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अकालियों को सत्ता रहते पंथक मसलों की याद क्यों नहीं आई

सिख मसलों के समाधान एवं पंथक हितों की रक्षा के लिए 1920 में शिरोमणि अकाली दल का गठन हुआ। काफी समय तक ऐसा होता भी आया मगर जब से दल के साथ एक व्यक्ति विशेष का नाम जुड़ गया उसी दिन से मानो अकाली दल में गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया। अकाली दल अपने मुख्य एजेन्डे से हटकर राजनीतिक पार्टी बनकर रह गया जिसके नेतागण अपने निजी स्वार्थों एवं कुर्सी की खातिर पंथ को दाव पर लगाने से भी नहीं हिचकिचाए। अकाली नेताओं को आज बन्दी सिखों की रिहाई और अन्य पंथक मसले याद आ रहे हैं पर अफसोस जब इनके पास सत्ता थी और बहुत ही आसानी के साथ यह मसलों का समाधान करने में सक्षम थे उस समय इन्होंने पंथक मसलों को हल करने के बजाए जिन लोगो ने पंथ को नुकसान पहुंचाया उन्हें उच्च पदों पर बिठाया। आज श्री अकाल तख्त साहिब के कार्यवाह कर जत्थेदार भाई गुरदेव सिंह काउंके जिन्हें सरबत खालसा द्वारा जत्थेदार बनाया गया था। अकाली दल के नेता तो उन्हें जत्थेदार भी नहीं मानते थे क्योंकि अकाली दल शिरोमणि कमेटी द्वारा लगाये गये जत्थेदार को ही मान्यता देता है। सूत्र बताते हैं कि जत्थेदार भाई गुरदेव सिंह काउंके को 25 दिसम्बर 1992 को पंजाब पुलिस के द्वारा 200 लोगों की मौजूदगी में उनके निवास से गिरफ्तार कर पुलिस हिरासत मे रखकर इस कदर जुल्म किये जिन्हें बयान भी नहीं किया जा सकता। पुलिस हिरासत में उनकी मौत हुई लेकिन उन्हें भगौड़ा साबित कर दिया गया। उस समय भी अकाली दल ने जत्थेदार गुरदेव सिंह काउंके की मौत पर राजनीति करते हुए सिखों से वोट ही जत्थेदार काउंके के दोषियों को सजा दिलाने के नाम पर लिए, 1997 में उनकी सरकार भी बन गई। 1998 में केस की छानबीन के लिए बनी डीजीपी तिवारी की कमेटी ने रिपोर्ट स्वयं को पंथक कहलाने वाली सरकार को सौंपी तो उन्होंने उसे ठण्डे बस्ते में डाल दिया। 2002 और 2007 से लेकर 2017 तक अकाली दल की सरकार बनने के बाद भी बादल परिवार कों जत्थेदार काउंके की याद तक नहीं आई। जत्थेदार काउंके के पुत्र की माने तो पुलिस अधिकारी सुमेध सिंह सैनी जो 1992 में आईजी लुधियाना थे द्वारा जगराओं थाना जाकर जत्थेदार काउंके से पूछताछ के दौरान उनके साथ ऐसी बदसलूकी हुई जिससे कोई आम सिख भी कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता फिर गुरदेव सिंह काउंके तो कौम के जत्थेदार थे, वह कैसे सहन करते जिसके चलते उन्होंने सुमेध सैनी को तमाचा जड़ दिया। इसके बाद बौखलाते हुए सुमेध सैनी ने कहा कि इसे ऐसी सज़ा दी जाए कि कौम व पंथ की रूह कांप उठे। ऐसे शख्स को उस समय के गृहमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने डी.जी.पी नियुक्त करके सिख पंथ के घावों पर नमक छिड़कने का काम किया। पंजाब में कई वर्षों तक अकाली दल की सरकार रही, फिर तब बंदी सिखों की रिहाई की याद नहीं आई। आज जब ह्यूमन राइट कमीशन के द्वारा जत्थेदार गुरदेव सिंह काउंके केस को पुनः उजागर किया तो अकाली दल ने भी इस मुद्दे को उठाया शायद उन्हें लगा होगा कि इसके नाम पर फिर से वह अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल कर सकते हैं। देखा जाए तो निरंकारी काण्ड जिसमें सैकड़ों बेगुनाह सीखो की जान गई, गुरु ग्रन्थ साहिब के 328 स्वरुपों के लापता होने, आए दिन गुरु ग्रन्थ साहिब की बेदबी होना, डेरावाद का दायरा निरन्तर बढ़ना, बेदबी के दोषियों को सजा दिलाने की मांग कर रही संगत पर बहबलकला में गोली चलना सब पंथक सरकार के कार्यकाल में ही हुआ। इन्हीें बातों के चलते सिख समुदाय ने आज अकाली दल को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सिख समुदाय को उम्मीद
