बांग्लादेश में पिछले साल उठी चिंगारी अब ज्वालामुखी में बदल चुकी है। छात्र नेता और शेख हसीना की सरकार के तख्तापलट में बड़ी भूमिका निभाने वाले उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में हिंसा, आगजनी और बवाल फिर से शुरू हो गया है। हिंसा की ज्वालामुखी में अल्पसंख्यक हिन्दुओं की हत्याओं से लेकर भारत विरोधी जनभावनाओं का उग्र होना शामिल है। हिंसक भीड़ ने हिन्दू मजदूर दीप चंद्र दास की पीट-पीट कर हत्या करने के बाद शव को पेड़ से लटका कर जला दिया। इसके बाद हिंसक भीड़ ने पुलिस और सेना के सामने नाच-नाच कर जश्न मनाया। हिंसक भीड़ ने बीएनपी के नेता के घर में आग लगा दी जिसमें 7 वर्षीय बच्ची जिंदा जल गई। हिंसक भीड़ ने मोहम्मद यूनुस सरकार को अल्टीमेटम भी दे दिया कि वह जल्द से जल्द उस्मान हादी के हत्यारों को गिरफ्तार करे अन्यथा उन्हें भी सरकार से हटा दिया जाएगा। बीते साल अगस्त में शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाये जाने के बाद से लगातार हिन्दुओं को निशाना बनाया जा रहा है और वहां अब तो हिन्दू महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए कहा जा रहा है। भारत विरोधी कट्टरपंथी ताकतें प्रभावी हो चुकी हैं। बांग्लादेश में 2 माह बाद यानि फरवरी में चुनाव होने वाले हैं, ऐसे में हिंसा का भड़कना चुनावों को अवरुद्ध करने का कारण बन सकता है। प्रधानमंत्री की हैसियत से काम करने वाले मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस और उनके साथ सरकार में शािमल नेता बार-बार भारत विरोधी भावनाओं को भड़का रहे हैं। उस्मान हादी के जनाजे में भी भारत विरोधी पोस्टर देखे गये और भारत विरोधी नारे लगे। उस्मान हादी एक कट्टरपंथी मौलाना का नेता था। अतिवादी जेहादी विचारधारा के चलते ही उसने हाल ही में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों पर कब्जा करने वाले बयान दिए थे। उसकी हत्या करने वाले जानते थे कि हमले का आरोप भारत पर ही लगेगा और हुआ भी यही। कट्टरपंथी ताकतों ने उस्मान हादी की हत्या का आरोप भारत पर मड़कर ऐसा माहौल पैदा कर दिया जिससे यह निश्चित है कि बांग्लादेश के आगामी चुनाव में भारत विरोध ही सबसे बड़ा मुद्दा होगा। हालात बताते हैं कि अमेरिका के समर्थक माने-जाने वाले मोहम्मद यूनुस के मुंह को सत्ता का खून लग गया है और वह सरकार से हटना नहीं चाहते। वे चुनावों को किसी न किसी तरह टालना चाहते हैं। वे कट्टपंथियों के हाथों की कठपुतली बन चुके हैं। जब कट्टपंथियों ने भारतीय दूतावास और वीजा केन्द्रों को निशाना बनाना शुरू किया तब भी वे उदासीन बने रहे। हैरानी की बात तो यह है कि 1971 के युद्ध में भारत ने ही बांग्लादेश को आजाद कराया था। बीते 16 दिसम्बर को भारत ने विजय दिवस मनाया क्योंकि 1971 में इसी दिन पाकिस्तान के 90 हजार सैनिकों ने भारत के सामने हथियार डाल दिये थे लेकिन बांग्लादेश भारत के एहसानों को भुलाकर अब भारत के ही विरोध में खड़ा है।
शेख हसीना और उनकी अवामी लीग सरकार के प्रति भारत के कथित नरम रवैये की शुरू से ही चर्चा होती रही है। बांग्लादेश के छात्र नेता और जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी पार्टियां बीते साल अगस्त से ही यह मुद्दा उठाती रही हैं। बीते अगस्त से ही भारत में रह रहीं पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को शरण देने के मुद्दे पर संबंधों में तनातनी रही है।
