क्या शक्तिकांत बनेंगेे वित्त मंत्री?

Summary :

कोई इबारत अगर नई लिखनी है तो इन उंगुलियों को खून में डुबोना ही होगा मेरी इक आहट पर तुझे भी एक दिन यह सब छोड़-छाड़ कर जाना ही होगा।। मोदी सरकार 3-0 ने अपने कार्यकाल के रिकार्ड 2 वर्ष पूरे कर लिए हैं, अब एक बार फिर से कयासों के बाजार गर्म हैं कि आने वाले कुछ दिनों में या संसद के मानसून सत्र के आसपास मोदी मंत्रिमंडल को किंचित नया चेहरा-मोहरा मिल सकता है। सियासी नेपथ्य की आहटों पर अगर कान धरा जाए तो मंत्रिमंडल में दो बड़े बदलावों की सुगबुगाहट है, एक तो रिजर्व बैंक के पूर्व…

कोई इबारत अगर नई लिखनी है तो इन उंगुलियों को खून में डुबोना ही होगा
मेरी इक आहट पर तुझे भी एक दिन यह सब छोड़-छाड़ कर जाना ही होगा।।

मोदी सरकार 3-0 ने अपने कार्यकाल के रिकार्ड 2 वर्ष पूरे कर लिए हैं, अब एक बार फिर से कयासों के बाजार गर्म हैं कि आने वाले कुछ दिनों में या संसद के मानसून सत्र के आसपास मोदी मंत्रिमंडल को किंचित नया चेहरा-मोहरा मिल सकता है। सियासी नेपथ्य की आहटों पर अगर कान धरा जाए तो मंत्रिमंडल में दो बड़े बदलावों की सुगबुगाहट है, एक तो रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर शक्तिकांत दास का नाम बतौर अगला वित्त मंत्री चल रहा है। मौजूदा वित्त मंत्री को बदलने के पीछे यह सोच हो सकती है कि आज देश की मौजूदा आर्थिक नीति को कई नई चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है, मिडिल ईस्ट संकट, बढ़ती महंगाई जैसे मुद्दों से आने वाले सात राज्यों के चुनाव प्रभावित हो सकते हैं, चुनांचे सरकार को दिखावे के लिए ही सही अपने आर्थिक बदलाव का चेहरा-मोहरा बदलने की जरूरत है।
सूत्र यह भी बताते हैं कि फिलहाल शक्तिकांत दास अपनी इस नई भूमिका के लिए उत्साह नहीं दिखा रहे हैं पर माना जाता है कि उन्हें मनाने की तैयारी भी चल रही है। इसके अलावा देश के मानव संसाधन मंत्री धर्मेंद्र प्रधान यूजीसी, नीट पेपर लीक और सीबीएसई परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी के चलते विपक्ष और युवा पीढ़ी खास कर ‘ज़ेनज़ी’ के निशाने पर हैं, तो मुमकिन है कि उन्हें सरकार से हटा कर पार्टी संगठन में कोई महती भूमिका दी जाए। इस पद पर विनोद तावड़े के नाम को लेकर चर्चा जोरों पर है, जो फिलहाल भाजपा महासचिव के तौर पर पार्टी को अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके अलावा भी कई और मंत्रियों की उनके रिपोर्ट कार्ड के आधार पर छुट्टी हो सकती है।
कई मंत्री पहले ही अपनी कुर्सी से बेदखल किए जा चुके हैं, जैसे रवनीत सिंह बिट्टू जो पंजाब से हैं, तथा केरल से आने वाले जार्ज कूरियन, इन्हें पार्टी ने इस दफे राज्यसभा नहीं दी है, सो इन दोनों की मोदी मंत्रिमंडल से छुट्टी तय मानी जा रही है। बिट्टू को भाजपा ने पंजाब से विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी करने को कहा है। वहीं मोदी सरकार के दो राज्य मंत्रियों पंकज चौधरी को यूपी की और हर्ष मल्होत्रा को दिल्ली प्रदेश भाजपा की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पर इतना तो तय है कि मोदी मंत्रिमंडल के अगले फेरबदल में आने वाले सात राज्यों के चुनावों के गणित व उनके सियासी समीकरणों पर भी नज़र रखी जाएगी और इन चुनावी राज्यों से ज्यादा सांसदों को मंत्री बनने का मौका मिल सकता है।
क्या तय समय से पहले होंगे यूपी-पंजाब के चुनाव