देश के प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा जिस प्रकार सिख गुरुओं के दिन मनाए जा रहे हैं। साहिबजादों की शहादत की जानकारी देश के हर नागरिक को देने हेतु प्रयास करते हुए ‘‘वीर बाल दिवस’’ के रुप में 26 दिसम्बर का दिन निर्धारित किया गया। सिख समुदाय की लम्बे समय से पाकिस्तान स्थित गुरुघरों के दर्शनों की मांग को स्वीकार करते हुए करतारपुर साहिब के दर्शनों को मन्जूरी देने जैसे अनेक कार्य किये जा रहे हैं। देश को आजाद हुए 76 साल बीत चुके हैं, इन 76 सालों में देश में जितनी भी सरकारे आई सिखों के प्रति रवैया अलग ही रहा जबकि इतिहास गवाह है कि आज अगर देश सलामत है तो सिख समुदाय की बदौलत ही है। देश को आजाद करवाने में भी सबसे अधिक कुर्बानिया सिखों ने दी मगर आजादी मिलते ही देश के हुकमरानों के तेवर बदल गये और उन्हे सिख जराएपेशा लगने लगे क्यांकि उन्होंने अपने हक सरकार से मांग लिये थे। 1984 में सिखों के पवित्र स्थान दरबार साहिब को टैंको तोपों से उड़ाया गया, हजारों बेगुनाहों का खून बहाया गया, इतना ही नहीं देशभर में सिखं का कत्लेआम हुआ और दोषियों को सजा तक नही मिली। मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आते ही बन्द हो चुके केसों पर पुनः कार्यवाई आरंभ करवाई। गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाश पर्व, गुरु नानक देव जी का 550वां प्रकाश पर्व, साहिबजादों की शहादत का दिन सरकारी स्तर पर मनाया जाना अपने आप में सराहनीय कदम है क्योंकि आज तक देश की सरकारों ने स्कूली बच्चों को औरंगजेब का इतिहास तो पढ़ाया मगर हिन्दू धर्म की रक्षा, मानवता की रक्षा करने वाले गुरु तेग बहादुर, गुरु गोबिन्द सिंह, साहिबजादांे के इतिहास से वंचित रखा।
भाजपा सिख सैल नेता रविन्द्र सिंह रेहांसी का मानना है कि जो काम सिख प्रधानमंत्री भी नहीं कर पाया वह नरेन्द्र मोदी के द्वारा किया गया है जिसके चलते सिख समुदाय हमेशा उनका आभार प्रकट करता रहेगा। रविन्द्र सिंह रेहांसी पिछले लम्बे समय से भाजपा से जुड़े हुए हैं और मौजूदा में भी पश्चिमी जिले के उपाध्यक्ष के तौर पर सेवाएं दे रहे है। उनका मानना है कि अभी भी सिखों की गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी, गुरुद्वारा डांगमार जैसी अनेक समस्याएं हैं जिनका स्थाई हल भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा आने वाले समय में कर सकते हैं। शायद इसी के चलते आज सिख समाज भाजपा के समीप आने लगा है वरना 1984 के बाद कांग्रेस पार्टी से मोहभंग होने के बाद सिख समुदाय को किसी भी पार्टी पर यकीन नहीं रहा था। मगर आज एक बार फिर से सिख समुदाय भाजपा से जुड़ रहा है और भाजपा भी उन्हें बनता सम्मान देने की कोशिश कर रही है। समाजसेवी दविन्दरपाल सिंह पप्पू का मानना है प्रधानमंत्री के द्वारा सिख समाज की जो छवि आज संसार भर के सामने बनाई गई है, उसे सिख समाज आपस में लड़-झगड़कर खराब करने के बजाए एकजुट होकर कौम को आगे ले जाने की दिशा में कार्य करे, वरना वह दिन दूर नहीं जब युवा वर्ग पूरी तरह से सिखी से टूट जाएगा।
12वें दि सिख अवार्ड
दिल्ली में 12वें सिख अवार्ड का आयोजन हुआ जिसमें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन इकबाल सिंह लालपुरा को बेहतर एजुकेशनिस्ट का अवार्ड दिया गया जिनके द्वारा कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। वहीं देश के प्रधानमंत्री को सिख समुदाय के प्रति किये जा रहे कार्यों के लिए स्पैशल रिकोमैनडेशन सिख का अवार्ड देकर सम्मानिन्त किया गया। सिख समाज का पर्यावरण के क्षेत्र में अहम योगदान है क्योंकि सिख गुरुओं ने भी पवन गुरु पानी पिता की बात करते हुए पर्यावरण को बचाने का सन्देश सिखां को दिया। इसी के चलते इको सिख नामक संस्था के द्वारा लाखों पेड़ अभी तक लगाए जा चुके हैं। पंजाब की धरती पर गुरु ग्रन्थ साहिब बाग स्थापित किया गया है। कई जंगलों को हरभरा किया जा रहा है। संस्था के मुखी राजवंत सिंह को सिख चैरिटी अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसी तरह से सिख सेवा अवार्ड राजिन्दर सिंह राजू चड्डा को दिया गया जिनका गुरुघरों की सेवाओं में बढ़चढ़कर सहयोग रहता है। गुरुद्वारा बंगला साहिब सौंदर्यीकरण के कार्यों से लेकर तख्त पटना साहिब में बनी आटोमैटिक किचन में भी उनका योगदान है। सिख व्यवसायी का अवार्ड सरबजोत सिंह को दिया गया जिन्होंने कनाडा की धरती पर जाकर इतनी कम उम्र में उंचाईयों को छुआ है। दि सिख अवार्ड का आयोजन नवदीप सिंह बांसल और उनकी टीम के द्वारा किया गया जो इससे पहले भी संसार के कई देशों में इस अवार्ड कार्यक्रम को कर चुके हैं और भारत मे यह आयोजन दूसरी बार किया गया।

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