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टाइगर जिंदा है

इस धरती का अर्थ केवल मानव जीवन ही नहीं है बल्कि इसका अर्थ धरती के सम्पूर्ण जीवन से है जिसमें पेड़-पौधे, जंगल, नदियां, जल प्रपात, छोटे-छोटे जीवों से लेकर विशालकाय जीव और मानव तक समाहित हैं। इनसे ही जीवन की पूरी कड़ी बनती है जो इस धरती के जीवन का आधार है। धरती से जंगली जानवरों का विलुप्त होना पर्यावरण और जलवायु के लिए बहुत बड़ा खतरा है। टाइगर स्वस्थ वन्य परिस्थितिकी का प्रतीक है। जहां टाइगर है तो इसका अर्थ यही है कि वहां पेड़-पौधे हैं, पानी है और घना जंगल है जिसमें उसके आहार के लिए सब कुछ मौजूद है। उसके आहार के जानवरों को जिंदा रहने के लिए और भी जानवरों और वनस्पतियों का होना बहुत जरूरी है। आजकल वन्य प्राणी उद्यानों से बाहर निकल कर टाइगर और तेंदुएं शहरों में घुस आते हैं और मनुष्य पर हमला करते हैं। इसका अर्थ यही है कि जंगल कम हो गए हैं और वह आहार की तलाश में भटक कर शहरों में आ जाते हैं। धरती पर संतुलित जीवन और पर्यावरण के लिए जानवरों का होना बहुत जरूरी है। इस समय दुनिया पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, सूखा, भूकम्प और महामारियों से लगातार जूझ रही है। ऐसे समय में भारत समेत पूरी दुनिया टाइगर जैसे जानवरों को बचाने के लिए पूरे प्रयास कर रही है। भारत ने इसलिए बाघ संरक्षण परियोजना शुरू की है।
नववर्ष में पश्चिम बंगाल में बक्सा नैशनल पार्क से एक अच्छी खबर आई है। नैशनल पार्क में लगे सीसीटीवी कैमरे में एक बाघ को नदी के पास देखा गया। असल में यह बाघ 12 दिसम्बर, 2021 को अचानक कहीं गायब हो गया था। ​विशेषज्ञों का कहना है कि रॉयल बंगाल टाइगर हमेशा के​ लिए पार्क में लौट आया है। इसे दुबारा रेनोकेट किया जा सकता है। रॉयल बंगाल टाइगर का देखा जाना आनंददायक है। इसकी तस्वीर ऊंचाई पर रहने वाली प्रजातियों की कुछ तस्वीरों में से एक है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल में 101 बाघ हैं। जिनमें से सभी को सुन्दरबन बाघ क्षेत्र और उसके आसपास के क्षेत्रों में देखा गया है।
भारत में करीब 50 साल पहले 1973 में प्रोजैक्ट टाइगर की शुरूआत की गई थी। उस समय देश में बाघों की संख्या केवल 260 रह गई थी। ऐसा लगने लगा था जैसे बाघ केवल किताबों में ही रह जाएंगे और बच्चों को पढ़ाया जाएगा कि देश में कभी बाघ रहते थे लेकिन प्रोजैक्ट टाइगर का ही परिणाम है कि दुर्लभ जीव की संख्या बढ़ रही है। पिछले वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक देश में पूरी दुनिया की लगभग 75 प्रतिशत जंगली बाघ की आबादी रहती है। देश में बाघों की संख्या अब 3682 हो गई है। दुनिया में एशियाई शेरों का इकलौता घर भारत है। भारत ने न केवल बाघों को बचाया है बल्कि उन्हें ऐसा इको सिस्टम दिया है जिसमें वह फलफूल सके। भारत में दशकों पहले चीते विलुप्त हो गए थे लेकिन हम चीतों को दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया से लेकर आए और चीतों को एक देश से दूसरे देश में लाकर बसाने में हमें सफलता मिली है।
प्रकृति की रक्षा हमारी संस्कृति का हिस्सा रही है। जिन राज्यों को टाइगर स्टेट का दर्जा मिला है उनमें मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु टॉप-5 में शामिल हैं। इनके अलावा जिन राज्यों में बाघों की आबादी मौजूद है उनमें असम, केरल, यूपी, पश्चिम बंगाल सहित कुल 18 राज्य हैं। जिस तरह से हमने जंगलों को नष्ट कर पर्यावरण को तबाह किया है वह वन्य जीवों के लिए अच्छा नहीं है। यह तो उसी तरह की बात है कि पहले हम किसी चीज को नष्ट करते हैं और फिर उसे बचाने का उपाय करते हैं।
दुनिया में सस्टनेबल विकास की अवधारण केवल किताबों में दिखाई दे रही है। जंगलों और वन्यजीवों का अन्धाधुंध दोहन जारी है, जिसका सीधे तौर पर जिम्मेदार हमारी बेलगाम उपभोक्तावादी संस्कृति है जो जरूरत आधारित न होकर मांग पैदा करने पर केन्द्रित हो गयी। अधिकाधिक मुनाफा, मांग और उत्पादन ने धरती पर जल, जमीन और जंगल के साथ जीवन को लहूलुहान कर दिया है जो लगातार जारी है। अगर हम अभी भी नहीं सुधरे तो गिद्ध, टाइगर तमाम तरह के जीवों से होते यह कड़ी इन्सानों तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी। टाइगर फूड चेन के सबसे ऊपरी कड़ी में आते हैं। इनके खतरे में आने का मतलब है कि फूड चेन का बैलेंस बिगड़ जाना। इसका प्रभाव धरती के दूसरे जीवों से होते हुए पर्यावरण और जलवायु पर पड़ रहा है जो अन्ततः मानव समुदाय के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित होने जा रहा है। जलवायु परिवर्तन मानव सभ्यता के अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है। वन्य जीवों का अवैध रूप से शिकार आज भी हो रहा है। मनुष्य ने अगर प्रकृति के साथ रहना नहीं सीखा तो पर्यावरण का बहुत नुक्सान होगा।

आदित्य नारायण चोपड़ा
Adityachopra@punjabkesari.com

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