पंजाब में ग्रामीण चुनाव

Summary :

पंजाब के ग्रामीण जिला परिषद व पंचायत समितियों के गत रविवार को हुए चुनावों में मतदान 48.40 प्रतिशत रहा है जो कि अभी तक का सबसे कम मतदान प्रतिशत है। इसका मतलब क्या यह निकाला जाये कि मतदाताओं की इन चुनावों में ज्यादा रुचि नहीं है? वास्तव में एेसा नहीं है क्योंकि पंजाब देश का इकलौता एेसा राज्य है जिसने ग्रामीण स्तर पर गौरवशाली विकास यात्रा शुरू करके राज्य में औद्यो​िगकरण की नींव रखी। इसका कारण यह माना जा रहा है कि पारंपरिक रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत रही अकाली दल पार्टी अपना जनाधार खोती जा रही है और…

पंजाब के ग्रामीण जिला परिषद व पंचायत समितियों के गत रविवार को हुए चुनावों में मतदान 48.40 प्रतिशत रहा है जो कि अभी तक का सबसे कम मतदान प्रतिशत है। इसका मतलब क्या यह निकाला जाये कि मतदाताओं की इन चुनावों में ज्यादा रुचि नहीं है? वास्तव में एेसा नहीं है क्योंकि पंजाब देश का इकलौता एेसा राज्य है जिसने ग्रामीण स्तर पर गौरवशाली विकास यात्रा शुरू करके राज्य में औद्यो​िगकरण की नींव रखी। इसका कारण यह माना जा रहा है कि पारंपरिक रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत रही अकाली दल पार्टी अपना जनाधार खोती जा रही है और इसके स्थान पर आम आदमी पार्टी व कांग्रेस के बीच युद्ध चल रहा है। वैसे गांवों में कांग्रेस का भी जनाधार साठ के दशक तक बहुत मजबूत रहा है और इसके राज में ही पंजाब ने अपने चहुंमुखी विकास की इबारत लिखी थी। अभी तक पंजाब के जितने भी मुख्यमन्त्री हुए हैं उनमें स्वर्गीय प्रताप सिंह कैरों का विशिष्ट स्थान है। उनके ही शासन के दौरान 1956 से लेकर 1964 तक पंजाब भारत का ‘स्विट्जरलैंड’ कहलाने लगा था। स्व. कैरों ही पंजाब में हरित क्रान्ति के जनक थे जिसके बल पर उन्होंने पंजाब को औद्योगिक क्षेत्र में अग्रणी राज्य बनाया था।
श्री कैरों पंजाब की राजनीति में सक्रिय होने से पहले अमेरिका में अर्थशास्त्र के विद्यार्थी थे मगर इस विषय में स्नातकोत्तर डिग्री लेने के बाद उन्होंने लगातार दो वर्ष तक अमेरिका के किसानों के खेती करने के तौर-तरीकों के बारे में गंभीर अध्ययन किया था। खेती में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल का प्रयोग उन्होंने राज्य में मुख्यमन्त्री बनने के बाद किया और उसके बल पर ही 1964 तक पंजाब के हर गांव में बिजली पहुंचाने के साथ ही प्रत्येक गांव को पक्की सड़कों से जोड़ा तथा प्रत्येक जिले में अद्यतन अस्पताल व तकनीकी शिक्षा प्रणाली आईटीआई की स्थापना की। उनके ही जमाने में खेती के क्षेत्र में बिहार से कृषि कर्मियों का पंजाब की ओर पलायन शुरू हुआ जिससे बिहार के लोगों की भी आय में वृद्धि हुई। ध्यान देने वाली बात यह है कि तब तक पंजाब का बंटवारा नहीं हुआ था और हरियाणा भी इसी में समाहित था। इस प्रकार स्वर्गीय कैरों एक पुख्ता पंजाब की नींव रखकर गये। मगर उनके अवसान के बाद पंजाब का विभाजन 1966 में हुआ और 1967 के आम चुनावों के बाद राज्य में अकाली दल का प्रादुर्भाव शुरू हुआ। इसमें भी ग्रामीण क्षेत्रों में इस पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया जबकि शहरी इलाकों में तत्कालीन जनसंघ ने बेहतरी दिखाई। इन चुनावों के बाद राज्य में पहली बार अकाली-जनसंघ का गठबन्धन हुआ और इसी की स्व. गुरुनाम सिंह के नेतृत्व में सरकार गठित हुई।
