1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया में अमेरिका एक विश्व महाशक्ति के रूप में उभरा और इसने यूरोपीय उपनिवेशवाद को खत्म करने की तरफ निर्णायक कदम उठाने शुरू किये साथ ही लीग आॅफ नेशंस के स्थान पर संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई जिसका मूल उद्देश्य यह था कि पूरे विश्व के सभी देश के लोगों का विकास समान दृष्टि से हो सके और किसी भी देश को अपनी शक्ति के आधार पर दूसरे देश पर अधिपत्य जमाने का अधिकार न हो। संयुक्त राष्ट्र संघ में दुनिया के सभी महाद्वीपों के लोगों को समान रूप से देखने की नीति अपनाई गई और इसकी सर्वोच्च उप संस्था सुरक्षा परिषद में एशिया महाद्वीप का प्रतिनिधित्व करने के लिए चीन को आमन्त्रित किया गया। इस प्रकार जो नई विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड आर्डर) बनी उसमें अमेरिका ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसने दुनिया के कम व अर्ध विकसित विकासशील देशों के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं तक की शुरूआत की मगर अब लगभग 80 साल बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इस विश्व व्यवस्था को उलट देना चाहते हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ को अप्रासंगिक बनाकर नव अमेरिकी आर्थिक उपनिवेशवाद की नींव डाल देना चाहते हैं।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के समानान्तर सोवियत संघ दूसरी विश्व महाशक्ति के रूप में उभरा था और इसने जर्मनी के तानाशाह हिटलर की चंगेजी नीतियों के विरुद्ध अमेरिका का साथ दिया था। सोवियत संघ विश्व में साम्यवाद का अलम्बरदार था और यह अधिसंख्य विकासशील देशों में समाजवादी नीतियों का प्रचलन चाहता था। इस कशमकश के बीच ही अमेरिका ने यूरोपीय उपनिवेशवाद का तीखा विरोध किया था क्योंकि 1945 के आते-आते विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यवादी देश ब्रिटेन की शक्ति इतनी घट गई थी कि इसके पास अपनी फौजों को तनख्वाहें तक देने के लिए धन नहीं था। भारत के 1947 में ही आजाद होने की एक वजह यह भी थी कि अमेरिका ने ब्रिटेन से साफ कह दिया था कि वह उसकी भारतीय फौजों का वेतन अब और आगे नहीं दे सकता अतः ब्रिटिश सरकार भारत को जल्द से जल्द आजाद करे। यही वजह रही कि अंग्रेजों ने भारत को आजादी देने की योजना को 1947 में ही लागू कर दिया और सितम्बर 1948 के स्थान पर भारत को 15 अगस्त, 1947 को ही आजादी दे दी। अमेरिका की यूरोपीय उपनिवेशवाद के विरुद्ध नीति का असर यह हुआ कि बीसवीं सदी के दौरान अधिसंख्य वे गुलाम देश आजाद होने लगे जो ब्रिटेन व फ्रांस आदि यूरोपीय देशों के गुलाम थे। इसमें अधिसंख्य देश अफ्रीका व एशिया महाद्वीप के ही थे लेकिन अमेिरका के वर्तमान राष्ट्रपति ट्रम्प ने दक्षिणी अमेरिकी देश वेनेजुएला के साथ जो किया है वह नव अमेरिकी आर्थिक उपनिवेशवाद की शुरूआत है क्योंकि ट्रम्प वेनेजुएला के अथाह तेल भंडार पर कब्जा करना चाहते हैं मगर ट्रम्प यहीं नहीं रुक रहे हैं और वह रूस के विरुद्ध उसके आर्थिक हितों के खिलाफ जेहाद छेड़े हुए हैं। वह शीघ्र ही अपने देश की संसद में एक एेसा विधेयक लाने वाले हैं जो रूस से तेल खरीदने वाले देशों के विरुद्ध 500 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगा सके। एेसे देशों में भारत, चीन व ब्राजील प्रमुख रूप से आते हैं।
भारत का अमेरिका को निर्यात दुनिया में सर्वाधिक होता है यदि यह रुक जाता है तो इसकी सकल उत्पाद वृद्धि पर एक से डेढ़ प्रतिशत का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अमेरिका भारत के साथ एेसा तब कर रहा है जबकि इसके हमारे देश के साथ मधुर सम्बन्ध बताये जाते हैं। जाहिर है कि अमेरिका को पुनः महान बनाने (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन-मांगा) की धुन में ट्रम्प भूल रहे हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतन्त्र है और इसने पिछले 75 सालों में अपना जो विकास किया है उसके पीछे समावेशी दृष्टि रही है। इस दौरान यह विकासशील देशों के संगठन गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का अगुवा भी रहा है और इसने गरीब देशों के विकास में यथाशक्ति योगदान भी किया है तथा उनके हकों के लिए राष्ट्रसंघ में पुरजोर आवाज भी लगाई है। मगर लगता है कि ट्रम्प ‘मांगा’ के जुनून में उस एेतिहासिक भूमिका को भूल रहे हैं जो बदली हुई विश्व व्यवस्था ने अमेरिका को सौंपी थी। ट्रम्प ने 66 अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं से अमेरिका के बाहर निकलने की घोषणा यह कहकर कर दी है इनसे अमेरिका को कोई लाभ नहीं पहुंचता और ये आर्थिक रूप से उस पर बोझ हैं। इनमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) व यूनेस्को जैसी संस्थाएं भी शामिल हैं। इनके अलावा अमेरिका विश्व सौर ऊर्जा संगठन व वैश्विक मौसम बदलाव के विरुद्ध कारगर कदम उठाने वाली संस्थाओं से भी बाहर हो जायेगा।
यह सही है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन व यूनेस्को आदि संस्थाओं को सर्वाधिक आर्थिक मदद अमेरिका ही करता था मगर इनसे इसके हटने के बाद उसका स्थान चीन ले सकता है जो वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका के बाद विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। चीन का अफ्रीकी व एशियाई देशों में प्रचुर आर्थिक निवेश किसी से छिपा हुआ नहीं है। इससे विश्व व्यवस्था में एेसा बदलाव आ सकता है जिसमें लोकतान्त्रिक देशों के लिए मुसीबतें बढ़ सकती हैं। अमेरिका विश्व की महाशक्ति होने की वजह से दुनिया के समानुरूपी विकास के सिद्धान्त से बन्धा हुआ देश समझा जाता था परन्तु ट्रम्प इससे असहमत हैं और विकासशील व गरीब देशों को उनके हाल पर ही छोड़ देना चाहते हैं तथा विश्व में एक नये आर्थिक उपनिवेशवाद को जन्म देना चाहते हैं। खासतौर पर जब वह भारत के विरुद्ध 500 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाने की बात करते हैं तो उनका लक्ष्य अमेरिकी अलगाववाद की तरफ भी इशारा करता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था के सभी सिद्धान्तों को धत्ता बताता है। अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण के बाद जो विश्व व्यापार संगठन बना था उसके भी अप्रासंगिक होने का भारी खतरा ट्रम्प की नीतियों ने खड़ा कर दिया है। इस स्थिति से निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को एेसा हल खोजना होगा जिससे विश्व व्यवस्था में टूट- फूट रुक सके और कमजोर देशों तक विश्व के आय स्रोतों की पहुंच कम न हो सके।
















