असली तृणमूल का सवाल

Summary :

प. बंगाल के विधानसभा चुनावों में पूर्व मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के बुरी तरह हारने के बाद जिस तरह उनकी पार्टी तिनके-तिनके होकर बिखर रही है वह स्वतन्त्र भारत के राजनीतिक इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। बेशक ममता दीदी ने ही 1998 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी को तिनका-तिनका जोड़ कर और सड़कों पर संघर्ष करते हुए खड़ा किया था परन्तु 2020 के आते-आते जिस तरह उन्होंने अपने राजनीतिक उत्तराधिकार का चयन वंशवाद व परिवार वाद की छाया के तहत किया उससे उनके द्वारा सड़कों पर किये गये संघर्ष पर पानी फिरता गया और…

प. बंगाल के विधानसभा चुनावों में पूर्व मुख्यमन्त्री सुश्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के बुरी तरह हारने के बाद जिस तरह उनकी पार्टी तिनके-तिनके होकर बिखर रही है वह स्वतन्त्र भारत के राजनीतिक इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। बेशक ममता दीदी ने ही 1998 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी को तिनका-तिनका जोड़ कर और सड़कों पर संघर्ष करते हुए खड़ा किया था परन्तु 2020 के आते-आते जिस तरह उन्होंने अपने राजनीतिक उत्तराधिकार का चयन वंशवाद व परिवार वाद की छाया के तहत किया उससे उनके द्वारा सड़कों पर किये गये संघर्ष पर पानी फिरता गया और उनके चारों तरफ एेसे राजनीतिक लोगों की भीड़ बढ़ती रही जो उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली और हुक्मबरदारी के भीतरखाने विद्रोह की ज्वाला पाल रहे थे। ममता दी ने पूरी पार्टी की लोकतान्त्रिक गतिविधियों को अभिषेक बनर्जी की मनमानी के आगे जिस तरह गिरवी रखा उसी का परिणाम है कि चुनावी हार के बाद कल तक उनके वफादार कहे जाने वाले लोग अब बागी हो गये हैं और स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि इस बागी गुट के लोग अब खुद को ही असली तृणमूल कांग्रेस पार्टी बता रहे हैं।
तृणमूल कांग्रेस ने प. बंगाल में वामपंथी दलों के 34 वर्ष के लम्बे शासनकाल को जब उखाड़ कर फेंका तो उसके पीछे ममता दीदी का वह लम्बा संघर्ष था जो उन्होंने 1998 से पहले अपनी मूल पार्टी कांग्रेस में रहते हुए भी किया था। अतः जैसे जैसे ममता दी बंगाल में मजबूत होती गईं वैसे-वैसे ही कांग्रेस पार्टी और कमजोर होती गई और इसके नेताओं के लिए भी उनकी पार्टी शरण स्थल बनती चली गई लेकिन ममता दी जब 2011 में पहली बार सत्तारूढ़ हुईं तो वह कांग्रेस के सहयोग से ही हुई थीं। अतः जाहिर था कि उनके संघर्ष के पीछे कांग्रेस की विचारधारा कहीं न कहीं काम कर रही थी। मगर उनके शासनकाल में वामपंथी शासन पद्धति का वह जमीनी तन्त्र ध्वस्त नहीं हो पाया जिससे त्रस्त होकर बंगाल की जनता ने 2011 में वामपंथियों के शासन को अलविदा कहा था। अतः बंगाल में वामपंथी शासन तन्त्र की जमीन पर फैली हुई जुल्म व जबर्दस्ती करने वाली प्रणाली ने तृणमूल का आवरण ओढ़ लिया और उनका काम पहले के तरीके के समान ही चलता रहा। हालांकि इसके बाद भी ममता दी की पार्टी ने 2016 व 2021 के विधानसभा चुनाव जीते मगर इसी वर्ष से ममता दी ने अपनी राजनीतिक विरासत अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को परिवर्तित करनी शुरू की जिससे उनके वफादार लोगों में भीतर ही भीतर रोष उत्पन्न होता रहा जो चुनाव हारते ही फूट पड़ा।