भारतीय राजनीतिक पटल पर यह गठबन्धन देश में सबसे पुराना है जिसमें अब दरार पैदा हो चुकी है। पिछले दशक तक अकाली दल की जड़ें गांवों में बहुत मजबूत थीं परन्तु राज्य में आम आदमी पार्टी के उभरने के बाद अब इसकी जमीन दरकने लगी है। आम आदमी पार्टी ने शहरों से लेकर गांवों तक अपनी पैठ बनायी है परन्तु गांवों में अभी भी कांग्रेस व अकाली दल का प्रभाव देखा जा सकता है। इसका दूसरा कारण राज्य में चला किसान आन्दोलन भी है परन्तु इस आन्दोलन के नेता जिस प्रकार विभिन्न राजनीतिक दलों में बिखरे उससे ग्रामीण जनता में विक्षोभ ही पैदा हुआ जिसका लाभ सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को परोक्ष रूप से मिला। राज्य की वर्तमान आप पार्टी की भगवन्त सिंह मान सरकार के लिए ग्रामीण क्षेत्र ही सबसे बड़ी चुनौती भी हैं क्योंकि किसानों के बीच असन्तोष अभी समाप्त नहीं हुआ है मगर किसानों के निशाने पर भाजपा ज्यादा है जो कि केन्द्र में सत्तारूढ़ है। इसका लाभ कांग्रेस पार्टी लेने की फिराक में है और उसे इस बाबत सफलता भी मिली है क्योंकि विगत 2024 के लोकसभा चुनावों में असली मुकाबला कांग्रेस व आम आदमी पार्टी के बीच ही रहा।
राज्य की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए सत्तारूढ़ आप पार्टी के लिए यह घाटे का सौदा नहीं कहा जा सकता है। इसका असर हमें ग्रामीण चुनावों के परिणामों में भी देखने को मिल सकता है। जिला परिषद व पंचायत समितियों के चुनाव ईवीएम मशीनों से न होकर बैलेट पेपर से हो रहे हैं। इस वजह से भी इनका विशिष्ट महत्व है मगर चुनावों के दौरान जिस प्रकार 16 मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने की खबरें आयी हैं वे इस प्रणाली के लिए शुभ संकेत नहीं मानी जा सकतीं। इन मतदान केन्द्रों पर 16 दिसम्बर को पुनः मतदान कराया गया है। चुनाव परिणाम 17 दिसम्बर को आयेंगे मगर इतना निश्चित है कि कम मतदान होने की वजह से ग्रामीणों में उत्साह की कमी है। पंजाब में कुल 22 जिला परिषद हैं जिनके 347 जोन या परिक्षेत्र हैं तथा कुल 153 पंचायत समितियां हैं जिनके 2838 जोन हैं। इन सभी पर 9 हजार से अधिक प्रत्याशी मैदान में हैं। हालांकि चुनाव शान्तिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हो गये और कहीं से भी हिंसक झड़प की सूचना नहीं मिली मगर फिर भी कुछ स्थानों पर तनाव का वातावरण देखने को मिला। हालांकि कई स्थानों पर मतदान में देरी की सूचनाएं भी प्राप्त हुईं। बेशक कांग्रेस की ओर से मतदान को लेकर कई शिकायतें भी दर्ज हुईं मगर इनमें से कोई भी अति गंभीर किस्म की नहीं मानी गईं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष श्री प्रताप सिंह बाजवा ने सत्तारूढ़ आप पार्टी पर जो आरोप लगाये हैं वे सामान्य तौर पर जो भी पार्टी सत्ता में होती है उस पर लगाये ही जाते हैं मसलन प्रशासन का लाभ उठाना आदि। अकाली दल ने भी कुछ इसी तरह के आरोप लगाये हैं मगर उनका भी कोई खास वजन नहीं माना जा रहा है। कुल मिलाकर राज्य में ग्रामीण क्षेत्रोें में चुनाव मतदाताओं की विशेष रुचि से रहित रहे ही माने जायेंगे मगर बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों के परिणामों की तरफ सभी नागरिकों का विशेष ध्यान भी रहेगा।

Aditya Chopra

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