गर्मियों की शुरूआत के साथ ही देशभर में पानी की किल्लत शुरू हो गई है। इससे जुड़े समाचार विभिन्न माध्यमों से प्रकाश में आ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीती 29 मार्च को ‘मन की बात’ में कहा कि देश के कई हिस्सों में गर्मियों की शुरूआत हो चुकी है। ये समय जल संरक्षण के अपने संकल्प को फिर से दोहराने का है। पिछले 11 वर्षों में ‘जल संचय अभियान’ ने लोगों को बहुत जागरूक बनाया है। इस अभियान के तहत देशभर में करीब 50 लाख आर्टिफिशियल वाटर हार्वेस्टिंग स्ट्रक्चर बनाए गए हैं। इसी दिन देवभूमि उत्तराखंड के हल्द्वानी से ऐसी ही खबर आई।
पेयजल संकट की समस्या लेकर जल संस्थान के दफ्तर पहुंचे लोगों ने जमकर नारेबाजी की। महिलाओं की अधिकारियों के साथ बहस भी हुई। ऐसे में गुस्साए लोगों ने ईई कार्यालय पर ताला जड़ दिया और बाहर धरने पर बैठ गए। प्रयागराज-मिर्जापुर राजमार्ग पर स्थित मेजा रोड बाजार में भीषण गर्मी के साथ पेयजल संकट गहरा गया है। गर्मी की तल्खी के साथ ही हरियाणा के रेवाड़ी शहर में पेयजल संकट शुरू हो गया है।
गर्मी बढ़ने के साथ-साथ पानी का उपयोग भी बढ़ जाता है। आप ज्यादा पानी पीते हैं, ज्यादा नहाते हैं और एयर कंडीशनर, पंखे और कूलर लगातार चलाते रहते हैं लेकिन इसका असर सिर्फ व्यक्तिगत असुविधा तक ही सीमित नहीं है। जितनी ज्यादा गर्मी होती है, उतना ही ज्यादा पानी इस्तेमाल होता है। आप ज्यादा पानी पीते हैं। आप ज्यादा बार नहाते हैं। आप कूलर और पंखे ज्यादा देर तक चलाते हैं फिर भी पानी की जरूरतें बढ़ने के बावजूद आपूर्ति इसके साथ तालमेल बिठाने में संघर्ष कर रही है। वास्तव में यह घट रही है। आपने शायद पहले से ही पानी से जुड़ी रोजमर्रा की चुनौतियों को महसूस किया होगा।
नगर पालिका द्वारा पानी की आपूर्ति के घंटे कम होते जा रहे हैं, महंगे टैंकर के पानी पर निर्भरता बढ़ती जा रही है और भूजल स्तर चिंताजनक रूप से घट रहा है। नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार, लगभग 21 भारतीय शहरों में जल्द ही भूजल खत्म होने की आशंका है जिससे 1 करोड़ से अधिक लोग प्रभावित होंगे। इनमें चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद और दिल्ली जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं।
जल, जिसे कभी एक नि:शुल्क और असीमित संसाधन माना जाता था, अब भारत के लिए जीवन-मरण का सबसे बड़ा संकट बनता जा रहा है। भारत में जल संकट न केवल भविष्य का खतरा है, बल्कि देश के कई हिस्सों में पहले से ही एक चुनौती बना हुआ है।
दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे महानगरों से लेकर राजस्थान, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे सूखाग्रस्त राज्यों तक, इसके संकेत हर जगह दिखाई दे रहे हैं। बेंगलुरु के 2024 के संकट को ही लीजिए, जब पूरे महानगर में बोरवेल और झीलें सूख गईं। टैंकरों की कीमतें आसमान छू गई जिससे हजारों लोगों को पीने और दैनिक उपयोग के लिए पानी की राशनिंग करनी पड़ी। रिपोर्ट में बताया गया कि बेंगलुरु जल आपूर्ति और सीवरेज बोर्ड बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा था, जिसके चलते कई समुदायों को प्रति टैंकर 2500 रुपये तक चुकाने पड़े, जो सामान्य कीमत से लगभग दोगुना था।
चेन्नई, जो 2019 में भीषण संकट के दौर से गुजरा था, आज भी गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है और इस साल भी जलाशयों का जलस्तर खतरनाक रूप से कम हो गया है। दिल्ली-एनसीआर में टैंकरों पर बढ़ती निर्भरता और घटते भूजल स्तर ने लाखों लोगों के लिए पानी को एक दैनिक संघर्ष बना दिया है और इसका असर सिर्फ शहरों तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीण क्षेत्र भी इससे समान रूप से प्रभावित हैं। फसलें बर्बाद होने, बोरवैल सूखने और सिंचाई की लागत बढ़ने से किसानों को इस संकट का सबसे ज्यादा सामना करना पड़ रहा है जिससे भारत की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ गई है। कपड़ा, विनिर्माण और निर्माण जैसे जल पर निर्भर उद्योगों को भी परिचालन संबंधी जोखिमों और बढ़ती लागतों का सामना करना पड़ रहा है।
