अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक तरफ ईरान युद्ध में उलझ गए हैं तो दूसरी तरफ अपने ही बुने हुए टैरिफ जाल में बुरी तरह फंस गए हैं। ट्रम्प की दादागिरि को लेकर दुनियाभर से उनके खिलाफ कड़ी प्रतिक्रियाएं तो सामने आ ही रही हैं, साथ ही वह अपने ही देश में घिरते जा रहे हैं। उनकी लोकप्रियता में भी लगातार गिरावट आने की खबरें भी सामने आ रही हैं। स्वयं को नोबल शांति पुुरस्कार का दावेदार जताने वाले ट्रम्प की छवि अब अशांति दूत की बन चुकी है। न तो उन्हें युद्ध से निकलने का रास्ता दिखाई दे रहा है और न ही उनकी टैरिफ नीतियां सफल हो रही हैं। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने ट्रम्प प्रशासन द्वारा लगाए गए ट्रैरिफ को लेकर जो फैसला दिया उससे ट्रम्प पूरी तरह से बौखला चुके हैं। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि राष्ट्रपति के पास अन्तर्राष्ट्रीय आपात आर्थिक अधिनियम के अन्तर्गत टैरिफ लगाने का कोई अधिकार ही नहीं है। ट्रम्प को सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पसंद नहीं आया। उन्होंने तुरन्त ही 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत 10 फीसदी शुल्क लगा दिया और बाद में इसे बढ़ाकर 15 फीसदी कर दिया गया। यह प्रावधान राष्ट्रपति को 150 दिनों तक अधिकतम 15 फीसदी शुल्क लगाने की अनुमति देता है, ताकि बड़े भुगतान संतुलन घाटे का समाधान किया जा सके। इसके बाद ट्रम्प लगातार शुल्क लगाने के नए-नए तरीके तलाश रहे हैं। अलग-अलग देशों से व्यापार समझौतों पर बातचीत में ट्रम्प सरकार का दबदबा कमजोर हुआ।
अब ट्रम्प ने एक बार फिर दुनिया के तमाम देशों पर नया टैरिफ बम फोड़ने की तैयारी कर ली है। ट्रम्प ने धारा 301 का इस्तेमाल करते हुए गलत तरीके से व्यापार करने का आरोप लगाते हुए भारत सहित 16 देशों के खिलाफ जांच शुरू कर दी है। आरोप लगाया गया है कि यह देश अपने उत्पादन की क्षमता को बढ़ाकर व्यापार में असंतुलन पैदा कर रहे हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए गए तो इन देशों पर ट्रम्प नया टैरिफ अथवा कुछ नए तरह के प्रतिबंध लगा सकते हैं। इस तरह भारत, चीन, यूरोपीय संघ, जापान, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, ताइवान, वियतनाम, सिंगापुर, बांग्लादेश, स्विट्जरलैंड आदि देश इसकी जांच के जद में आ गए हैं। धारा 301 जो ट्रेड एक्ट 1974 का हिस्सा है, इसका इस्तेमाल व्यापार में असंतुलन अथवा मानक से हटकर ट्रेड देने पर किया गया है।
लाख टके का सवाल यही है कि अभी तक भारत के साथ ट्रेड डील करने की ओर बढ़ रहे अमेरिका को अचानक उसके व्यापार में खोट कैसे नजर आने लगा। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण भारत की उस पॉलिसी को बताया जा रहा है, जो अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में एंट्री आसान नहीं होने देती। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि उनकी कंपनियों के डाटा को भारत में ही एकत्र करना और उनकी डिजिटल सेवाओं पर भारतीय कानून लागू करने से अमेरिकी कंपनियों के लिए बाजार में प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो जाती है। साथ ही फार्मा जैसे सेक्टर में कीमतों पर सरकारी नियंत्रण की वजह से भी अमेरिकी कंपनियों के लिए व्यापक अवसर नहीं बनते हैं। यही वजह है कि ट्रेड डील पर चल रही बातचीत के बावजूद अमेरिका ने भारत को सेक्शन 301 के तहत जांच के दायरे में ला खड़ा किया है।
