अमेरिका बहुत शक्तिशाली देश है। सामरिक दृष्टि से अमेरिका बहुत बड़ा है। वह क्षणभर में दुनिया के किसी भी हिस्से में कहीं भी कहर ढा सकता है। यह रिश्ता भय का रिश्ता है और मौत का भी। परमाणु ऊर्जा के नाम पर जितना मौत का सामान अमेरिका ने इकट्ठा कर रखा है उतना दूसरों ने नहीं कर रखा। यह वही देश है जिसने 1945 में परमाणु बम का इस्तेमाल जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर किया था। किसी जापानी से उस पीड़ा का अहसास पूछें। अमेरिका ने खुद परमाणु बमों का जखीरा रखा हुआ है लेकिन वह किसी और देश को परमाणु ताकत बनते देख नहीं सकता।
ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम नागरिक हितों के उद्देश्य के लिए है लेकिन अमेरिका स्वयं ऐसी आतंकवादी दादागिरी कर रहा है कि वह किसी की बात सुने या न सुने। अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर उसके सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई और अन्य कमांडरों की हत्या कर दी। अमेरिका ने इससे पहले अरब के कई देशों में लोकतंत्र के नाम पर गृहयुद्ध छिड़वाए और फिर वहां तख्तापलट किया। इराक में भी विनाशकारी हथियारों की तलाश के नाम पर अमेरिका ने हमला किया था और सद्दाम हुसैन को फांसी तक दे दी थी। हालांकि वो रासायनिक हथियार कभी नहीं मिले और इराक तबाह हो गया। लीबिया में कर्नल गद्दाफी, मिस्र में होसनी मुबारक, सीरिया में बशर अल असद ऐसे कई शासनाध्यक्ष अच्छे थे या बुरे थे लेकिन अमेरिका ने वहां भी दखल दिया।
आज तक इन देशों में अराजकता फैली हुई है, जिसे पूरी दुनिया देख रही है। वेनेजुएला में डोनाल्ड ट्रम्प ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पत्नी समेत अगवा कर लिया। अमेरिका ईरान को भी उसी रास्ते पर धकेलना चाहता है। अमेरिका और इजराइल ने ऐपिक फ्यूरी और रोरिंग लायन अभियान का उद्देश्य ईरान का परमाणु हथियार कार्यक्रम बताया। फिर पुरानी कहानी दोहराई गई कि अगर ईरान पर हमला नहीं करते तो वह परमाणु बम बनाने के शायद एक सप्ताह दूर था। अमेरिका और इजराइल ने ईरान की मिसाइलों को खत्म करने की शर्त भी रखी। ईरान ने जिस तरह से इजराइल पर ताबड़तोड़ मिसाइल और ड्रोन हमले किए और खाड़ी देशों में स्थित अमेरिका ठिकानों को निशाना बनाया उससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान पर हमला कर अपनी और पार्टी के पांव पर कुल्हाड़ी तो नहीं मार ली।
डोनाल्ड ट्रम्प को वरिष्ठ सलाहकारों ने चेतावनी दी थी कि यह जंग कहीं लम्बी हुई तो नवम्बर में होने जा रहे मध्यावधि चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक जोखिम पैदा कर सकती है। जबकि ट्रम्प यह समझते हैं कि यह सैन्य कार्रवाई अमेरिका के भीतर उन्हें मजबूत नेता के रूप में दिखा सकती है। सच्चाई तो यह है कि रविवार को किए गए एक सर्वे के अनुसार केवल चार में से एक अमेरिकी ने ईरान पर अमेरिकी हमलों का समर्थन किया। लगभग आधे लोगों जिनमें चार में से एक रिपब्लिकन भी शामिल है, का कहना है कि ट्रम्प सैन्य ताकत का इस्तेमाल करने के लिए बहुत जल्दी तैयार हो जाते हैं।