भारत का जल संकट रातों-रात नहीं आया। यह दशकों से पानी के अत्यधिक उपयोग, खराब योजना और निष्क्रियता का परिणाम है, जिसके चलते यह समस्या हर साल और भी गंभीर और खतरनाक रूप ले रही है। बढ़ती जनसंख्या, तीव्र शहरीकरण, प्राकृतिक जल संसाधनों का प्रदूषण और अनियंत्रित भूजल दोहन ने भूजल पर अत्यधिक दबाव डाला है, जो भारत की लगभग 85 फीसदी पेयजल आपूर्ति करता है। शहर अपनी जल प्रणालियों की क्षमता से कहीं अधिक तेजी से फैल रहे हैं और 2025 की शुरूआती और भीषण गर्मी के साथ मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर और भी बढ़ रहा है।
जल संसाधनों का बढ़ता प्रदूषण समस्या को और भी गंभीर बना देता है। गंगा, यमुना और गोदावरी जैसी नदियां कचरे और रसायनों से भर गई हैं जिससे अधिक से अधिक लोग घटते भूजल या महंगे टैंकर से आने वाले पानी पर निर्भर होने के लिए मजबूर हो रहे हैं। शहरी झीलें और तालाब या तो सूख गए हैं या विषैले हो गए हैं जिससे लाखों लोगों के पास सुरक्षित जल के स्रोत कम होते जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण अप्रत्याशित बारिश और लंबे समय तक सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है जिससे जल संकट एक राष्ट्रीय आपातकाल में बदल गया है जो स्वास्थ्य, भोजन और अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है।
इस बीच, पानी की बर्बादी हर दिन जारी है, टैंक ओवरफ्लो हो रहे हैं, पाइप लीक हो रहे हैं और नल लगातार बह रहे हैं। बहुत से लोग अब भी पानी को असीमित मानते हैं, यह नहीं समझते कि आज बर्बाद की गई हर बूंद हमें कल पानी की कमी के करीब ले जाती है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, अब बर्बादी बंद करके बचत शुरू करने का समय आ गया है। भारत में भीषण गर्मी का प्रकोप जारी रहेगा और पानी की कमी और भी बदतर होती जाएगी। साथ ही यह जल संकट सिर्फ इस गर्मी तक सीमित नहीं है। जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि और खराब जल नीतियां हमें राष्ट्रीय आपातकाल की ओर धकेल रही हैं।
गर्मी का मौसम आ चुका है और पानी की कमी की समस्या भी शुरू हो गई है। बढ़ते तापमान, लंबे दिनों और अनिश्चित आपूर्ति के कारण भारत के अधिकांश शहरों और कस्बों में पानी की कमी होना लगभग तय है। कुछ ही समय में पानी की कटौती, टैंकरों पर निर्भरता और नलों का सूखा पड़ना आपकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाएगा लेकिन आपको संकट के आने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है। पानी की कमी के तनाव से बचने के लिए आप अभी कुछ आसान और कारगर कदम उठा सकते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं है कि गर्मी के मौसम में पेयजल संकट हर वर्ष अधिक गंभीर होता जा रहा है। पेयजल संकट से बचने के लिए जल संरक्षण को सामूहिक लक्ष्य बनाना होगा। इसमें सरकार और समाज दोनों की बराबर जिम्मेदारी है। कुओं, झीलों, तालाबों और अन्य पारंपरिक जल स्रोतों की सफाई और संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। वर्षा जल संचयन को घरों और संस्थानों में अनिवार्य बनाया जाए, ताकि वर्षा का पानी संरक्षित होकर भूजल स्तर बढ़ा सके साथ ही पुराने तालाबों, कुओं और बावड़ियों का पुनर्जीवन किया जाना चाहिए। शहरों में पाइपलाइन लीकेज को तुरंत ठीक कर पानी की बर्बादी रोकना भी जरूरी है। यदि सरकार और समाज मिलकर प्रयास करें तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


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