अभी हम अपना 77वां गणतन्त्र दिवस मना चुके हैं जिसमें भारत के शौर्य से लेकर इसकी शक्ति व प्रतिभा का प्रदर्शन किया गया। निश्चित रूप से हमने आजादी के बाद से चहुंमुखी विकास किया है जिसकी छाप राष्ट्र के हर क्षेत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। परन्तु कोई भी राष्ट्र तभी आगे बढ़ता है जब इसमें रहने वाले लोग जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं और सशक्त बनते हैं क्योंकि वही देश मजबूत होता है जिसके लोग मजबूत होते हैं। देशों का निर्माण चूंकि इसमें रहने वाले लोगों से ही होता है अतः यह बहुत जरूरी हो जाता है कि किसी भी देश के लोगों के बीच आपसी भाईचारा व सौहार्द इस प्रकार हो कि हर किसी के प्रगति करने में किसी प्रकार की कोई सामाजिक व आर्थिक बाधा न हो।
इसके लिए सबसे पहली शर्त यह होती है कि उस देश के लोग शिक्षित व स्वस्थ हों । इस बारे में लोकतान्त्रिक व्यवस्था में चुनी गई सरकारों की विशेष भूमिका होती है क्योंकि सरकारी नीतियों से ही किसी भी देश में शिक्षा व स्वास्थ्य की गारंटी तय की जा सकती है। अतः स्वतन्त्र भारत में शिक्षा व स्वास्थ्य को लेकर सरकारों ने अपनी जिम्मेदारी को पहचानते हुए शिक्षा के प्रचार-प्रसार में विशेष योगदान दिया और निजी व सरकारी शिक्षण संस्थानों के माध्यम से लोगों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया। भारतीय समाज चूंकि जातिगत व्यवस्था के चलते ऊंच-नीच के भाव से ग्रस्त था अतः ऐसे समाज में शिक्षा का प्रसार करके जातिगत भेदभाव को समाप्त करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया।
समाज के सभी वर्गों के समुचित विकास के लिए यह बहुत जरूरी था कि स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में सामाजिक रूप से अगड़े-पिछड़े व दलित-सवर्ण में बंटे समाज को शिक्षा के माध्यम से एक समान बनाया जाये और सभी अमीर व गरीब विद्यार्थियों के लिए एक समान स्तर की शिक्षा प्रणाली विकसित की जाये। इस काम में हम उस सीमा तक सफल नहीं हो सके जिसकी अपेक्षा स्वतन्त्र भारत के निर्माताओं को थी। इसकी सबसे प्रमुख वजह यह रही कि जमीन तक जड़ें जमाए हुए सामाजिक वर्जनाओं की विसंगतियां हमारे शिक्षण संस्थानों तक में पहुंची जिसके कारण समाज के सदियों से शिक्षा से वंचित लोगों के साथ सम्यक रूप से न्याय नहीं हो सका।
इसके लिए स्वतन्त्र भारत की सरकारों ने शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों व जन जातियों के लोगों को आरक्षण देकर यह तय किया कि वे जीवन में तरक्की करने से किसी से पीछे न रह पायें। आर्थिक रूप से भी देश की सरकारों ने इस वर्ग के विद्यार्थियों को समर्थन दिया और सुनिश्चित किया कि वे आर्थिक कठिनाइयों के चलते शिक्षा से वंचित न रह सके। मगर इसके लिए यह बहुत जरूरी था कि प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में छात्रों में आपस में बराबरी का भाव जागृत हो और नई पीढि़यां ऊंच-नीच की मानसिकता से मुक्त हों।
इसे समाप्त करने के लिए ही हमारे संविधान निर्माताओं ने सरकारी नौकरियों में दलित समाज के लिए आरक्षण की व्यवस्था की जिससे इस समाज के लोग भी देश की शासन व्यवस्था में सक्रिय योगदान देकर एक समानता की मानसिकता को बढ़ावा दे सकें और नई पीढि़यां जाति के स्थान पर योग्यता का सम्मान कर सकें, परन्तु 1991 से भारत की अर्थव्यवस्था में बाजारवाद के पदार्पण के बाद सबसे बड़ी विसंगति शिक्षा के क्षेत्र में ही उत्पन्न हुई और निजी क्षेत्र में कथित उच्च गुणवत्ता के स्कूल व कालेजों व विश्वविद्यालयों की स्थापना होने लगी। इससे शिक्षा के संस्थान दुकानों में तब्दील होने लगे और खासतौर पर उच्च शिक्षा के क्षेत्र में समाज के धनी वर्ग का आधिपत्य स्थापित होने लगा।