बंगाल में क्लीन स्वीप करने और ममता की पार्टी का सूपड़ा साफ करने के बाद अब भाजपा के हौसले बम-बम हैं। पार्टी नेताओं के एक वर्ग की राय है कि कम से कम यूपी व पंजाब के विधानसभा चुनाव समय से पूर्व करा लिए जाएं। इसके लिए पार्टी नेताओं का यही वर्ग इसी साल का नवंबर माह सुझा रहा है, जबकि कायदे से यूपी के 403 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव फरवरी-मार्च 2027 में होने हैं। पंजाब के भी सभी 117 विधानसभा सीटों पर फरवरी 2027 में ही चुनाव होने हैं। इस वक्त यूपी में पंचायत चुनावों की तैयारियां जोरों पर हैं। ग्राम प्रधानों का कार्यकाल भी पिछले माह 26 मई को खत्म हो चुका है, उनकी जगह प्रशासकों की नियुक्ति की गई है।
रही बात वोटर लिस्ट की तो गहन पुनरीक्षण में 2.0 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं। भाजपा ने अपने प्रदेश संगठन को पहले ही चुनाव के लिए कमर कसने को कह दिया है, प्रदेश के नए अध्यक्ष पंकज चौधरी की नियुक्ति भी इसी बात को ध्यान में रख कर की गई है, पर्दे के पीछे से सुनील बंसल भी यहां पहले से ही सक्रिय हो चुके हैं। अखिलेश अगस्त माह से अपना राजव्यापी रथ यात्रा निकालने की तैयारी में है। सो, भाजपा का इरादा समय पूर्व चुनाव करा अखिलेश की रथयात्रा को पंचर करने का है। जैसा कि भाजपा के एक बड़े नेता ऑफ द् रिकार्ड बताते हैं कि ‘इस वक्त भाजपा का मोरल ग्राउंड इतना हाई है कि यूपी की छोटी-मोटी रिजनल पार्टियां अभी हम से मोलभाव की स्थिति में नहीं हैं, हम उन्हें जितनी भी और जहां की सीटें देंगे, वे मान जाएंगे।’
सूत्रों की मानें तो अभी केजरीवाल ने भी अपने एक कोर ग्रुप की बैठक में अपने चुनावी रणनीतिकारों से कहा कि पंजाब में समय से पूर्व यानी नवंबर में ही चुनाव हो सकते हैं, इसके लिए उन्होंने अपनी पार्टी से अभी से तैयार रहने को कहा है। वहीं भाजपा के केंद्रीय नेताओं का एक वर्ग ऐसा भी है जो यूपी-पंजाब में समय पूर्व चुनाव के पक्ष में नहीं हैं, इनकी दलील है कि अभी देश का माहौल भाजपा के इतने उपयुक्त नहीं, युवा वर्ग जहां बेरोजगारी की मार झेल रहा है, आर्थिक अशांति से महंगाई बेलगाम बढ़ रही है, इससे मोटे तौर पर जनता खुश नहीं है। सो, नवंबर का चुनाव भाजपा को भारी भी पड़ सकता है। वहीं अगर चुनाव फरवरी-मार्च में होते हैं तब तक रबी की नई फसल कट चुकी होगी, खास कर किसानों की जेब में कुछ पैसा होगा और तब वे थोड़े खुश भी होंगे और आर्थिक अस्थिरता के मौजूदा मुद्दे भी तब तक शांत हो चुके होंगे। सूत्रों का कहना है कि समय पूर्व चुनाव की आहटों को टटोलने के लिए भाजपा यूपी-पंजाब में अभी एक गुप्त जनमत सर्वेक्षण करवाने जा रही है, जनता जनार्दन की राय को सर्वोपरि रखते ही भाजपा हाईकमान किसी निर्णय पर पहुंच सकता है।
जयंत को क्यों सस्ते में निपटाना चाहती है भाजपा
चौधरी चरण सिंह की विरासत से अपना राजनैतिक स्वांग रचने वाले जयंत चौधरी संतोषी स्वभाव के नेताओं में गिने जाते हैं। जब से वे भगवा आंगन में हिलौरे मार रहे हैं उनकी मोल-भाव की प्रवृत्ति पर भी एक तरह से अंकुश लग गया है। मोदी सरकार में भले ही वे स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री हों पर उनके मंत्रालय के पास अब भी हर वक्त फंड का रोना मचा रहता है। इस दफे के 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जयंत को मात्र दो सीट देकर ही निपटा दिया था। अभी पिछले दिनों जयंत यूपी के आने वाले चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर पीयूष गोयल से मिलने पहुंचे थे, फिर पीयूष गोयल ने उनकी मुलाकात भाजपा के एक बड़े नेता से तय करवा दी। सनद रहे कि जयंत और भाजपा के बीच के संपर्क सूत्र पीयूष गोयल ही हैं। कहते हैं जब जयंत बड़े नेता के पास पहुंचे तो उन्हें भाजपा के इस कद्दावर नेता ने समझाया कि चूंकि आपको लोकसभा की सिर्फ दो सीटें दी गई थीं, इस नाते आपका दावा मात्र 10 सीटों का ही बनता है। पर हम आपको 15-17 सीटें दे सकते हैं। वहीं जयंत की मांग 30 सीटों की है। जब 2022 का विधानसभा चुनाव वे अखिलेश की सपा के साथ गठबंधन में लड़े थे, तब अखिलेश ने उन्हें 33 सीटें दी थी, जिसमें जयंत के उम्मीदवार मात्र 8 सीटों पर ही विजयी रहे थे।