बांग्लादेश की एक अदालत ने हसीना को मौत की सजा सुनाई है। उसके बाद अंतरिम सरकार कम से कम दो बार औपचारिक रूप से भारत से हसीना को प्रत्यर्पित करने की मांग कर चुकी है लेकिन भारत ने इस पर चुप्पी साध रखी है। इससे कट्टरपंथी दलों और अंतरिम सरकार की नाराजगी लगातार बढ़ी है। अब हाल में दो तल्ख बयान ने द्विपक्षीय संबंधों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
पिछले एक दशक तक शेख हसीना सरकार को भारत का करीबी माना गया। इस दौरान सीमा सुरक्षा, आतंकवाद पर सहयोग, कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स और चीन के प्रभाव को संतुलित करने जैसे मुद्दों पर ढाका और दिल्ली की साझेदारी मजबूत रही लेकिन हसीना के पतन के बाद एक नई राजनीतिक पीढ़ी उभरकर सामने आई है जो भारत और शेख हसीना को लेकर जो रिश्ते हैं, उसे बिल्कुल पसंद नहीं करती है।
बांग्लादेश में शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान जो चुनाव हुए उसमें काफी कम वोटर टर्नऑउट रहा है। काफी कम संख्या में लोगों ने वोट डाले हैं। ऐसे में फरवरी 2026 में जो चुनाव होने हैं, उसे लेकर लोगों में काफी उत्सुकता है। लोगों ने 17 सालों से वोट नहीं डाले हैं, इसलिए उनमें वोट डालने की जो भूख है, वो उनके चेहरे से आप महसूस कर रहे हैं।
अराजकता की स्थिति में कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी को लगता है कि उनके पास सत्ता पाने का मौका है। इन ताकतों को पाकिस्तान, पाकिस्तान की सेना और आईएसआई का समर्थन प्राप्त है। पाकिस्तान की आईएसआई के अफसरों ने ढाका में डेरा डाल रखा है। खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बीएनपी का प्रभाव लोगों में है लेकिन वह खुद वयोवृद्ध और अस्वस्थ है। शेख हसीना की पार्टी को चुनावों के लिए प्रतिबंधित किया जा चुका है। ऐसे में निष्पक्ष चुनावों की उम्मीद नहीं की जा सकती। बांग्लादेश में चीन का हस्ताक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है। शशि थरूर के नेेतृत्व वाली संसदीय समिति ने सरकार को आगाह कर दिया है कि आवामी लीग की गिरावट, युवा नेतृत्व वाले राष्ट्रवाद का उदय इस्लामी ताकतों की वापसी और साथ ही चीन और पाकिस्तान का बढ़ता प्रभाव यह सभी मिलकर बांग्लादेश में निर्णायक मोड़ पर हैं और स्थिति 1971 के बाद सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है। हालात और बिगड़े तो भारत के लिए गंभीर खतरा पैदा हो जाएगा। चिंता युद्ध की या बांग्लादेश से टकराव की नहीं है, बल्कि चिंता यह है कि चीन और पाकिस्तान बांग्लादेश में पांव पसार लेंगे। चुनाव से पहले बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले और तेज हो सकते हैं। भारत की पूर्वी सीमा पर एक जेहादी देश का उभरना भारत के लिए खतरे की घंटी बन जाएगा। बांग्लादेश मोहम्मद यूनुस के कंट्रोल से बिल्कुल बाहर हो चुका है। अर्थव्यवस्था और रोजगार के हालात बुरे हैं। सामाजिक अस्थिरता बढ़ रही है, कानून व्यवस्था का बुरा हाल है। बांग्लादेश का भविष्य सुरक्षित नहीं लगाता।
बांग्लादेश में कट्टरपंथ का ज्वालामुखी
Summary :
बांग्लादेश में पिछले साल उठी चिंगारी अब ज्वालामुखी में बदल चुकी है। छात्र नेता और शेख हसीना की सरकार के तख्तापलट में बड़ी भूमिका निभाने वाले उस्मान हादी की हत्या के बाद बांग्लादेश में हिंसा, आगजनी और बवाल फिर से शुरू हो गया है। हिंसा की ज्वालामुखी में अल्पसंख्यक हिन्दुओं की हत्याओं से लेकर भारत विरोधी जनभावनाओं का उग्र होना शामिल है। हिंसक भीड़ ने हिन्दू मजदूर दीप चंद्र दास की पीट-पीट कर हत्या करने के बाद शव को पेड़ से लटका कर जला दिया। इसके बाद हिंसक भीड़ ने पुलिस और सेना के सामने नाच-नाच कर जश्न मनाया। हिंसक…



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