“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता” – यह केवल एक शास्त्रीय आदर्श नहीं, बल्कि भारतीय समाज की नैतिक दिशा का द्योतक है किंतु वास्तविकता यह है कि सामाजिक सम्मान के बावजूद महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी लंबे समय तक सीमित रही। लोकतंत्र केवल चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की एक समावेशी संरचना है। ऐसे में जब आधी आबादी निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया से बाहर रह जाए तो लोकतंत्र की गुणवत्ता स्वतः प्रभावित होती है।
इसी संदर्भ में नारी शक्ति वंदन अधिनियम भारतीय लोकतंत्र को अधिक न्यायपूर्ण, संतुलित और सहभागी बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल के रूप में उभरता है। भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा उसकी समावेशिता में निहित है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि “राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिकाऊ हो सकता है, जब वह सामाजिक लोकतंत्र पर आधारित हो।” स्वतंत्रता के पश्चात संविधान निर्माताओं ने समान राजनीतिक अवसरों की परिकल्पना की किंतु व्यावहारिक स्तर पर महिलाओं की भागीदारी सीमित ही रही जो लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप नहीं थी। यह स्थिति दर्शाती है कि सामाजिक एवं संरचनात्मक बाधाएं अब भी विद्यमान हैं।
ऐसे में नारी शक्ति वंदन अधिनियम इस असंतुलन को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है जो महिलाओं को राजनीतिक मुख्यधारा में सशक्त रूप से स्थापित करने की क्षमता रखता है। उल्लेखनीय है कि यह अधिनियम संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 के रूप में पारित हुआ। इसका उद्देश्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित करना है, जिसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति की आरक्षित सीटों में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व शामिल है। इसके अंतर्गत संविधान में अनुच्छेद 330A, 332A और 334A जोड़े गए हैं तथा अनुच्छेद 239AA में संशोधन किया गया है।
यह केवल प्रतिनिधित्व बढ़ाने का प्रयास नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। राष्ट्र निर्माण में महिलाओं का योगदान सदैव अमूल्य रहा है। स्वामी विवेकानंद का यह कथन उल्लेखनीय है कि “किसी समाज की वास्तविक प्रगति का आकलन उसकी महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है।” आज महिलाएं शिक्षा, विज्ञान, खेल और प्रशासन जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी क्षमता का प्रभावी प्रदर्शन कर चुकी हैं। इसके बावजूद राजनीति में उनकी भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित बनी हुई है। 18वीं लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 13.6 प्रतिशत है, जबकि राज्य विधानसभाओं में यह औसतन 10 प्रतिशत के आसपास है।
यह वैश्विक औसत (लगभग 27 प्रतिशत) से काफी कम है जो स्पष्ट रूप से प्रतिनिधित्व में असंतुलन को दर्शाता है। ऐसे परिदृश्य में नारी शक्ति वंदन अधिनियम इस अंतर को कम करने और महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और आवश्यक पहल सिद्ध हो सकता है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी केवल संख्यात्मक वृद्धि नहीं होगी, बल्कि इससे शासन की प्राथमिकताओं में भी गुणात्मक परिवर्तन आएगा। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने विकास को “स्वतंत्रताओं के विस्तार” के रूप में परिभाषित किया है। इस दृष्टि से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी, उनके सशक्तिकरण और समग्र विकास का एक महत्वपूर्ण आयाम है। यह अपेक्षा की जाती है कि महिला नेतृत्व स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को अधिक प्राथमिकता देगा।
पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को मिले आरक्षण के सकारात्मक परिणाम इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि महिला नेतृत्व अधिक संवेदनशील और जनोन्मुखी होता है। हालांकि, इस अधिनियम के क्रियान्वयन को लेकर कई व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू किया जाना है जिससे इसकी समय-सीमा अनिश्चित हो जाती है। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों को बढ़ाकर लगभग 816 करने का प्रस्ताव है, जिससे महिलाओं के लिए लगभग 273 सीटें आरक्षित हो सकेंगी। “प्रॉक्सी राजनीति” की आशंका भी बनी रहती है, जिसमें निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिजन निर्णय लेते हैं।
इसके अतिरिक्त अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए पृथक उप-आरक्षण का अभाव भी एक महत्वपूर्ण बहस का विषय है। इन चुनौतियों के समाधान के लिए केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि व्यावहारिक और संस्थागत प्रयास भी आवश्यक हैं। राजनीतिक दलों को महिलाओं को केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व देने के बजाय उन्हें वास्तविक नेतृत्व, पर्याप्त प्रशिक्षण और स्वतंत्र निर्णय लेने के अवसर प्रदान करने होंगे। इसके साथ ही समाज में लैंगिक समानता के प्रति सकारात्मक और प्रगतिशील दृष्टिकोण विकसित करना भी अत्यंत आवश्यक है ताकि महिलाएं बिना किसी सामाजिक बाधा के राजनीति में सक्रिय और प्रभावी भागीदारी निभा सकें।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम केवल एक विधायी सुधार नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन का सशक्त माध्यम है। यह महिलाओं को “प्रतिनिधि” से आगे बढ़ाकर “निर्णयकर्ता” के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है। इससे न केवल उनकी राजनीतिक भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि नीति-निर्माण में भी संतुलन आएगा। यदि इसका प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाता है तो यह भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी, संतुलित और उत्तरदायी बना सकता है। वास्तव में जब नारी सशक्त होगी तभी लोकतंत्र पूर्ण और सार्थक बन सकेगा।


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