तीसरी भाषा कक्षा छह से?

Summary :

सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती बी.वी. नागरत्ना ने केन्द्र सरकार को सुझाव दिया है कि वह विद्यालयों में तीसरी भाषा की पढ़ाई बजाय कक्षा नौ से शुरू करने के कक्षा छह से शुरू करें जिससे छात्रों पर बोझ कम हो सके। क्योंकि कक्षा नौ में आते ही उन पर दसवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाओं का मनोवैज्ञानिक खौफ पैदा हो जाता है और वे पढ़ाई का दबाव महसूस करने लगते हैं। न्यायमूर्ति ने किशोर-मन का अत्यन्त व्यावहारिक विश्लेषण करते हुए मौखिक टिप्पणी की कि बोर्ड की परीक्षाओं का दबाव विद्यार्थियों पर तभी से आने लगता है जब वे कक्षा…

सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्रीमती बी.वी. नागरत्ना ने केन्द्र सरकार को सुझाव दिया है कि वह विद्यालयों में तीसरी भाषा की पढ़ाई बजाय कक्षा नौ से शुरू करने के कक्षा छह से शुरू करें जिससे छात्रों पर बोझ कम हो सके। क्योंकि कक्षा नौ में आते ही उन पर दसवीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षाओं का मनोवैज्ञानिक खौफ पैदा हो जाता है और वे पढ़ाई का दबाव महसूस करने लगते हैं। न्यायमूर्ति ने किशोर-मन का अत्यन्त व्यावहारिक विश्लेषण करते हुए मौखिक टिप्पणी की कि बोर्ड की परीक्षाओं का दबाव विद्यार्थियों पर तभी से आने लगता है जब वे कक्षा आठ की पढ़ाई कर रहे होते हैं। उनका यह विश्लेषण बिल्कुल सटीक है क्योंकि किसी भी विद्यार्थी के जीवन में बोर्ड की दसवीं की परीक्षा उसके जीवन का पहला महत्वपूर्ण शिक्षण सफलता का पड़ाव होती है जिसे पार करना उस अवस्था में वह अपना गुरुतर लक्ष्य मानता है। सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ तमिलनाडु में जवाहर नवोदय स्कूल खोलने को लेकर दाखिल याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका के सन्दर्भ में तमिलनाडु की पिछली द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम की एम.के. स्टालिन सरकार का कहना था कि नवोदय विद्यालय की स्कीम राज्य की द्विभाषा परिपाठी के मूलतः प्रतिकूल है जिसमें केवल अंग्रेजी व मातृभाषा तमिल पढ़ाई जाती है।
राज्य सरकार की ओर से पहले इस याचिका के सम्बन्ध में दलील दी गई थी कि नवोदय विद्यालय स्कीम त्रिभाषा फार्मूला पर आधारित है जो कि राज्य के 2006 के तमिलनाडु शिक्षण अधिनियम के विरुद्ध है। इसके तहत विद्यालयों में केवल दो भाषाएं ही पढ़ाने का प्रावधान है। जबकि नवोदय विद्यालय स्कीम इसके पूरी तरह विरुद्ध है जिसका आधार ही त्रिभाषा फार्मूला है। इसके तहत तीन भाषाओं हिन्दी, अंग्रेजी व मातृभाषा (क्षेत्रीय भाषा) की पढ़ाई जरूरी है। स्टालिन नीत तमिलनाडु सरकार का मानना था कि एेसा करके केन्द्र सरकार पिछले दरवाजे से छद्म तरीके से हिन्दी थोपने का प्रयोजन कर रही है। इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट कहना है कि तमिलनाडु सरकार अपनी शिक्षा नीति जारी रख सकती है मगर उसे विद्यार्थियों के लिए नवोदय विद्यालयों में भी अपना पंजीकरण कराने के विकल्पकों खुला रखना होगा। