बहुत सहायता करते थे। आज छोटे से बड़े तक बहुत लोग मिलेंगे जो कहेंगे अश्विनी जी ने उनकी मदद की।
अश्विनी जी जब करनाल से एमपी बने तो बहुत अधिक मतों से जीते तो लोगों के दिलों में उन्होंने राज किया। आज भी उनकी याद में उनके कामों को याद करते लोग फोन करते रहते हैं और एक ही पंक्ति बोलते हैं कि ऐसा एमपी हमें कभी नहीं मिलेगा जो राजनीतिक नहीं समाजसेवी थे। जब उन्हें कैंसर हुआ तो उन्होंने इट्स माई लाइफ अपने हाथों से लिखे लेखों की शृंखला चलाई। जिसे बाद में मैंने सम्पूर्ण संकलित करके बुक बनाई। बस दुख इस बात का है जब वो बीमार हुए तो बहुत से अपनों ने फायदा उठाया। उनको जाते-जाते कष्ट दिया। कई विभीषण, जयचंद पैदा हुए परन्तु आखिरी दिन तक उन्होंने हार नहीं मानी। खुद भी हौसला रखा और मुझे, मेरे बेटों को भी हौसले में रखा, कहा कि ऐसे दिनों में अपने-परायों की पहचान होती है। सबको माफ करते जाएं। यह उनके कर्म हैं और नीचता है, जो इस समय का दुरुपयोग कर रहे, पाप ले रहे हैं। उनकी इसी बात पर आज मैं और मेरे बेटे मजबूती से काम करते हुए अखबार विरासत को आगे ले जा रहे हैं। जिन्दगी के पल-पल में, कण-कण में वो ​दिखाई देते हैं और हमें हमेशा हमारे आसपास होने का अहसास देते हैं। आज उनकी याद में हम जरूरतमंद बुजुर्गों की सहायता कर रहे हैं। यह सब उनकी देन है। आज उनकी बदौलत लाखों बुजुर्गों की सहायता हो रही है।
-किरण चोपड़ा
kiranchopra@punjabkesri.com
kiranchopradesk@gmail.com

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