दरअसल क्षेत्रीय दल जिस तरह एक नेता को जनता का हीरो बनाकर उसकी व्यक्ति पूजा में संलग्न होकर पूरी राजनीतिक पार्टी को ही खानदानी दुकान में बदल देते हैं उसमें निष्ठावान पार्टी कार्यकर्ताओं व नेताओं के लिए कोई जगह नहीं बचती है और जनता की सेवा के नाम पर वे अपने परिवार के लोगों की सेवा ही करते रहते हैं। अतः आज जो कुछ प. बंगाल की राजनीति में हो रहा है उसके चलते अभिषेक बनर्जी ही सबके कोपभाजन का शिकार हो रहे हैं। अपने आप में इसे अजूबा ही कहा जायेगा कि विगत 4 मई को विधानसभा चुनाव हारने के बाद तृणमूल कांग्रेस के चुने हुए 80 विधायकों में से 60 विधायकों ने अपना अलग गुट बना लिया और विधानसभा अध्यक्ष से उन्हें अलग मान्यता देने की मांग की और विपक्ष के नेता पद पर भी अपना दावा ठोका। अध्यक्ष ने उनकी इस मांग को स्वीकार कर लिया है क्योंकि दल-बदल विरोधी कानून कहता है कि यदि किसी दल के दो-तिहाई विधायक या सांसद टूट कर सम्बन्धित सदनों में अपना अलग गुट बनाते हैं और अपनी मूल पार्टी से खुद को असम्बद्ध घोषित करते हैं तो उन्हें एेसा करने का अधिकार है। हमने पूर्व में देखा है कि किस प्रकार महाराष्ट्र में शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस के दो भाग हुए और अन्त में चुनाव आयोग ने टूट कर अलग हुए गुटों को ही असली पार्टी माना। हालांकि इस सन्दर्भ में यह भी नियम है कि टूट कर अलग हुए गुट को किसी दूसरी पार्टी में विलयित भी हो जाना चाहिए। परन्तु इस बारे में मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में लम्बित है और अन्तिम निर्णय अभी तक नहीं आया है।
अतः ममता दी की पार्टी में राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह लोकसभा में उनकी पार्टी के कुल 28 सांसदों में से 19 ने बगावत का झण्डा बुलन्द करके लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला से सोमवार को मिलने का समय मांगा है उससे पूरी पार्टी का ममता दी के हाथ से निकलना तय माना जा रहा है। इन 19 सांसदों में वह लोकसभा सदस्य सायोनी घोष भी शामिल हैं जिन्हें तृणमूल की राजनीति में छोटी ममता के रूप में निरूपित किया जा रहा था क्योंकि वह निजी जीवन शैली से लेकर सार्वजनिक प्रदर्शनों तक में ममता दी का अनुकरण करती थीं। इसके साथ ही तृणमूल के राज्यसभा सांसद जिस तरह एक-एक करके सदन व पार्टी की सदस्यता त्याग रहे हैं उससे भी आभास होता है कि ममता दी के लोकप्रिय होने का खुमार अब तेजी से उतर रहा है और उनसे बागी हुए गुट के नेता खुद के ही असली तृणमूल होने को बेताब हैं। इसीलिए नई दिल्ली में एेसी चर्चाएं चल रही हैं कि अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाने के लिए वह कांग्रेस पार्टी में अपनी बची-खुची पार्टी का विलय कर सकती हैं क्योंकि एेसी खबरे हैं कि आगामी सोमवार को लोकसभा अध्यक्ष से मिलकर तृणमूल के बागी 19 सांसद मांग करेंगे कि उनके ही गुट को लोकसभा में असली तृणमूल माना जाये। इन्होंने यह भी घोषणा कर दी है कि उनकी तृणमूल पार्टी एनडीए सरकार का समर्थन करेगी। जाहिर है यह हक उन्हें दल बदल विरोधी कानून देता है।

Aditya Chopra

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