अमेरिका द्वारा शुरू किए गए शुल्क और व्यापार बाधाओं ने कई देशों को वैकल्पिक बाजार तलाशने को मजबूर किया। अमेरिकी टैरिफ की चुनौतियों का सामना करने के लिए भारत ने लगातार रचनात्मक कदम उठाए और एक के बाद एक व्यापार समझौते किए। भारत ने यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया। इसके अलावा आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, खाड़ी सहयोग परिषद, न्यूजीलैंड से व्यापार समझौते किए। भारत ने अब तक कुल 21 मुक्त व्यापार समझौते किए जिससे भारत को लगातार फायदा हो रहा है। भारत के निर्यात में बढ़ौतरी की सम्भावनाएं बढ़ गई हैं। विदेशी निवेश का मार्ग प्रशस्त हुआ है। रक्षा और तकनीकी सहयोग का विस्तार हुआ है। फिलहाल अमेरिका हाथ मलता नजर आ रहा है। भारत पर अमेरिकी टैरिफ का बहुत मामूली असर देखने को मिला है। इस मामूली प्रभाव को भी खत्म करने के लिए भारत ने उत्पादकता और व्यापारिक परिस्थितियों में सुधार के उद्देश्य से आंतरिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं। हताश ट्रम्प ने अब धारा 301 का ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल कर नया दाव खेला है। ऐसी रिपोर्टें भी हैं कि ट्रम्प राष्ट्रीय सुरक्षा को बहाना बनाकर कुछ नए टैरिफ लगा सकते हैं। इन उत्पादों में बड़ी बैटरियां, कास्ट आयरन, प्लास्टिक पाइप, इंडस्ट्रियल कैमिकल, पॉवर ग्रिड, मैटल, औद्योगिक पुर्जे और टैलीकाॅम उपकरण जैसे सैक्टर शामिल हैं। अगर अमेरिका ने नया टैरिफ थोपा तो भारत के कई सैक्टर प्रभावित हो सकते हैं। ईरान से युद्ध के चलते अमेरिका के भीतर ट्रम्प का विरोध बढ़ने लगा है। ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के चलते अमेरिका ने खाड़ी देशों में अपने सभी बेस खो दिए हैं। अरबों रुपए का नुक्सान हो रहा है। अमेरिकी जनता सवाल पूछ रही है कि आखिर इससे हासिल क्या होगा? इस बार अमेरिकी जनता युद्ध के िवरोध में एकजुट नजर आ रही है। डैमोक्रेट्स भी अब ट्रम्प के पीछे एकजुट होने को तैयार नहीं हैं। टैरिफ और महंगाई को लेकर भी 10 में से 6 अमेरिकी असहमत हैं। अर्थव्यवस्था को लेकर भी अमेरिकी जनता में निराशा है। भरोसे के मुद्दे पर भी तस्वीर ट्रम्प के अनुकूल दिखाई नहीं देती। ईरान के मकड़जाल में उलझे ट्रम्प अपनी छवि को सुधारने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अमेरिकी महसूस करते हैं कि विश्व के लिए मुसीबत बने ट्रम्प की कीमत अमेरिका को ही चुकानी पड़ेगी। तेल और गैस का खेल िबगड़ रहा है। भारत को भी ट्रम्प जैसे ‘दोस्त’ की चालों से सतर्क रहना होगा और अपनी आपूर्ति शृंखलाओं को िनर्बाध जारी रखने के हर सम्भव प्रयास करने होंगे।
ट्रम्प की नई चाल
Summary :
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक तरफ ईरान युद्ध में उलझ गए हैं तो दूसरी तरफ अपने ही बुने हुए टैरिफ जाल में बुरी तरह फंस गए हैं। ट्रम्प की दादागिरि को लेकर दुनियाभर से उनके खिलाफ कड़ी प्रतिक्रियाएं तो सामने आ ही रही हैं, साथ ही वह अपने ही देश में घिरते जा रहे हैं। उनकी लोकप्रियता में भी लगातार गिरावट आने की खबरें भी सामने आ रही हैं। स्वयं को नोबल शांति पुुरस्कार का दावेदार जताने वाले ट्रम्प की छवि अब अशांति दूत की बन चुकी है। न तो उन्हें युद्ध से निकलने का रास्ता दिखाई दे रहा है…


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