देश के वर्तमान तनावपूर्ण माहौल में डूबे रहने के स्थान पर कुछ पुराने सुखद लम्हों को याद करना शायद बेहतर होगा। गांधी जी के जीवन एवं उपलब्धियों की अपने-अपने नजरिए से बयान करने वाले, उनके निजी व वैचारिक जीवन में एक अनूठी महिला सरला देवी चौधरानी की भूमिका को कैसे भूल गए? यद्यपि सरला देवी चौधरानी के बारे में सरसरी चर्चाएं कहीं-कहीं होती रही हैं मगर अब अलका सरावगी सरीखी लेखिका के नए उपन्यास ‘गांधी और सरला देवी चौधरानी : 12 अध्याय’ एक बार फिर सरला देवी व बापू गांधी के मध्य संबंधों के अनेक नए प्रसंग खोले हैं।
वैसे इस विषय व इन संबंधों के बारे में एक कैनाडियन इतिहासकार जेरेल्डीन फोब्रस ने वर्ष 2020 में प्रकाशित अपनी कृति ‘लास्ट लेटर्स एंड फैमिनिस्ट हिस्ट्री : द पॉलिटिकल फ्रैंडशिप और गांधी एंड सरला देवी चौधरानी में सधे हुए संतुलित ढंग से इन दोनों के बीच भावनात्मक एवं बौद्धिक स्तर के संबंधों का पूरा खुलासा किया है। ‘ओरिएंट ब्लैकस्वान’ सरीखे प्रतिष्ठित प्रकाशन के बैनर तले छपी यह पुस्तक इस विलक्षण मैत्री का बयान व विश्लेषण प्रस्तुत करती है।
चलिए अपने समय की इस बहुचर्चित महिला के बारे में कुछ जान लें। सरला देवी चौधरानी, रवींद्रनाथ टैगोर की भांजी थी और एक प्रखर लेखिका भी थीं। स्वतंत्रता सेनानी और सुसंस्कृत सरला देवी चौधरानी (9 सितंबर 1872-18 अगस्त 1845) एक असाधारण प्रतिभा, सौंदर्य और देशभक्ति से सराबोर विचारों की धनी महिला थीं। उन्हें उनके क्रांतिकारी विचारों और कार्यों के लिए भी जाना जाता था। जन्म कलकत्ता के एक प्रसिद्ध ठाकुर परिवार में हुआ था। उनकी माता स्वर्ण कुमारी देवी भी एक प्रख्यात बांग्ला लेखिका थीं। उसने बेथ्यून कॉलेज से स्नातक परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया था। वह रवींद्रनाथ टैगोर को प्यार से ‘रवि मामा’ कहती थीं। टैगोर परिवार के प्रबुद्ध और सांस्कृतिक माहौल में पली-बढ़ी होने के कारण उस पर मामा रवींद्रनाथ टैगोर का गहरा प्रभाव था। वह खुद एक अच्छी कवयित्री, लेखिका और संगीतज्ञ थीं।
सरला देवी ने एक प्रसिद्ध बंगाली पत्रिका ‘भारती’ का कुछ समय तक अपनी मां और बहन के साथ और बाद में अकेले (1899 से 1907 तक) संपादन भी किया था। इस साहित्यिक कार्य में उसे रवींद्रनाथ टैगोर का भी मार्गदर्शन और सहयोग मिला। जिस प्रकार टैगोर परिवार ने राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया, उसी तरह सरला देवी ने भी स्वदेशी आंदोलन के दौरान महिलाओं में राष्ट्रवाद की अलख जगाई। उन्होंने बंगाल और पंजाब के युवाओं में देशभक्ति की भावना को बढ़ावा दिया तथा भारत के पहले महिला संगठन ‘भारत स्त्री महामंडल’ की स्थापना की। स्वामी विवेकानंद और सरला देवी चौधरानी दोनों अपने समय के महान और ओजस्वी व्यक्तित्व थे जो एक-दूसरे के विचारों और तेजस्विता से बहुत प्रभावित थे।
सरला देवी की बुद्धिमत्ता, तेजस्विता और वैचारिक दृढ़ता से स्वामी विवेकानंद भी बहुत प्रभावित थे। वह भी स्वामी विवेकानंद के विचारों और आध्यात्मिकता से प्रेरित होकर स्वामी जी और हिमालय की ओर आकर्षित हुई थीं। स्वामी विवेकानंद सरला देवी की योग्यता और ऊर्जा से इतने मुग्ध थे कि वे उन्हें अपने साथ विदेश ले जाकर भारतीय संस्कृति और वेदांत का प्रचार-प्रसार करने में सहयोग करना चाहते थे। सरला देवी, विवेकानंद के मायावती आश्रम से मानसरोवर की यात्रा की योजना बना रही थीं लेकिन उसी दौरान उसकी माताजी का पत्र आया कि वह गंभीर रूप से बीमार हैं और उनकी अंतिम इच्छा सरला का विवाह देखने की है। इसके बाद उसका जीवन दूसरी दिशा में मुड़ गया और उसका विवाह लाहौर के पंडित रामभज दत्त चौधरी से हुआ।