फरवरी के एक सर्वे के अनुसार लगभग 58 प्रतिशत अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से असंतुष्ट हैं। इसलिए रिपब्लिकन पार्टी को अपने मुख्य समर्थकों की भारी संख्या में उसके पक्ष में वोट देने की जरूरत होगी, ताकि डेमोक्रेटिक पार्टी कांग्रेस में बढ़त न ले सके। खामेनेई की माैत के बावजूद ईरान में हकूमत यथावत है। खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई को ईरान का नया सुप्रीम लीडर घोषित भी कर दिया गया है। ईरान के लोग रोते-बिखलते संकल्प ले रहे हैं कि लड़ेंगे, मरेंगे लेकिन आत्मसमर्पण नहीं करेंगे। खामेनेई की हत्या ने ईरान की जनता को एकजुट करके रख दिया है। ईरान के रेवेल्यूश्नरी गार्ड्स के लड़ाके इजराइल की राजधानी यरुशलम और तेल अवीव के साथ-साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन, कुवैत को अपनी मिसाइलों का निशाना बनाने में सफल रहे।
ट्रम्प ने ऐलान किया है कि वह अपनी सेना को ईरान में भेजने से परहेज नहीं करेंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रम्प ने ऐसी भयंकर भूल की तो अमेरिका को बहुत महंगी पड़ेगी। ईरानी सेना गुरिल्ला युद्ध में बहुत माहिर है। अमेरिका वहां जीत नहीं सकता। अमेरिका सेना का हश्र वही होगा जो अफगानिस्तान में हुआ था। खाड़ी देशों का समीकरण बदल चुका है। ईरान ने होमुर्ज जलडमरू मध्य समुद्री मार्ग में तेल टैंकरों पर हमले शुरू कर दिए हैं। तेल और गैस के लिए हाहाकार मच चुका है। फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, कोलम्बिया ट्रम्प के एक्शन की आलोचना कर रहे हैं। कुवैत और कतर भी युद्ध रोकने की दुहाई दे रहे हैं।
फिलहाल युद्ध रुकवाने के लिए कोई भी देश सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार नहीं है। यह सवाल सामने है कि क्या दुनिया की मौजूदा शक्ति संरचना वास्तव में शांति स्थापित करने में सक्षम है या फिर यह व्यवस्था युद्धों को जारी रखने वाली संरचना में बदल चुकी है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण महाशक्तियों के बीच संतुलन की राजनीति है। आज की दुनिया में शक्ति के दो बड़े ध्रुव दिखाई देते हैं। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका और उसके सहयोगी देश हैं, जिनमें इज़राइल प्रमुख है; दूसरी ओर चीन और रूस जैसे देश हैं जो पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिश करते हैं लेकिन यह चुनौती हमेशा प्रत्यक्ष सैन्य टकराव के रूप में नहीं होती।
वे अक्सर कूटनीतिक विरोध और सीमित समर्थन तक ही खुद को सीमित रखते हैं, क्योंकि उन्हें यह डर भी रहता है कि सीधी टक्कर तीसरे विश्व युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर सकती है। चीन की नीति विशेष रूप से इस संदर्भ में समझने योग्य है। चीन स्वयं को वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है और उसकी प्राथमिकता व्यापार, निवेश और आर्थिक विस्तार है। इसलिए वह सैन्य टकराव से बचते हुए अक्सर मध्यस्थता और संतुलन की भूमिका निभाने का प्रयास करता है। वह युद्ध की निंदा तो करता है, लेकिन प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप या कठोर दबाव की राह पर आसानी से नहीं जाता। यह लड़ाई लम्बी खिंची तो इसका असर दुनिया भर में आम लोगों पर होगा।
जो लोग पहले से ही आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं उन्हें और महंगाई का सामना करना पड़ेगा। युद्धों में कोई नहीं जीतता, हारती है तो सिर्फ मानवता। दुनिया के लिए बेहतर यही होगा कि यह लड़ाई जल्द से जल्द रुक जाए।


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