श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी और विकास

Summary :

भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास की दिशा श्रम बाजार में महिलाओं की पूर्ण भागीदारी से गहराई से जुड़ी है। जैसे-जैसे नीति-निर्माता और वैश्विक संस्थान महिलाओं की आर्थिक भागीदारी की परिवर्तनकारी क्षमता को उत्तरोत्तवर रूप से पहचानने लगे हैं, देश में इस संबंध में उत्साहजनक गति देखने को मिल रही है। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, 2024 में भारत के महिला श्रम बल की भागीदारी दर (एलएफपीआर) 32.8% थी-जो वैश्विक दर 48.9% और पूर्वी एशिया की 59.2% की तुलना में कम है-फिर भी हाल के वर्षों में महिलाओं के रोजगार में वृद्धि देखने को मिल रही है, जिसकी पहुंच…

भारत के दीर्घकालिक आर्थिक विकास की दिशा श्रम बाजार में महिलाओं की पूर्ण भागीदारी से गहराई से जुड़ी है। जैसे-जैसे नीति-निर्माता और वैश्विक संस्थान महिलाओं की आर्थिक भागीदारी की परिवर्तनकारी क्षमता को उत्तरोत्तवर रूप से पहचानने लगे हैं, देश में इस संबंध में उत्साहजनक गति देखने को मिल रही है। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार, 2024 में भारत के महिला श्रम बल की भागीदारी दर (एलएफपीआर) 32.8% थी-जो वैश्विक दर 48.9% और पूर्वी एशिया की 59.2% की तुलना में कम है-फिर भी हाल के वर्षों में महिलाओं के रोजगार में वृद्धि देखने को मिल रही है, जिसकी पहुंच ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों तक है। भारत में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी लंबे समय से विशेषकर घरेलू देखभाल की जिम्मेदारियों जैसी कई सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक बाधाओं के कारण प्रभावित रही है। फिर भी, हाल में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से इस दिशा में सकारात्मक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाज की परिस्थितियां (ओएसएच) संहिता , 2020समावेशी विकास की दिशा में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। यह असुरक्षित कार्यस्थलों और सीमित कानूनी सुरक्षा का सामना करने वाली लाखों महिलाओं के लिए कामकाजी परिस्थितियों को सुरक्षित बनाकर गहन असमानताओं को दूर करने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। ओएसएच संहिता स्वास्थ्य, कल्याण और सुरक्षा के मानकीकृत प्रावधानों को लागू करके, न केवल एक नियामक ढांचे के रूप में कार्य करती है, बल्कि लैंगिक-समानता पर आधारित विस्तार का उत्प्रेरक भी बनती है।
भारत में महिला श्रम बल की भागीदारी की स्थिति…
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा संचालित आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) 2023-24 की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी 2023-24 में बढ़कर 41.7% हो गई है, जो 2017-18 के 23.3% के आंकड़े की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाती है। इस महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद-विशेष रूप से अवैतनिक घरेलू सेवाओं और परिवार के सदस्यों के लिए अवैतनिक देखभाल के कार्यों जैसी चुनौतियां अभी तक बरकरार हैं। उच्च शिक्षा में बढ़ते महिला नामांकन दर सहित महिलाओं की शिक्षा में उल्लेखनीय सुधार और घटती साक्षरता खाई के बावजूद यह विरोधाभास कायम है। इस प्रवृत्ति को अक्सर “फेमिनाइज़ेशन यू कर्व” कहा जाता है, जो दर्शाती है कि आर्थिक परिवर्तन के दौरान भागीदारी पहले कम होती है और फिर पुनः बढ़ती है। हालांकि, भारत के सामने यह जोखिम है कि वह इस प्रवृत्ति का अपवाद बन सकता है, महिलाओं की लगातार कम भागीदारी न केवल देश के मध्यतम-आय अर्थव्यवस्था में संक्रमण को कमजोर कर सकती है, बल्कि उसके जनसांख्यिकीय लाभांश को भी सीमित कर सकती है।
अवैतनिक देखभाल से संबंधित कार्य की भूमिका…
आर्थिक भागीदारी में एक प्रमुख बाधा अवैतनिक देखभाल से संबंधित कार्य का असमान बोझ है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के टाइम यूज सर्वे (2024) के अनुसार, भारतीय महिलाएं प्रतिदिन 2 घंटे 17 मिनट अवैतनिक देखभाल से संबंधित सेवाओं में व्यतीत करती हैं, जबकि पुरुषों का औसत समय 1 घंटे 15 मिनट है। वैश्विक स्तर पर महिलाएं अवैतनिक देखभाल से संबंधित कार्य का लगभग 76% हिस्सा करती हैं लेकिन भारत में मुख्यतः अपर्याप्त बाल देखभाल ढांचे और सांस्कृतिक अपेक्षाओं के कारण यह बोझ और भी अधिक है- भारत जीडीपीके 15–17% के बराबर अहमियत रखने वाला यह अवैतनिक श्रम औपचारिक आंकड़ों में आज भी अदृश्य बना हुआ है।
