ट्रम्प : सबसे बड़े पलटीमार

Summary :

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का बार-बार बयान बदलना कोई नई बात नहीं है, जिसे लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर चर्चा होती रहती है। टैरिफ का मुद्दा हो, भारत-पाकिस्तान के मुद्दे में बार-बार अपना स्टैंड बदलते रहे हैं। आतंकवाद को लेकर भी उनके दोहरे मापदंड सारी दुनिया ने देखे हैं। विश्व की महाशक्ति कहलाने वाले अमेरिका की खुद की हालत क्या है, इस पर से भी कई बार पर्दा उठ चुका है। ईरान जैसे छोटे देश ने अमेरिका को दिन में ही तारे दिखा दिए हैं। अमेरिकी दुनिया में खुद को सबसे सर्वश्रेष्ठ नागरिक मानते हैं और अमेरिका की सभी नीतियां अमेरिका…

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का बार-बार बयान बदलना कोई नई बात नहीं है, जिसे लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर चर्चा होती रहती है। टैरिफ का मुद्दा हो, भारत-पाकिस्तान के मुद्दे में बार-बार अपना स्टैंड बदलते रहे हैं। आतंकवाद को लेकर भी उनके दोहरे मापदंड सारी दुनिया ने देखे हैं। विश्व की महाशक्ति कहलाने वाले अमेरिका की खुद की हालत क्या है, इस पर से भी कई बार पर्दा उठ चुका है। ईरान जैसे छोटे देश ने अमेरिका को दिन में ही तारे दिखा दिए हैं। अमेरिकी दुनिया में खुद को सबसे सर्वश्रेष्ठ नागरिक मानते हैं और अमेरिका की सभी नीतियां अमेरिका से शुरू होकर अमेरिका तक ही खत्म हो जाती हैं। अमेरिका ने हमेशा अपने हितों को सर्वोपरि रखा है। इसलिए उसका इतिहास पाखंड, धूर्तता और धोखेबाजी से भरा हुआ है। डोनाल्ड ट्रम्प के अस्थिर दिमाग ने पूरी दुनिया में उनकी साख खत्म कर दी है। डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत और चीन समेत उन देशों पर 100 फीसदी तक शुल्क लगाने के अधिकार देने वाले लिंडसे ओ ग्राह्म एक्ट पर हस्ताक्षर किए थे। पिछले साल ट्रम्प ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 25 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगा दिया था। तब ट्रम्प ने आरोप लगाया था कि भारत-रूस से तेल और ऊर्जा खरीद कर रूस को आर्थिक लाभ पहुंचा रहा है। इससे रूस की यूक्रेन पर आक्रमकता बढ़ गई है।
पिछले हफ्ते ट्रम्प ने रूस से डीजल खरीदने के लिए खुद एक समझौते का ऐलान कर दिया। इस समझौते के तहत रूस 3 लाख टन डीजल तुरन्त अमेरिका और वैश्विक बाजार में जारी करेगा, जबकि नवम्बर में 5 लाख टन डीजल उपलब्ध कराया जाएगा। ट्रम्प के इस फैसले पर सारी दुनिया हैरान हो गई। अब जबकि अमेरिका रूस से खुद डीजल खरीदेगा तो क्या इससे रूस की अर्थव्यवस्था को फायदा नहीं मिलेगा? यह भी सवाल उठा कि जब अमेरिका खुद रूस से डीजल खरीद रहा है तो उसे भारत और चीन को धमकाने का कोई अधिकार नहीं है। ट्रम्प ने फिर यू-टर्न लेते हुए रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने का फैसला टाल दिया। इस फैसले के पीछे अमेरिका की घरेलू राजनीति है। यद्यपि रूस से डीजल खरीदने के फैसले को लेकर कहा जा रहा है कि ऐसा वैश्विक और अमेरिकी अर्थव्यवस्था के फायदे के लिए किया गया है लेकिन कहानी कुछ और है। ईरान युद्ध के कारण डीजल की कीमतों में भारी बढ़ौतरी का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे रहा है।
