चुनाव आयोग व ममता दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के बीच कहासुनी व झड़प हुई है, उसे लोकतन्त्र में किसी भी तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसकी मूल वजह यह है कि भारत की दलगत राजनीति में चुनाव आयोग ही ऐसी संस्था है जिस पर विभिन्न पार्टियों की संरचना को वैध रूप देने का भार है। अतः इन दोनों के बीच औपचारिकता का बने रहना बहुत जरूरी है। मगर बीते कल में इन दोनों के बीच जो भी हुआ वह निन्दनीय है, क्योंकि चुनाव आयोग का कार्य उस संवैधानिक जिम्मेदारी से बंधा हुआ है जो राजनीतिक दलों को वैधता प्रदान करता है।
दूसरी ओर राजनीतिक दलों का भी कर्त्तव्य बनता है कि वे चुनाव आयोग की स्वतन्त्रता व निष्पक्षता का सम्मान करें परन्तु कल जिस तरह राज्यसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता श्री डेरेक ओब्रायन ने चुनाव आयोग के साथ हुई संक्षिप्त बैठक के बाद बताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार ने पार्टी के नेताओं से कहा कि वे ‘दफा’ हो जायें, उससे लगता है कि बैठक का माहौल काफी गरमागरम रहा होगा लेकिन इसके बावजूद देश के चुने हुए लोगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार शालीनता के दायर से बाहर है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर अमर्यादित व्यवहार करने का आरोप लगाया है।
यदि खबरों को सही मानें तो श्री ज्ञानेश कुमार ने श्री ओब्रायन पर ऊंचा बोलने व हल्ला-गुल्ला करने का आरोप लगाया। इस सन्दर्भ में हमें ध्यान रखना होगा कि श्री ज्ञानेश कुमार को पद मुक्त करने के लिए पिछले दिनों जो प्रस्ताव लोकसभा व राज्यसभा में रखा था उसे दोनों के पीठाधीशवरों ने अस्वीकार कर दिया है। यह प्रस्ताव मूल रूप से तृणमूल कांग्रेस के इसरार पर ही विपक्षी सांसदों ने दिया था। अतः बहुत स्वाभाविक है कि इसे लेकर भी श्री ओब्रायन व उनकी पार्टी के अन्य सांसदों के मन में खटास रही होगी। श्री ओब्रायन के अनुसार चुनाव आयोग का उनकी पार्टी व विपक्ष के प्रति रवैया बहुत ज्यादा बेरुखी का रहा है।
उन्होंने कहा कि प. बंगाल की मुख्यमन्त्री व तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा सुश्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को पिछले दिनों के भीतर नौ पत्र लिखे मगर इनमें से किसी एक का जवाब तक नहीं आया। उनके अनुसार यदि खत सत्तारूढ़ दल के शीर्षस्थ नेताओं में से किसी एक ने भी लिखा होता तो क्या ज्ञानेश कुमार जवाब न देने की हिमाकत कर सकते थे? लोकतन्त्र में यह वास्तव में चिन्ता का विषय हो सकता है क्योंकि चुनाव आयोग प्रत्यक्ष रूप से सभी राजनीतिक दलों के नियमन के दायित्व से बंधा होता है, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन सा दल सत्ता में है और कौन सा विपक्ष में बैठा हुआ है। इसीलिए समाजवादी चिन्तक व राजनेता स्व. डाॅ. राममनोहर लोहिया कहा करते थे कि ‘लोकतन्त्र लोकलज्जा’ से चलता है।
इसका मतलब यही है कि राजनीतिज्ञ अपना फैसला करने से पहले सौ बार सोचें कि उनके किसी भी फैसले में कहीं कोई उनका अपना तो लाभान्वित नहीं हो रहा है। जहां तक स्वतन्त्र संवैधानिक संस्थाओं का सवाल है तो उन्हें हर सूरत में यह विचार करना जरूरी होता है कि उन पर सरकार के पिट्ठू होने का आरोप न लग सके। चुनाव आयोग के सन्दर्भ में यह फार्मूला सत्तारूढ़ दल व विपक्ष को एक ही नजर से न देखने पर लागू होता है। हम सब जानते हैं कि चुनाव आयोग किसी पार्टी की सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं होता। उसकी जवाबदेही सीधे आम नागरिकों के प्रति होती है। उसका यह कर्त्तव्य बनता है कि 18 वर्ष से ऊपर का हर जायज नागरिक वैध मतदाता बनें।
मगर विपक्ष उस पर आरोप लगा रहा है कि आयोग जो मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम कर रहा है उसमें वह लाखों मतदाताओं के नाम काट रहा है जिससे चुनावों की शुचिता सीधे प्रभावित हो रही है। जबकि चुनाव आयोग कह रहा है कि समय-समय पर उसे विशेष पुनरीक्षण कराने का संवैधानिक हक प्राप्त है। हालांकि यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में भी चला है जिस पर सुनवाई पूरी करके न्यायमूर्तियों ने निर्णय सुरक्षित रख लिया है। प. बंगाल में यह प्रक्रिया अभी तक जारी है जिसे लेकर तृणमूल कांग्रेस चुनाव आयोग को घेरे हुए है। सभी को मालूम है कि आगामी 23 अप्रैल को प. बंगाल विधानसभा के चुनाव का पहला चरण पूरा हो जायेगा।
मगर इस राज्य में 24 लाख के करीब मतदाताओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है और तृणमूल के नेतागण कह रहे हैं कि चुनाव आयोग मुस्लिम मतदाताओं के नाम जानबूझ कर काट रहा है जबकि आंकड़े बताते हैं कि आयोग ने हिन्दू मतदाताओं के नाम भी काटे हैं बेशक मुस्लिम नागरिकों की संख्या काफी अधिक है लेकिन आज का असल मुद्दा चुनाव आयोग व राजनीतिक दलों के बीच के आपसी व्यवहार को लेकर है। अतः बहुत आवश्यक है कि न तो चुनाव आयोग और न ही राजनीतिक दल एक-दूसरे के साथ अमर्यादित व्यवहार करें। यदि श्री ज्ञानेश कुमार तृणमूल नेताओं को बैठक से बाहर चले जाने को कहते हैं तो इससे चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा पर ही विपरीत प्रभाव पड़ता है।
दूसरी ओर अगर ओब्रायन चुनाव आयोग के दफ्तर में ही यदि ज्ञानेश कुमार पर चिल्लाते है तो इसे भी अशोभनीय कहा जायेगा और उनकी पार्टी की छवि ही खराब होगी। इसके साथ यह भी ध्यान में रखा जाना जरूरी है कि लगभग सभी विपक्षी दल चुनाव आयोग पर पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने के आरोप क्यों लगा रहे हैं? चुनाव आयोग का मुख्य कार्य साफ-सुथरे व भय-हीन चुनाव कराना हाेता है जिसके लिए आवश्यक है कि उसकी विश्वसनीयता पर कोई भी शक की अंगुली न उठा सके। राजनीति के बदलते दौर में हम अपने लोकतन्त्र को इसी प्रकार मजबूत करके अगली पीढि़यों को सौंप सकते हैं।


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