यह असमानता कई महिलाओं को नौकरी के अवसर ठुकराने या घर के निकट कम वेतन वाले, अनौपचारिक कार्य स्वीकार करने के लिए बाध्यक करती हैं। इसके अतिरिक्त, मातृत्व और देखभाल संबंधी जिम्मेदारियों के कारण करियर में आने वाले व्यवधान जीवनभर की आय को कम कर देते हैं जिससे एक स्थायी “केयर पेनल्टी” उत्पन्न होती है जो दीर्घकालिक आर्थिक सशक्तिकरण को सीमित कर देती है।
ओएसएच श्रम संहिता की परिवर्तनकारी क्षमता…
ओएसएच संहिता, 2020-10 या उससे अधिक श्रमिकों वाले सभी प्रतिष्ठानों के लिए सुरक्षा प्रावधानों को मानकीकृत करते हुए 13 श्रम कानूनों को एकीकृत करती है। यह रोजगार और देखभाल से संबंधित कार्य के बीच आने वाली बाधाओं को सीधे तौर पर दूर करती है। मातृत्व लाभ (संशोधन) अधिनियम, 2017 के अनुरूप, यह संहिता मातृत्व अधिकारों पर जोर देती है और कार्यस्थल पर महिलाओं का बने रहना सुविधाजनक बनाने के लिए नर्सिंग ब्रेक सुनिश्चित करती है।
महत्वपूर्ण रूप से यह संहिता अनुबंधित और असंगठित श्रमिकों को एक समान सुरक्षा ढांचे के अंतर्गत ला कर अनौपचारिक क्षेत्र में समानता को बढ़ावा देती है जिससे निर्माण, कृषि और घरेलू कार्य जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं को लाभ मिलता है। भर्ती और कार्य की स्थितियों में भेदभाव रहित व्यमवस्थाें को अनिवार्य बनाकर यह कार्यस्थलों को अधिक सुरक्षित और लैंगिक-चुनौतियों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाती है, जिनके कारण ऐतिहासिक रूप से महिलाओं को कार्यबल से बाहर रखा जाता रहा।
वैश्विक तुलना और सबक…
अन्य क्षेत्रों के अनुभव इस बात की पुष्टि करते हैं कि लैंगिक-संवेदनशील ओएसएच ढांचे बदलाव का एक शक्तिशाली साधन हैं। स्वीडन और आइसलैंड में, कार्यस्थल सुरक्षा, सब्सिडी वाली बाल देखभाल और माता-पिता की छुट्टियों को एकीकृत करने वाले सामाजिक सुरक्षा ढांचों के माध्यम से श्रम बल में महिलाओं की 70% से अधिक भागीदारी दर हासिल की गई है। जापान और दक्षिण कोरिया में, कार्यस्थल सुरक्षा और क्रेच सुविधाओं का विस्तार करके महिलाओं की एलएफपीआर धीरे-धीरे सुधारी जा रही है। उप-सहारा अफ्रीका में कृषि क्षेत्र में कानूनी सुरक्षा ने महिलाओं की भागीदारी को 70% तक बढ़ाने में मदद की है। लैटिन अमेरिकी उदाहरण, जैसे कि चिली और उरुग्वे, दर्शाते हैं कि सरकार द्वारा वित्तपोषित बाल देखभाल महिलाओं के रोजगार को बढ़ाती है, जबकि बच्चों के विकास पर कोई नकारात्मक प्रभाव भी नहीं पड़ता। भारत के लिए, ये उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि ओएसएच सुरक्षा उपायों को देखभाल संबंधी अवसंरचना में निवेश के साथ जोड़ना परिवर्तनकारी परिणाम सामने लाएगा।
आगे की राह…
ओएसएच संहिता, 2020 दीर्घकालिक और लैंगिक-संवेदनशील विकास के लिए एक रणनीतिक साधन है। इसकी पूर्ण क्षमता को साकार करने के लिए इसे एक ऐसे इकोसिस्टम में काम करना होगा जो कार्यस्थल की परिस्थितियों और देखभाल से संबंधित कार्य के बोझ दोनों पर गौर करता हो। बाल देखभाल से संबंधित बुनियादी ढांचे को मजबूत करना इसके मुख्य स्तंभों में से एक है, समेकित बाल विकास सेवा (आईसीडीएस)और राष्ट्रीय क्रेच योजना जैसी पहलों का विस्तार यह सुनिश्चित कर सकता है कि महिलाएं देखभाल और रोजगार में से किसी एक का चयन करने के लिए बाध्य न हों।
यद्यपि ओएसएच संहिता औपचारिक श्रमिकों की सुरक्षा करती है, वहीं असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) जैसी सुविधाओं तक पहुंच का विस्तार करना आवश्यक है। महिलाओं को उनके अधिकारों की जानकारी देने के लिए जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा, लचीली समय-सारणी और एर्गोनॉमिक डिजाइन सहित लैंगिक-संवेदनशील प्रथाओं को अपनाने के लिए नियोक्ताओं को भी हितधारकों के रूप में संलग्नम रहना चाहिए।
वैश्विक अनुभव इस बात की पुष्टि करता है कि मजबूत ओएसएच ढांचा देखभाल से संबंधित बुनियादी ढांचे के साथ एकीकृत होकर आर्थिक भागीदारी और जीडीपी में महत्वपूर्ण वृद्धि करता है। जनसांख्यिकीय और संरचनात्मक परिवर्तन से गुजर रहे भारत के लिए यह एकीकरण अत्यंत आवश्यवक है। समावेशी नीतियों की सहायता से ओएसएच संहिता को तेजी से लागू करने से महिला कार्यबल क्षमता उजागर होगी, जिससे आत्मनिर्भर भारत का विजन साकार होगा तथा प्रतिस्पर्धी और लचीली अर्थव्यवस्था सुनिश्चित होगी।

  • सुश्री रचना मेहरा
    हेड-ग्रुप एचआर, अरविंद लिमिटेड, गुजरात

Team Desk