अमेरिका में डीजल के दामों में हुई वृद्धि से ट्रम्प का जनाधार खिसक रहा था। अगले महीने होने वाले मिड टर्म चुनावों से पहले मतदाताओं के बीच जीवन यापन की लागत बढ़ने को लेकर चिंताएं सबसे ऊपर हैं। सर्वे बता रहे हैं कि चुनावों में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ सकता है। यूरोप के अधिकांश देश पहले ही अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भर हैं। रूस के राष्ट्रपति पुतिन तेल, गैस और ऊर्जा धड़ल्ले से बेच रहे हैं जबकि अमेरिका को संकट का सामना करना पड़ रहा था। यह भी हैरान कर देने वाली बात है कि जो ट्रम्प लगातार यूक्रेन के समर्थन में बयानबाजी कर रहे थे वही अब यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की के खिलाफ हमले बोल रहे हैं। ट्रम्प कह रहे हैं कि पुतिन तो युद्ध रोकने के लिए तैयार हैं लेकिन जेलेंस्की इसके लिए तैयार नहीं, क्योंकि उसे पता ही नहीं कि आगे क्या करना चाहिए। ट्रम्प ने तो यहां तक कह दिया कि यूक्रेन को अब अपना राष्ट्रपति बदल देना चाहिए। ट्रम्प का अपने रुख से यूं पलट जाना भारत जैसे उन मुल्कों के लिए एक सबक है, जिन्हें रूस के साथ व्यापार करने के लिए आलोचना और दंड का सामना करना पड़ा है। यह ताजा नीतिगत कलाबाजी पश्चिमी देशों की रणनीतिक सोच में मौजूद विसंगति को भी उजागर करती है। पश्चिमी देशों ने व्लादिमीर पुतिन की “युद्ध मशीन” को कमजोर करने के वास्ते रूस के ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाए। चार साल बाद अमेरिका ने ईरान पर बमबारी शुरू कर दी। जब ईरान युद्ध के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ गईं, तो वाशिंगटन ने मॉस्को के साथ समझौता करने से पहले रूसी ईंधन पर लगे प्रतिबंधों में कुछ समय के लिए ढील दे दी।
अमेरिका के फैसलों के पाखंड और रणनीतिक नादानी के अलावा ट्रम्प का डीजल समझौता पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की व्यवस्था की नाकामी को भी दर्शाता है। जब 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो पश्चिमी देशों ने प्रतिबंधों के जरिए रूस की अर्थव्यवस्था को खोखला करने और कीव को हथियार देकर यूक्रेन में रूस की सेना को कमजोर करने की दोतरफा रणनीति अपनाई लेकिन ये प्रतिबंध दोधारी तलवार साबित हुए। इनसे जहां रूस की अर्थव्यवस्था को नुक्सान पहुंचा, वहीं रूस और यूरोप के बीच व्यापार में कमी आने से यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं भी गहरे संकट में फंस गई हैं। खासकर, जर्मनी ज्यादा परेशान हाल है। प्रतिबंधों के असर की भरपाई के लिए मॉस्को ने पूर्व की ओर रुख किया जहां चीन और भारत रियायती दरों पर रूसी ईंधन खरीदने के लिए तैयार थे। यह परिघटना आर्थिक परिदृश्य में आए बदलावों को भी रेखांकित करती है। ट्रम्प की एकाएक पलटबाजी ने यूक्रेन और यूरोप को एक ऐसे वक्त में मुश्किल स्थिति में डाल दिया है जब मॉस्को यूक्रेन पर बमबारी तेज कर रहा है और ‘ग्रे-जोन’ वाली रणनीतियों के जरिए नाटो के संकल्प का इम्तिहान ले रहा है। अमेरिका के सहयोगी देशों ने ट्रम्प के यू-टर्न की कड़ी आलोचना की है और इसे यूक्रेन से धोखा बताया है। अमेरिका के भीतर भी ट्रम्प का विरोध बढ़ रहा है इससे यूक्रेन की मुश्किलें और बढ़ गई हैं।
पूरे घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ट्रम्प के फैसले से भारत को बड़ी राहत मिली है। इससे तेल, डीजल की आपूर्ति सामान्य होगी और कीमतें भी कम होंगी जिससे देश की अर्थव्यवस्था को काफी राहत मिलेगी। सच्चाई तो यह भी है कि अमेरि​का के तमाम दबावों के बावजूद भारत ने रूस से तेल की खरीद जारी रखी है। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत दौरे पर आने वाले हैं और उम्मीद है कि भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता को लेकर कोई सुखद खबर मिलेगी।

Aditya Chopra

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