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि त्रिभाषा फार्मूले के तहत हिन्दी अनिवार्य नहीं है। अन्य सभी राज्यों में नवोदय विद्यालय चल रहे हैं तो तमिलनाडु को इससे क्यों वंचित रखा जाये। परन्तु तमिलनाडु में अब सत्ता परिवर्तन हो चुका है और राज्य में श्री जोसेफ विजय के नेतृत्व में नई पार्टी टीडीके की सरकार चल रही है जो नवोदय विद्यालय स्कीम के बारे में नये सिरे से विचार कर रही है। अतः न्यायालय ने उसे मुद्दे पर सोचने के लिए 11 अगस्त तक का समय दिया है जो कि सुनवाई की अगली तारीख तय की गई है। अतः बहुत साफ है कि न्यायमूर्ति नागरत्ना चाहती हैं कि त्रिभाषा फार्मूले को लागू करने के बारे में केन्द्र व राज्य सरकारें नया नजरिया अपनाएं और सोचें कि विद्यार्थियों के हित में क्या नीति रहेगी। उन्होंने तीसरी भाषा की पढ़ाई कक्षा छह से शुरू कराने पर जोर देते हुए यह टिप्पणी भी की कि कृपया केन्द्र सरकार से कहिये कि वह कक्षा नौ से तीसरी भाषा की पढ़ाई शुरू न करे। इससे छात्रों पर बहुत दबाव पड़ता है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि केवल कक्षा नौ से ही क्यों तीसरी भाषा की पढ़ाई शुरू की जाये? जाहिर है कि वह इसके पीछे का तर्क जानना चाहती हैं।
न्यायमूर्ति नागरत्ना वरिष्ठता के क्रम में देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश होने की कतार में भी हैं अतः शिक्षा के क्षेत्र में उनके इस सुझाव को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। इस सन्दर्भ में उन्होंने अपने स्कूली दिनों का ही उदाहरण दिया और बताया कि जब 1976 में वह कक्षा आठ की छात्रा थीं तो उस समय पढ़ाये जाने वाले किसी अध्याय की महत्ता व उपयोगिता कक्षा दस अर्थात बोर्ड की परीक्षा से मापी जाती थी। इस सन्दर्भ में दूसरा तर्क यह भी है कि यदि तीसरी भाषा की शिक्षा कक्षा पांच या छह से शुरू कराई जाती है तो विद्यार्थियों पर कम बोझ पड़ेगा और वे बाल्यावस्था में ही नई भाषा के विज्ञान से परिचित हो जायेंगे। पूरे देशवासी जानते हैं कि त्रिभाषा फार्मूला भारत में तब प्रकाश में आया था जब 1966 में उत्तर भारत में अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था। उस समय देश में स्व. इन्दिरा गांधी की सरकार थी और उन्होंने प्रख्यात शिक्षाविद् डाॅ. त्रिगुण सेन को शिक्षामन्त्री बनाकर इसका हल ढूंढा था। उस समय फार्मूला निकला था जिसके तहत अंग्रेजी को उत्तर भारत के राज्यों में वैकल्पिक विषय बना दिया गया था।
उत्तर भारत के अधिकतम राज्यों ने इसका अनुसरण भी किया था परन्तु तब भारत की एक पूरी पीढ़ी का अंग्रेजी ज्ञान अधकचरा रह गया था जिसका खामियाजा आज तक वह पीढ़ी भुगत रही है। उस समय समाजवादी चिन्तक व जन नेता डाॅ. राम मनोहर लोहिया अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन के प्रणेता थे। मेरा स्पष्ट मानना है कि यदि आज डाॅ. लोहिया जीवित होते तो उस आन्दोलन को अनुपयोगी मानते क्योंकि आज की पीढ़ी के भारतीय युवाओं ने अपने अंग्रेजी ज्ञान की वजह से ही पूरी दुनिया में कम्प्यूटर विज्ञान के क्षेत्र से लेकर अन्य प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अपनी पहचान अंग्रेजी ज्ञान की वजह से ही बनाई है। इस 21वीं सदी में न तो हिन्दी विरोध और न ही अंग्रेजी विरोध राष्ट्र हित में है क्योंकि आज विश्व स्तर पर नौकरी व व्यवसाय का वैश्वीकरण हो चुका है। जहां तक हर विद्यार्थी के तीसरी भाषा सीखने का सवाल है तो विशेषकर उत्तर भारत के विद्यार्थियों में दक्षिण भारत की भाषाएं सीखने की ललक होनी चाहिए जिससे भारत का सांस्कृतिक समागम और प्रगाढ़ हो सके तथा भारत की एकता मजबूत हो सके। इसी प्रकार दक्षिण के विद्यार्थियों में भी हिन्दी सीखने की चाह होनी चाहिए।

Aditya Chopra

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