कहते हैं भाजपा के इस बड़े नेता ने जयंत को समझाया कि ‘इस बार यूपी में एनडीए के लिए एक-एक सीट महत्वपूर्ण है, सो हम सिर्फ जीत सकने वाले उम्मीदवारों पर ही दांव लगाना चाहेंगे।’ इसके साथ ही जयंत को यह भी स्पष्ट कर दिया गया कि उनके कोटे में आबंटित सीटों में कम से कम तीन सीट मुस्लिम बहुल इलाके की होंगी, और उनके कोटे की कुछ सीटों पर भाजपा ‘निशान तुम्हारा, उम्मीदवार हमारा’ की रणनीति पर अपने जीत सकने वाले उम्मीदवार उतारेगी। कहते हैं जयंत इस प्रस्ताव से पूरी तरह सहमति तो नहीं रखते पर उनके पास करने के लिए कुछ खास बचा भी नहीं। कहते हैं मीटिंग से लौट कर जयंत जब पीयूष गोयल के पास आए तो गोयल ने उन्हें समझाना चाहा कि भाजपा उनके हितों का पूरा ध्यान रखेगी। उनकी कोशिश रहेगी केंद्रीय मंत्रिमंडल के अगले फेरबदल में उन्हें इससे बेहतर मंत्रालय मिल सके। जयंत भगवा भरोसे के समक्ष नतमस्तक होकर फिलहाल अपने अच्छे समय के इंतजार में हैं।
क्या मनप्रीत बादल की घर वापसी होगी?
शिरोमणि अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल के चचेरे भाई और पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल अपनी घर वापसी के लिए बेकरार हैं। वहीं कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से भी उनको इशारा मिला है कि अगर वे कांग्रेस में वापिस लौटना चाहते हैं तो उनका स्वागत है। सनद रहे कि मनप्रीत पहले अकाली दल से कांग्रेस में गए थे, फिर 2022 में उन्होंने कांग्रेस को भी अलविदा कह भाजपा का दामन थाम लिया था। दरअसल, मनप्रीत भाजपा में कुछ बड़ा मिलने की चाह के साथ आए थे, पर यहां उन्हें निराशा ही हाथ लगी।
भाजपा ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे पंजाब के निकाय चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन को बेहतर करें, पर जब इन चुनावों के नतीजे आए तो भाजपा, आप, कांग्रेस, अकाली दल, निर्दलीय के बाद पांचवें स्थान पर खिसक गई। चुनांचे इन दिनों भाजपा में इन्हें कुछ खास भाव नहीं मिल रहा तो मनप्रीत पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले एकबारगी पुनः अपनी निष्ठा बदलने के लिए प्रयासरत हो गए हैं। इसके लिए वे कांग्रेस व अकाली दल दोनों के द्वार खटखटा रहे हैं।
…और अंत में
4 जून को राहुल गांधी दीपक कुमार उर्फ मुहम्मद दीपक से मिलने कोटद्वार जाना चाहते थे और वहां जाकर दीपक के जिम की सदस्यता भी लेना चाहते थे, पर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था खराब मौसम के चलते राहुल कोटद्वार ही नहीं पहुंच पाए। इस बात पर उत्तराखंड कांग्रेस की पूरी यूनिट ने चैन की सांस ली है। दरअसल, 26 जनवरी को कोटद्वार में हुए एक विवाद के दौरान वहां जिम का संचालन करने वाले दीपक कुमार ने एक बुजुर्ग मुस्लिम दुकानदार का पक्ष लेते हुए अपना नाम मोहम्मद दीपक बताया था, बाद में इस मामले को एक सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश हुई और सत्ता पक्ष को इसमें शामिल बताया गया। पर फिर भी उत्तराखंड कांग्रेस के नेता चाहते थे कि राहुल इस विवाद में न पड़े क्योंकि उत्तराखंड आज भी जाहिर तौर पर एक हिंदू मानसिकता वाला ही राज्य है और चुनावों में राहुल के इस कदम को भाजपा एक बड़ा मुद्दा बना सकती थी। वैसे भी यूपी के बिजनौर, मुरादाबाद व मेरठ जैसे जिले कोटद्वार से लगे हुए हैं, जहां मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है, सो हो सकता है कि राहुल के इस कदम का यूपी चुनावों पर एक सकारात्मक प्रभाव पड़ जाता।

त्रिदीब रमण