मगर 1990 में ही मंडल आयोग के लागू होने की वजह से एक और विसंगति पैदा हुई तथा सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू कर दी गई। इसका असर पूरे समाज पर चहुं दिशा पर पड़ा और स्वतन्त्र भारत में एक बार फिर जातियों के आधार पर इसके नागरिकों की पहचान होने लगी। बाद में मनमोहन सरकार के दौरान मानव संसाधन मन्त्री बने स्व. अर्जुन सिंह ने उच्च शिक्षा में भी पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू कर दी। लोकतन्त्र में वोट की राजनीति के प्रभावी होने की वजह से इस कदम का समर्थन देश की जातिमूलक राजनैतिक पार्टियों ने तो किया मगर वे यह भूल गईं कि भारतीय संविधान जिस जातिविहीन समाज का आह्वान करता है उस दिशा में यह कदम कितना खतरनाक और शिक्षा के क्षेत्र में विभाजन पैदा करने वाला था।
वास्तव में यह कदम उठाकर अर्जुन सिंह ने बाजारवाद के समक्ष हथियार डाल दिये थे और शिक्षा के क्षेत्र को निजी धन्ना सेठों की जागीर बनाये रखने के इन्तजाम बांध दिये थे। बाद में 2012 में विश्वविद्याल अनुदान आयोग की नियमावली में यह संशोधन भी किया गया कि हर उच्च शिक्षण संस्थान में अनुसूचित वर्ग के छात्रों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए स्थापित तन्त्र में पिछड़े वर्गों को भी शामिल किया जायेगा। इससे भारत की उस ऐतिहासिक सच्चाई को नजरअन्दाज किया गया जिसके कारण आज के वर्तमान युग में भी गांवों में दलित समाज के लोगों के साथ भारी भेदभाव किया जाता है।
दलित वर्ग के लोगों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वाधिक उत्पीड़न कथित पिछड़े समाज की दबंग जातियों के लोगों के द्वारा ही किया जाता रहा है। स्वतन्त्रता के बाद से भारत में जिस प्रकार औद्योगिकरण बढ़ा है उसकी वजह से इसके शहरों में जातिगत भेदभाव को हाशिये पर डाला जाने लगा था क्योंकि महानगरों की भाग-दौड़ भरी जिन्दगी में श्रम की महत्ता को स्थान मिलने लगा था जिसकी वजह से व्यक्ति की पहचान उसकी जाति नहीं बल्कि उसका श्रम व हुनर बनने लगे थे। हमारे विश्वविद्यालयों में भी अगर जाति के आधार पर ही छात्रों के साथ भेदभाव के भाव को आधार बनाया जाता है और दलितों के समकक्ष ही पिछड़े वर्गों को भी रखा जाता है तो इससे समाज में कलुषता को ही और बढ़ावा मिलेगा और विश्वविद्यालय भी जातिवादी राजनीति का अखाड़ा बनते चले जाएंगे। इसका विरोध छात्रों के कुछ समूहों द्वारा किया जा रहा है।
इस विरोध को हमें ऐतिहासिक सांस्कृतिक सन्दर्भों में देखना और परखना होगा। पिछड़े वर्ग की अनेक जातियां भारतीय इतिहास में शासक वर्ग तक में रही हैं। अतः इनकी तुलना हम अनुसूचित वर्ग के लोगों के साथ किस प्रकार कर सकते हैं। भारत का संविधान ही जब लोगों में वैज्ञानिक सोच को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सरकारों पर डालता है तो किस प्रकार हम अपने विश्वविद्यालयों को पिछली सदियों की रूढि़यों से लाद सकते हैं। जहां तक अनुसूचित वर्गों का सवाल है तो हजारों साल से इन जातियों के लोगों के साथ पशुवत व्यवहार होता रहा है और उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया है। इसलिए उनके साथ पूर्ण न्याय करना भारत की नई पीढि़यों का भी कर्त्तव्य बनता है।


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