संसद के बजट सत्र के चालू रहते ही चुनाव आयोग ने देश के चार राज्यों असम, केरल, तमिलनाडु व प. बंगाल सहित केन्द्र प्रशासित क्षेत्र पुडुचेरी में विधान सभा चुनावों की घोषणा करके इनमें आदर्श आचार संहिता को लागू कर िदया है अतः स्वाभाविक है कि इन चुनावों के लिए होने वाली राजनैतिक लड़ाई की प्रति ध्वनियां हमें संसद से लेकर सड़क तक सुनाई पड़ने लगी हैं। इस सिलसिले में लोकसभा के आठ विपक्षी सांसदों की बहाली को भी नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता है जिन्हें बजट सत्र के प्रथम चरण के दौरान सदन में अवांछित आचरण के लिए अध्यक्ष ने पूरे बजट सत्र में संसद की शेष बैठकों में शामिल होने से रोक दिया था। लोकतन्त्र में एेसी कार्रवाई का समर्थन इसलिए आम तौर पर नहीं किया जाता है क्योंकि एक सांसद अपने क्षेत्र के लाखों लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है और भारत का लोकतन्त्र सहभागिता का लोकतन्त्र कहलाता है अतः सदन से सांसदों का निलम्बन आम जनता की सहभागिता को ही नकारने का काम करता है अतः आठ सांसदों की बहाली का स्वागत किया जाना चाहिए और इसे भारतीय लोकतन्त्र में आम जनता के समुचित प्रतिनिधित्व के रूप में लिया जाना चाहिए।
चुनाव आयोग ने जिन राज्यों में इनकी विधानसभाओं के कार्यकाल के पांच साल पूरे हो जाने पर समय रहते चुनाव कराने की घोषणा की है वह लोकतन्त्र की सदैव जीवन्तता को शिखर पर रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी है। जिन चार राज्यों में चुनावों की घोषणा की गई है उनमें सबसे अधिक चर्चा प. बंगाल की इसलिए हो रही है क्योंकि केन्द्र में 2014 में भाजपा की मोदी सरकार गठन होने के बाद 2016 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों से इस प्रदेश की राजनीति में आधारभूत परिवर्तन हुआ है। राज्य में भाजपा एक शक्तिशाली राजनैतिक दल के रूप में उभरी है और इसने इससे पूर्व राजनैतिक धुरी रहे वामपंथी दलों को नैपथ्य में धकेल दिया है। हालांकि 2011 के चुनावों में राज्य की मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने वामपंथी दलों के लम्बे शासन का खात्मा करके सत्ता की बागडोर संभाल ली थी । इन चुनावों में भाजपा को मात्र चार प्रतिशत मत ही मिले थे मगर 2016 के चुनावों में इनमें कई गुना वृद्धि हुई और वामपंथी दलों की जगह इस पार्टी ने एक विकल्प के रूप में ले ली। पिछले 2021 के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस बेशक 294 सदस्यीय विधानसभा में दो तिहाई से अधिक सीटें जीतने में कामयाब रही मगर भाजपा ने उससे लगभग छह प्रतिशत मत कम लेते हुए 77 सीटें जीत लीं। इससे भाजपा में तृणमूल कांग्रेस का एकमात्र विकल्प बनने की जिज्ञासा जागृत हुई। इसी वजह से हम आज देख रहे हैं कि भाजपा सुश्री ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल करने के लिए अपनी ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। मगर यह काम इतना आसान भी नहीं है जितना भाजपा के नेता सोच रहे हैं क्योंकि ममता बनर्जी की राजनीति शुरू से ही लोकोन्मुख रही है और वह सीधे सड़क पर संघर्ष करके जन नेता बनी हैं। पिछले 15 साल से सत्ता में रहने के बावजूद उन्होंने अपनी इस राजनैतिक कला का परित्याग नहीं किया है और हर संवेदनशील मौके पर वह आम जनता के बीच ही संघर्ष करती नजर आयी हैं। इसके साथ यह भी हकीकत है कि भाजपा ने इस राज्य में ममता दीदी के ही संगठन से कुछ मजबूत समझे जाने वाले स्तम्भों को अपने संगठन में लेकर सत्ताधारी पार्टी के विरुद्ध अलख जगाने का भगीरथ प्रयास किया है । इनमें 2020 से पहले तक ममता बनर्जी के खास सहयोगी माने जाने वाले नेता सुवेन्दु अधिकारी का नाम सबसे प्रमुख है जो फिलहाल विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं। पिछले 2021 के चुनावों में राज्य की नन्दीग्राम सीट पर ममता दी व अधिकारी के बीच कड़ा मुकाबला हुआ था जिसमें ममता दी मात्र 1900 से कुछ अधिक वोटों से हार गई थीं। बाद में उन्होंने कोलकोता क्षेत्र में पड़ने वाली भवानीपुरा सीट से उपचुनाव लड़कर 58 हजार मतों से जीत दर्ज की थी। परन्तु राज्य में हुए हाल ही में मतदाता सूची के पुनरीक्षण में इस क्षेत्र के 47 हजार के लगभग मतदाताओं का नाम कट गया है जबकि सुवेन्दु अधिकारी ने नन्दी ग्राम के साथ ही भवानीपुरा से भी चुनाव लड़ने का एेलान किया है। परन्तु ममता दीदी ने भी इस बार अधिकारी को नन्दीग्राम में ही घेरने की रणनीति को अंजाम दे दिया है और दो दिन पहले तक उनके परम विश्वास पात्र रहे पबित्र कार को नन्दीग्राम से चुनाव लड़ाने का एेलान कर दिया है। ममता दीदी ने सुबह पबित्र कार को अपनी पार्टी में शामिल किया और शाम को उन्हें नन्दीग्राम से प्रत्याशी घोषित कर दिया। इससे यह अन्दाजा तो लग सकता है कि राज्य की राजनीति में विचारधारा का अब वह महत्व नहीं रह गया है जिसके लिए कभी प. बंगाल जाना जाता था बल्कि अब यह ‘जैसे को तैसा’ के स्तर पर आ गई है। प. बंगाल में होने वाले चुनावी रण में इस बात की परख पुनः होगी कि राज्य में मतदान पूरे शान्तिपूर्ण माहौल में हो पाता है कि नहीं क्योंकि चुनाव आयोग ने मतदान तारीखों की जानकारी देने के तुरन्त बाद ही समूचे राज्य प्रशासन को बदलते हुए मुख्य सचिव से लेकर पुलिस महानिदेशक व अन्य वरिष्ठतम अधिकारियों के तबादले कर दिये हैं जिस पर ममता बनर्जी ने सख्त आपत्ति भी दर्ज कराई है । इन परिस्थितियों से भी प. बंगाल के चुनावों का शेष अन्य तीन राज्यों के मुकाबले महत्व बढ़ गया है। लेकिन इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि भवानीपुरा सीट से ममता बनर्जी और सुवेन्दु अधिकारी का मुकाबला किस मोड़ पर आकर ठहरेगा। इस बार भाजपा ने सुवेन्दु अधिकारी को इस सीट से ममता बनर्जी से पहले ही अपना प्रत्याशी बनाकर उतार दिया था जबकि ममता दी ने उनका मुकाबला करने की घोषणा बाद में की। पिछले 2021 के चुनावों में ठीक इसका उल्टा हुआ था। अतः हम इसी राज्य में हम सबसे भीषण चुनावी संघर्ष देखेंगे।


















