असहमति और संघर्ष हों, पर अपशब्द न हों

Summary :

कांग्रेस के समागम में एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोसा गया, बद्दुआएं और गालियों से नवाजा गया, जिसमें मुख्य थी, “मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी”। जब कांग्रेसी नेताओं से पूछा गया कि क्या वे भी ऐसा ही सोचते हैं, जैसा उनकी एक राजस्थानी कांग्रेसी नेता ने कैमरे के सामने कई बार कहा, तो बजाय उसको निलंबित करने की बात कहने के ऐसे बन गए कि जैसे कुछ पता ही न हो! मोदी को दी गई गालियों में जो शुरूआत राजेंद्र पटेरिया ने उनकी मृत्यु की बद्दुआ देकर की थी और अखिलेश यादव का कोसना कि मोदीजी बार-बार अयोध्या आ…

कांग्रेस के समागम में एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोसा गया, बद्दुआएं और गालियों से नवाजा गया, जिसमें मुख्य थी, “मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी”। जब कांग्रेसी नेताओं से पूछा गया कि क्या वे भी ऐसा ही सोचते हैं, जैसा उनकी एक राजस्थानी कांग्रेसी नेता ने कैमरे के सामने कई बार कहा, तो बजाय उसको निलंबित करने की बात कहने के ऐसे बन गए कि जैसे कुछ पता ही न हो! मोदी को दी गई गालियों में जो शुरूआत राजेंद्र पटेरिया ने उनकी मृत्यु की बद्दुआ देकर की थी और अखिलेश यादव का कोसना कि मोदीजी बार-बार अयोध्या आ रहे हैं।
उनके विरुद्ध 91 ऐसी गालियां दी गई हैं, जिनको यहां लिखा नहीं जा सकता। लोकतांत्रिक विमर्श की गिरती भाषा का स्तर इतना गिर जाएगा, कोई सोच भी नहीं सकता था! चूंकि भारत एक सेक्युलर और आज़ाद विचारों वाला देश है, और अभिव्यक्ति पर कोई नकेल नहीं कस सकता, इसका नाजायज लाभ भी उठाया जा रहा है, जैसा विरोध संसद के अंदर और बाहर कई लोग करते हैं। वास्तव में इससे देश की साख को बट्टा लगता है। एक बार मोदीजी ने कहा था कि उन्हें तीन- तीन किलो गालियां दी जाती हैं। उनकी विशेषता यह है कि न तो वे पलट कर इन असभ्य अपशब्दों का जवाब देते हैं और न ही ये सब उन्हें अपने पथ से दिगभ्रष्ट करता है। एक बार कर्नाटक में उनसे किसी रिपोर्टर ने पूछा कि वे इन गालियों का जवाब क्यों नहीं देते तो उन्होंने कहा था कि उनके पास जब पॉजिटिव काम करने का ही समय नहीं है तो नेगेटिव के लिए कहां से समय लाएं! एक बार उन्होंने यह भी कहा कि उनके ऊपर जो पत्थर फेंके जाते हैं, उनको चुन कर वे मकान बना लेते हैं ग़रीबों के लिए! हां एक बात और, इन गलियों से कई बार लाभ भी पहुंचा है। मोदीजी को ही नहीं, बल्कि भाजपा को भी क्योंकि जितनी अधिक गलियों से उन्हें परोसा जाता है, उतने ही बड़े मार्जिन से वे कांग्रेस, वामपंथियों और अन्य विपक्ष को चुनावों में पटक देते हैं! यदि भाजपा को हराना है तो उसे गालियां देना बंद करना होगा! लोकतंत्र में असहमति का अधिकार जितना पवित्र है, उतनी ही आवश्यक उसकी भाषा की मर्यादा भी है। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षों में यह देखा गया है कि राजनीतिक मतभेदों की अभिव्यक्ति तर्क और तथ्य के बजाय गाली-गलौज, व्यक्तिगत हमलों और अपमानजनक शब्दावली में बदलती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस प्रवृत्ति के प्रमुख लक्ष्य बने हैं। नरेंद्र मोदी देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री हैं। उनसे असहमत होना, उनकी नीतियों की आलोचना करना और सरकार से सवाल पूछना लोकतांत्रिक अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्त्तव्य भी है, लेकिन जब आलोचना व्यक्ति-हत्या, जाति-धर्म पर कटाक्ष, परिवार और निजी जीवन पर हमलों में बदल जाती है, तब यह न केवल लोकतंत्र को कमजोर करती है, बल्कि समाज को भी विभाजित करती है। गालियों की राजनीति दो स्तरों पर नुक्सान पहुंचाती है। पहला, यह विचारधारा की गरीबी को उजागर करती है – जहां तर्क नहीं होते, वहां शब्दों की हिंसा शुरू हो जाती है। दूसरा, यह कि वह युवा पीढ़ी को गलत संदेश देती है कि सत्ता या असहमति से निपटने का तरीका शालीन संवाद नहीं, बल्कि अपमान है। यह भी सच है कि प्रधानमंत्री मोदी एक सशक्त और प्रभावशाली नेता हैं, जिनके समर्थक करोड़ों में हैं और आलोचक भी कम नहीं। उनकी नीतियों – चाहे वह अर्थव्यवस्था हो, विदेश नीति हो या सामाजिक मुद्दे-पर गंभीर, तथ्यपूर्ण और वैचारिक बहस संभव है, किंतु गालियां बहस का विकल्प नहीं हो सकतीं। लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि हम विचार से विचार का मुकाबला करें, न कि व्यक्ति को नीचा दिखाने की होड़ में उतरें। प्रधानमंत्री हों या कोई भी जनप्रतिनिधि-सम्मानजनक भाषा, मर्यादित आलोचना और तथ्याधारित असहमति ही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल, सामाजिक कार्यकर्ता, मीडिया और आम नागरिक, सभी मिलकर यह तय करें कि असहमति होगी, संघर्ष होगा, लेकिन गालियों की जगह तर्क और विवेक होगा। यही भारत की लोकतांत्रिक परंपरा रही है और यही उसका भविष्य भी होना चाहिए, यदि इस बात का ध्यान रखा गया तो भारत बहुत जल्दी जगत गुरु बन जाएगा।

Team Desk