क्या नीतीश डिप्टी पीएम बनेंगे?

Summary :

‘वक्त-वक्त की बात है कभी तुझे, तो कभी मुझे, इस इम्तहान से गुजरना होगा तू पत्थर है, तो मैं आइना हूं, तेरे लिए न सही, मुझे अपने लिए तो संवरना होगा’ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही भाजपा के दबाव में बिहार से राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया हो, पर उनका मन अब भी बिहार में ही रमा हुआ है, वे यहां से जाना नहीं चाहते। नीतीश समर्थकों का भी कमोबेश यही रुख है कि ‘अगर बिहार की जनता ने उन्हें 2030 तक के लिए अपना ’मैडेंट’ दिया है तो फिर वे बिहार छोड़ कर…

‘वक्त-वक्त की बात है कभी तुझे, तो कभी मुझे, इस इम्तहान से
गुजरना होगा
तू पत्थर है, तो मैं आइना हूं, तेरे लिए न सही, मुझे अपने लिए तो
संवरना होगा’
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भले ही भाजपा के दबाव में बिहार से राज्यसभा के लिए अपना नामांकन दाखिल कर दिया हो, पर उनका मन अब भी बिहार में ही रमा हुआ है, वे यहां से जाना नहीं चाहते। नीतीश समर्थकों का भी कमोबेश यही रुख है कि ‘अगर बिहार की जनता ने उन्हें 2030 तक के लिए अपना ’मैडेंट’ दिया है तो फिर वे बिहार छोड़ कर क्यों जाए?’ माना जाता है कि इससे पहले भी उन्हें भाजपा की ओर से उपराष्ट्रपति पद का ऑफर आया था, पर नीतीश ने इसके लिए मना कर दिया था। वे लगभग 20 वर्षों से बिहार के मुख्यमंत्री पद पर काबिज हैं, उनकी पार्टी के 85 विधायक और 12 लोकसभा सांसद हैं, फिर वे 37 वर्शों बाद बिहार छोड़कर दिल्ली क्यों जाएं? यह भी माना जा रहा है कि 5 मार्च को यूं अचानक उनका राज्यसभा के लिए पर्चा भरना एक दबाव में लिया गया फैसला था, क्योंकि उसी रोज वे अपने पुत्र निशांत को सक्रिय राजनीति में लाने की एक बड़ी घोषणा करने वाले थे। सूत्रों का यह भी दावा है कि नीतीश की जान अपने जिस पुत्र तोते में अटकी है। सूत्र यह भी इशारा कर रहे हैं कि रह-रह कर नीतीश का विरोध आकार ले रहा है। सो, अब दिल्ली ने भी दबाव की राजनीति छोड़ कर नीतीश के समक्ष एक बड़ा प्रस्ताव रखा है। सूत्रों की मानें तो दिल्ली ने नीतीश को डिप्टी पीएम बनाने का प्रस्ताव दिया है अगर वे बिहार छोड़कर दिल्ली जाने को राजी हो जाते हैं। भाजपा की नज़र बिहार में नीतीश की परंपरागत वोट बैंक पर जमी है, जिसमें महिला वोटर, गैर यादव ओबीसी और लगभग 36 फीसदी ईबीसी आबादी शामिल है। अब भाजपा अपना मुख्यमंत्री बना इस वोट बैंक को साधने का काम कर सकती है, पर एक संभावना यह भी है कि अगर नीतीश बिहार छोड़कर दिल्ली जाते हैं तो उनका ये वोट बैंक टूट कर-छिटक कर अन्य पार्टियों का रुख कर लें, सो भाजपा की योजना नीतीश के बेटे निशांत के लिए एक बिहार यात्रा निकालने की है जिससे उनके पिता के कैडर वोट पुत्र के पाले में आ सके। वहीं नीतीश के करीबी नौकरशाह मनीष वर्मा नीतीश से यही कहते रहे कि वे अपनी जगह अपने पुत्र निशांत को राज्यसभा में भेज दें, पर बदली परिस्थितियों में नीतीश का राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुना जाना लगभग तय हो गया है।
क्या आरिफ को अपनी रुखसती का पहले से पता था?
बिहार के पूर्व गवर्नर आरिफ मोहम्मद खान की यूं अचानक उनकी विदाई की इबारत लिख दी गई या अपनी रुखसती का उन्हें पहले से इल्म था। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो आरिफ को कोई पखवाड़े पूर्व इस बात का अहसास हो गया था कि ’उनकी गवर्नरी छिनी जा सकती है’, कहते हैं इसके बाद ही दक्षिण दिल्ली के एक अति संभ्रांत इलाके में अवस्थित उनके बंगले की रंगाई-पुताई शुरू हो गई, जब कुछ पत्रकारों को इस बात की भनक मिली तो आरिफ के नजदीकियों की ओर से उन्हें बताया गया कि ‘दरअसल महामहिम (आरिफ) के लिए एक निजी लाईब्रेरी बनाने पर काम चल रहा है’, महामहिम से जुड़े सूत्रों ने इन अटकलों पर विराम लगाते हुए कहा कि ‘फिलहाल उनका (आरिफ) दिल्ली वापस लौटने का कोई इरादा नहीं है।’ फिर ऐसा क्या हुआ कि एक दिन अचानक बिना किसी नियोजित प्रोग्राम के आरिफ एक अनजान जगह के लिए छुट्टियों पर निकल जाते हैं। आरिफ को यह आश्वासन प्राप्त था कि बिहार के बाद उन्हें वेस्ट बंगाल भेजा जा सकता है, सो आरिफ के मन के किसी कोने में कतई इस संशय ने सिर नहीं उठाया होगा कि उन्हें एक झटके में यूं पैदल किया जा सकता है। जानकार बताते हैं कि इस बार बिहार में ‘ऑपरेशन लोट्स’ की पूरी तैयारी थी, वहीं आरिफ अपने मूल में सियासत में पगे एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिनको सियासी संतुलन साधने में महारथ हासिल थी। बिहार में भी उनकी लालू और नीतीश दोनों से बराबर की मित्रता थी, सो भाजपा को यह अंदेशा था कि अगर नीतीश को हटाने पर ज्यादा बवाल मचा तो बिहार में संक्रमण काल की उस राजनीतिक दौर में आरिफ पत्थर पर फूल खिलाने का काम कर सकते हैं, यानी वे लालू व नीतीश के बीच एक संवाद सेतु का कार्य कर सकते हैं, वैसे भी नीतीश को पलटने में सिद्दहस्ता हासिल है सो वे भाजपा के मारे एक बार फिर लालटेन की रौशनी में अपने सियासी भविष्य का ’रोड-मैप’ तलाश सकते हैं।
वहीं अगर बदले घटनाक्रम में जदयू में बड़ी टूट हो गई तो आरिफ भाजपा के लाभार्थी बनने की राह में खड़े नज़र आ सकते हैं, वहीं दूसरी ओर बिहार के नवनियुक्त गवर्नर सैय्यद अता हुसैन जो कि एक फौजी बैक ग्राऊंड के हैं उनका ज्यादा यकीन ’रूलबुक’ के हिसाब से चलने में हो सकता है, यही बात भाजपा के ज्यादा मुफीद है।
वहीं इस मामले में आरिफ का नज़रिया कहीं ज्यादा स्वतंत्र और राजनीति अवलंबित हो सकता था, यह एक बड़ी वज़ह थी जिसने आरिफ की रुखसती की इबारत लिख दी।
संधू को कम मत आंकिए बंधु
कोई चार वर्षों तक दिल्ली में उप राज्यपाली का जिम्मा संभाल रहे विनय सक्सेना को जिस जल्दबाजी में लद्दाख भेजा गया, राजनीतिक पर्यवेक्षक अब भी इसका सही कारण तलाशने में जुटे हैं, नहीं तो दिल्ली में भाजपा सरकार की वापसी का रोड मैप बनाने के लिए सक्सेना साहब ने क्या नहीं किया, भाजपा को दिल्ली में पुनर्स्थापित करने और जमी-जमाई आप सरकार को यहां से रुखसत करने में कोई भी उनकी भूमिका को कम करके नहीं आंक सकता। खैर, चलिए बात करते हैं दिल्ली में सक्सेना साहब की जगह लेने वाले पूर्व भारतीय राजनयिक तरणजीत सिंह संधू की। जिन्हें संघ और भाजपा दोनों का ही बेहद लाडला माना जाता है। वे 2024 का लोकसभा चुनाव इस दफे भाजपा के टिकट पर अमृतसर से लड़े थे, पर जीत दर्ज करा पाने में नाकामयाब रहे। अमेरिका में भारतीय राजदूत रहे संधू साहब का दिल्ली में लेफ्टिनेंट गवर्नरी हासिल करना किसी चमत्कार से कम नहीं। समझा जाता है कि उनके लिए इस दफे सबसे बड़ी लॉबिंग शिरोमणि अकाली दल के सर्वेसर्वा सुखबीर सिंह बादल ने की। यह भी कहा जाता है कि इस दफे अकाली दल व भाजपा को चुनावी गठबंधन के लिए तैयार करवाने में संधू की एक महती भूमिका रही। समझा जाता है कि संधू साहब की अब भी मौजूदा अमेरिकी प्रशासन से गहरे तार जुड़े हैं। सो, उनकी असली अग्नि परीक्षा भारत-अमेरिका के रिश्तों के उलझे पेंचोखम को सुलझाने की है, उनसे दिल्ली ने इस बारे में पहले से ही कहीं ज्यादा उम्मीदें पाली हुई हैं।
…और अंत में
केन्द्रीय मंत्री अमित शाह शनिवार को उत्तराखंड के दौरे पर थे, जहां उन्हें 1100 करोड़ से अधिक लागत की विभिन्न परियोजनाओं का लोकार्पण एवं शिलान्यास करना था। सूत्रों की मानें तो उत्तराखंड यात्रा का असली मकसद वहां भाजपा के विभिन्न गुटों में एका कराना और उन्हें आगामी चुनाव के लिए तैयार करना है। समझा जाता है कि भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को अभयदान मिल गया है और यह भी एक तरह से तय कर दिया गया है कि प्रदेश में धामी विरोध की अलख चाहे जितनी भी सुलग रही हो पर वहां सीएम बदला नहीं जाएगा, यानी भाजपा धामी के नेतृत्व में ही एक बार फिर से आने वाले उत्तराखंड चुनाव की तैयारियों में जुट गई है।

त्रिदीब रमण