इतना क्यों बिलबिला रहे हैं बिलावल !

Summary :

भारत ने पिछले सप्ताह जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चिनाब नदी पर बने बगलीहार बांध के तीन गेट खोलकर पानी पाकिस्तान की ओर छोड़ा तो पाकिस्तान बौखला गया। अभी तक तो पानी नहीं छोड़ने पर खफा था और अब उसकी सेना से लेकर उसके नेता तक खौफनाक धमकी के मूड में आ गए हैं। सबसे ज्यादा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो बिलबिला रहे हैं जो सीधे-सीधे जंग की भाषा बोल रहे हैं, वो भूल गए 1971 जब 93 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत की सेना के सामने सरेंडर किया था। पानी के लिए तीसरे विश्व युद्ध…

भारत ने पिछले सप्ताह जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में चिनाब नदी पर बने बगलीहार बांध के तीन गेट खोलकर पानी पाकिस्तान की ओर छोड़ा तो पाकिस्तान बौखला गया। अभी तक तो पानी नहीं छोड़ने पर खफा था और अब उसकी सेना से लेकर उसके नेता तक खौफनाक धमकी के मूड में आ गए हैं। सबसे ज्यादा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो बिलबिला रहे हैं जो सीधे-सीधे जंग की भाषा बोल रहे हैं, वो भूल गए 1971 जब 93 हजार से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों ने भारत की सेना के सामने सरेंडर किया था।
पानी के लिए तीसरे विश्व युद्ध के मुहावरे का उपयोग काफी समय से होता रहा है लेकिन पाकिस्तानी तो सचमुच युद्ध की बात करने लगे हैं। मामला यह है कि भारत की ओर से पाकिस्तान की ओर जाने वाली नदियों के पानी को लेकर दोनों देशों में 1960 से ही एक संधि रही है। इसके तहत रावी, सतलुज और ब्यास नदी के पानी पर पूरा हक भारत का है, जबकि झेलम, सिंधु और चिनाब नदी का पानी पाकिस्तान को मिलता है। यदि इन नदियों में पानी ज्यादा आ जाए तो भारत बाढ़ की पूर्व सूचना पाकिस्तान को देता था, मगर पिछले साल पहलगाम की आतंकी घटना के बाद भारत ने स्पष्ट कर दिया कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता। भारत ने जल संधि को निलंबित कर दिया, अब भारत इस बात के लिए बाध्य नहीं है कि नदियों में पानी को लेकर किसी भी तरह की जानकारी पाकिस्तान के साथ साझा करे। इसलिए बगलीहार बांध का पानी छोड़ने से पहले सूचना नहीं दी गई।
पाकिस्तान की करीब 90 प्रतिशत खेती सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है, उसके पास इतने डैम नहीं हैं कि वह नदी के पानी को जरूरत के वक्त उपयोग के लिए संभाल कर रख सके, इसलिए गर्मी के दौरान उसे बहुत परेशानी हुई। वह दुनियाभर में गिड़गिड़ा रहा है, संयुक्त राष्ट्र को पत्र लिख रहा है। मगर भारत अडिग है कि आतंकवाद समाप्त करो, तभी बातचीत होगी। तो अब वह भारत को धमकाने की कोशिश कर रहा है, सिंधु जल समझौता भारत की ओर से निलंबित किए जाने के बाद पिछले साल पाकिस्तान की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल की बैठक हुई थी जिसमें कहा गया था कि पानी रोकने या पानी का रास्ता बदलने की कोशिश को युद्ध की कार्रवाई माना जाएगा। अब फिर जनरल आसिम मुनीर की अध्यक्षता में सेना की कोर कमांडर्स कॉन्फ्रेंस में कहा गया कि पाकिस्तानी सेना हक के लिए लड़ेगी।
पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार ने भी कहा था कि पानी रोकने की कोशिश को युद्ध जैसी कार्रवाई माना जाएगा। यानी सबकी भाषा जंग की ही है। मगर बिलावल भुट्टो आगे निकल गए, उन्होंने गिलगित की जनसभा में कहा कि भारत सिंधु नदी को हथियार के तौर पर पाकिस्तान के खिलाफ इस्तेमाल करना चाहता है। यदि जंग लड़नी पड़े तो जंग लड़ने को तैयार हैं। बिलावल की इस बात पर मुझे हंसी आ रही है, यदि तुम्हारे नाना और तुम्हारी मां जिंदा होती तो तुम्हें समझाते कि पाकिस्तान के पास जंग की औकात नहीं है। मि. भुट्टो, हम बड़े दिल वाले लोग हैं मगर हम किसी की हेकड़ी भी बर्दाश्त नहीं करते, तुम्हारा देश आतंकवाद को जिस दिन पालना-पोसना बंद कर देगा, भारत उसी दिन उसे माफ कर देगा।
सोने की तरह चमकते हैं गटर के ढक्कन…!
बुडापेस्ट में सड़क पर घूमते हुए मुझे सोने जैसे चमचमाते हुए गटर के ढक्कन दिखाई दे रहे थे। निश्चय ही वो पीतल के थे लेकिन मेरे मन में सवाल आया कि सैकड़ों लोग इन पर से रोज गुजरते हैं फिर भी चमचमा कैसे रहे हैं? पूछा तो पता चला कि वहां हर सप्ताह ढक्कनों की सफाई होती है। पॉल्यूशन है नहीं ! इसलिए चमचमा रहे हैं, किसी जमाने में हमारे यहां भी गटर के ढक्कन चमचमाते थे लेकिन अब हमारे यहां गटर के ढक्कन आयरन कास्ट के होते हैं और उन्हें चुराने-बेचने वालों की पूरी गैंग होती है। हमारे चोर इतने प्रतिभावान हैं कि जिन तारों में बिजली प्रवाहित हो रही होती है, उसे भी काट ले जाते हैं।
क्यों होता है ऐसा? क्यों हमारे नवनिर्मित टनल से पानी प्रवाहित होने लगता है? हमारी सड़कें क्यों एक बरसात भी नहीं झेल पाती हैं? पुल क्यों टूट जाते हैं? मैं महसूस कर रहा था कि जिस सड़क पर मैं बुडापेस्ट की ओर सफर कर रहा था, वहां पेट का पानी भी नहीं हिल रहा है, तो फिर मुझे इंदौर-यवतमाल की सड़क और समृद्धि महामार्ग का ख्याल आ गया जहां कार हिचकोले खाती है। मुझे याद आया कि जब मैं राज्यसभा में था तो सांसद निधि से कार्यों के लिए पैसा आवंटित करता था मगर गुणवत्ता को लेकर हमेशा ही असहज रहता था। क्वालिटी कंट्रोल को लिखता तो जांच के नाटक के बाद जवाब एक ही होता था…सब ठीक ठाक है। यह ठीक ठाक वाला नजरिया ही तो समस्या की जड़ है।
भयावह अपराध की सजा खौफनाक होनी चाहिए…!
मैं आमतौर पर गुस्सा नहीं होता मगर श्रीगंगानगर में 13 साल की बच्ची के साथ हुई दरिंदगी ने मेरा खून खौला दिया है। समझ में नहीं आता कि ये हैवानियत आती कहां से है? चार साल, छह साल और तेरह साल की मासूम के साथ दरिंदगी की सजा भी वैसी ही होनी चाहिए कि अपराधी उस पीड़ा को भोग पाएं। इन्हें फांसी देने की मांग उठती है लेकिन मैं तो कहता हूं कि इन्हें तड़पा-तड़पा कर मारा जाना चाहिए। मेरी बात कुछ लोगों को अमानवीय लग सकती है लेकिन जब तक खौफनाक सजा का भय नहीं होगा तब तक ये नरपिशाच मानेंगे नहीं।

विजय दर्डा