महात्मा गांधी और सरला देवी चौधरानी का संबंध भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौर का एक गहरा बौद्धिक और भावुक अध्याय था जिसे गांधी जी ने स्वयं ‘आध्यात्मिक विवाह’ का नाम दिया था। गांधी जी और सरला देवी की पहली मुलाकात सन् 1901 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में हुई थी। मगर नज़दीकियां सन् 1909 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद शुरू हुईं, जब गांधी जी लाहौर आए और सरला देवी तथा उनके पति (राष्ट्रवादी नेता व वकील) रामभज दत्त चौधरी के घर ठहरे।
वहां भी सरला देवी की तेजस्विता, संगीत ज्ञान, सुंदरता और बौद्धिक क्षमता ने गांधी जी को बहुत अभिभूत किया। गांधी जी ने एक बार उससे कहा था, ‘आपकी हंसी राष्ट्र की धरोहर है।’ एक-दूसरे से दूर रहने पर भी दोनों नियमित रूप से पत्र लिखते थे। गांधी जी ने पत्रों में स्वीकार किया था कि सरला देवी उन्हें अपने सपनों में भी याद आती थीं। गांधी जी उन्हें अपनी ‘आध्यात्मिक जीवनसंगिनी’ मानते थे। सरला देवी ने कुछ समय तक देशभर में गांधी जी के साथ यात्राएं भी की थीं। महात्मा गांधी उनके बौद्धिक कौशल, राष्ट्र प्रेम और बेबाक व्यक्तित्व से गहरे प्रभावित थे।
उन्हीं दिनों सी. राजगोपालाचारी और गांधी जी के अन्य करीबी सहयोगियों को यह डर हुआ कि इस गहरे व्यक्तिगत संबंध से राष्ट्रीय आंदोलन पर असर पड़ सकता है और गांधी जी की छवि को ठेस पहुंच सकती है। सहयोगियों और परिवार के समझाने पर गांधी जी ने सरला देवी के साथ अपना पत्र-व्यवहार और घनिष्ठ संपर्क धीरे-धीरे बंद कर दिया। इसके बाद दोनों ने अपने रास्ते अलग कर लिए हालांकि बाद में सरला देवी के बेटे दीपक का विवाह गांधी परिवार के ही मगनलाल गांधी की पुत्री राधा से हुआ।
गांधी जी व सरला देवी के संबंधों की विशद चर्चा सुधीर कक्कड़ की एक कृति और बाद में प्रख्यात लेखिका अलका सरावगी के एक उपन्यास और स्वयं सरला देवी की बांग्ला भाषा में लिखी आत्मकथा ‘जीवनेर झरा पत्ता’ और उसके अंग्रेजी अनुवाद ‘दी मैनी वर्ल्डस ऑफ सरला देवी की डायरी’ में विस्तार से उपलब्ध है। वैसे गांधी जी का व्यक्तित्व व ‘जीवन सोपान’ इतना व्यापक है कि उसका किसी एक व्यक्ति या कुछ व्यक्तियों/लेखकों की रचनाओं के आधार पर पूरा आकलन नामुमकिन है मगर उनके जीवन-कैनवस पर मानवीय-संवेदना की गहरी रेखाओं में भी बहुत कुछ पढ़ा व देखा जा सकता है। उनका पठन-पाठन व सुलभ विशाल व्यक्तित्व उन्हें और भी ज्यादा बड़ा बना देता है।
विवेकानंद, टैगोर, गांधी और सरला देवी
Summary :
देश के वर्तमान तनावपूर्ण माहौल में डूबे रहने के स्थान पर कुछ पुराने सुखद लम्हों को याद करना शायद बेहतर होगा। गांधी जी के जीवन एवं उपलब्धियों की अपने-अपने नजरिए से बयान करने वाले, उनके निजी व वैचारिक जीवन में एक अनूठी महिला सरला देवी चौधरानी की भूमिका को कैसे भूल गए? यद्यपि सरला देवी चौधरानी के बारे में सरसरी चर्चाएं कहीं-कहीं होती रही हैं मगर अब अलका सरावगी सरीखी लेखिका के नए उपन्यास ‘गांधी और सरला देवी चौधरानी : 12 अध्याय’ एक बार फिर सरला देवी व बापू गांधी के मध्य संबंधों के अनेक नए प्रसंग खोले हैं। वैसे…


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