भारत का पूरा लोकतन्त्र जिस आधार पर टिका हुआ है उसका नाम सर्वाधिकार सुरक्षित प्रत्येक वयस्क नागरिक को मिला मतदान का अधिकार है। इस अधिकार को संरक्षित व संचालित करने का दायित्व चुनाव आयोग का है। अतः प. बंगाल में चल रहे विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य में किसी भी वैध मतदाता का नाम न छूटे, इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर ही आती है परन्तु एक अंग्रेजी अखबार द्वारा किये जांच-परख अभियान के दौरान इस सन्दर्भ में जो तथ्य निकल कर सामने आये हैं वे चौकाने वाले हैं और बताते हैं कि किस प्रकार अपने मतदाता होने के सभी आवश्यक प्रमाण रखने वाले नागरिकों के नाम भी नई मतदाता सूची से काट दिये गये हैं। वास्तव में यह बहुत गंभीर मामला है क्योंकि देश का सर्वोच्च न्यायालय आदेश दे चुका है कि सभी प्रमाणित बंगाली नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल किये जाने चाहिए। प. बंगाल में आगामी 23 व 29 अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने हैं और इससे पहले यह काम हो जाना चाहिए था। इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि बंगाल में जिन 27 लाख मतदाताओं को विवादास्पद बताकर चुनाव आयोग ने उनके नाम तकनीकी खामियों की वजह से मतदाता सूची से काटे थे उनकी सुनवाई कोलकाता उच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त सुनवाई ट्रिब्यूनलों में 21 अप्रैल व 27 अप्रैल से पहले की जाये। मगर व्यावहारिक तौर पर इस आदेश की अनुपालना बंगाल में नहीं की जा सकी और इंटरनेट व डिजिटल माध्यम से ही विवादित मतदाता अपनी आपत्तियां बहुत कम संख्या में दर्ज करा सके। इससे पूरी चुनाव प्रक्रिया को लेकर ही कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी सवाल भी उठ सकते हैं जिन पर केवल सर्वोच्च न्यायालय ही कुछ कह सकता है क्योंकि भारत की चुनाव प्रणाली में हार-जीत का निर्णय प्रत्याशियों द्वारा वैयक्तिक स्तर पर अधिक वोट पाने के आधार पर होता है। यह मामला कानूनी रूप से इतना अधिक पेचीदा है कि इसे सिर्फ विधि विशेषज्ञ ही समझ सकते हैं परन्तु जहां तक आम नागरिकों का सवाल है तो जिस व्यक्ति ने 2002 के चुनावों में मत डाला है और उसका नाम उस समय की मतदाता सूची में दर्ज था तो वह नाम 2026 की मतदाता सूची से कैसे कट सकता है? क्योंकि 2002 में भी विशेष मतदाता पुनरीक्षण का कार्य हुआ था। अंग्रेजी अखबार की जांच में पाया गया कि 55 वर्षीय सुकला हाजरा का नाम 2002 की मतदाता सूची में था और उसके पास वैध पासपोर्ट भी है जिसकी अवधि 2028 तक की है। केवल इसी पैमाने पर उसका नाम 2026 की मतदाता सूची में दर्ज होना चाहिए। मगर चुनाव आयोग ने उसका नाम विवादास्पद मतदाता के रूप में सूची से काट दिया। इसी प्रकार 56 वर्षीय अमीरन बेगम अली और उनकी दो पुत्रवधुओं आरिफा बेगम शेख व शाहिदा खातून के नाम भी 27 लाख विवादास्पद मतदाताओं में जोड़ दिये गये जबकि दोनों के तार 2002 की मतदाता सूची में दर्ज उनके मूल परिवारों के तारों से जाकर जुड़ते हैं और बताते हैं कि वे भारत की मूल नागरिक हैं और 18 वर्ष की आयु को कब की पार कर चुकी हैं। इसी तरह 39 वर्षीय सुबर्ना मंडल ने चुनाव आयोग को प्रमाण दिया कि उनके माता-पिता व दादा-दादी के नाम 2002 की मतदाता सूची में दर्ज थे। उन्होंने अपना जन्म प्रमाणपत्र व दसवीं कक्षा का प्रमाणपत्र भी आयोग में जमा किया परन्तु उनका नाम भी नई मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया। इसी तर्ज पर सैकड़ों अन्य मतदाताओं के नाम चुनाव आयोग ने काट दिये हैं और इसका कारण तार्किक अनियमितता (लोजीकल डिस्क्रिपेंसी) बताया है। आयोग ने जो 27 लाख नाम काटे हैं सबकी वजह यही ‘अनियमितता’ बताई है। इससे जाहिर है कि प. बंगाल के मतदाताओं में अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज न होने के कारण भारी बेचैनी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने इसी अनियमितता की जांच करने के लिए सुनवाई ट्रिब्यूनलों को गठित करने का आदेश दिया था मगर इनका कार्य ही ठीक ढंग से नहीं हो सका, जिसकी वजह से देश की सबसे बड़ी अदालत ने कोलकाता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से इस बारे में रिपोर्ट तलब कर ली है। इससे स्पष्ट है कि चुनाव आयोग अपनी वह जिम्मेदारी निभाने से पीछे हट रहा है जिसके लिए वह प्राथमिक रूप से बंधा हुआ है। बेशक प. बंगाल में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की समस्या है मगर इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि भारत के वैध नागरिकों पर ही सन्देह किया जाये और उन्हें उनके उस सबसे बड़े संवैधानिक अधिकार से वंचित कर दिया जाये जिस पर भारत का पूरा लोकतन्त्र टिका हुआ है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि संविधान निर्माता बाबा साहेब अम्बेडकर ने चुनाव आयोग के बारे में क्या कहा था ? उन्होंने बहुत साफ लफ्जों में कहा था कि हम जो कुछ भी इस संविधान में लिख रहे हैं उसका क्रियान्वयन भारत के नागरिक के एक वोट के स्वयंभू अधिकार पर निर्भर करता है क्योंकि देश में सरकारें बनाने व बिगाड़ने का अधिकार केवल नागरिकों के पास ही है। इसलिए हमारे लोकतन्त्र में चुनाव आयोग का पूरी तरह पाक-साफ रहना बहुत जरूरी है। इसी वजह से इसकी संरचना हमारे संविधान निर्माताओं ने गैर राजनीतिक आधार पर इस प्रकार की कि किसी भी दल की सत्तारूढ़ सरकार उसकी नियुक्ति ‘संवैधानिक नैतिकता’ को सर्वोपरि रखते हुए करे। इसके समानान्तर यह भी सत्य है कि आजादी के बाद से चुनाव आयोग अपने कर्त्तव्य का निर्वाह पूरी सत्य निष्ठा करता रहा है परन्तु पिछले दो दशकों से उसकी कार्यप्रणाली पर कुछ सवालिया निशान उठने शुरू हो गये हैं। सवाल इन्हीं सवालिया निशानों को हटाने का है। इस मामले में वर्तमान चुनाव आयोग की विशिष्ट भूमिका है क्योंकि उस पर विशेष पुनरीक्षण के नाम पर मतदाताओं के नाम काटने का आरोप विपक्षी दल लगा रहे हैं जबकि संविधान कहता है कि चुनाव आयोग ही राजनीतिक दलों के नियमन के लिए जिम्मेदार संस्था है। इसलिए समस्या का समाधान जल्दी से जल्दी ढूंढा जाना चाहिए।
प. बंगाल की मतदाता सूची !
Summary :
भारत का पूरा लोकतन्त्र जिस आधार पर टिका हुआ है उसका नाम सर्वाधिकार सुरक्षित प्रत्येक वयस्क नागरिक को मिला मतदान का अधिकार है। इस अधिकार को संरक्षित व संचालित करने का दायित्व चुनाव आयोग का है। अतः प. बंगाल में चल रहे विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्य में किसी भी वैध मतदाता का नाम न छूटे, इसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग पर ही आती है परन्तु एक अंग्रेजी अखबार द्वारा किये जांच-परख अभियान के दौरान इस सन्दर्भ में जो तथ्य निकल कर सामने आये हैं वे चौकाने वाले हैं और बताते हैं कि किस प्रकार अपने मतदाता होने के सभी आवश्यक…


Download Android App
Download iOS App



