क्यों मनाया जाता है चैती छठ? जानें महाभारत काल से जुड़ा रोचक इतिहास जब सूर्य देव के आशीर्वाद से दूर हुए पांडवों के कष्ट

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Chaiti Chhath Vrat Katha: छठ का त्योहार सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है। यह साल में दो बार मनाया जाता है- एक बार कार्तिक महीने में और दूसरी बार चैत्र महीने में। चैत्र में मनाए जाने वाले छठ को ‘चैती छठ’ कहते हैं। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बहुत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। चैती छठ का व्रत सेहत और लंबी आयु के लिए रखा जाता है। यह चार दिनों का कठिन निर्जला व्रत होता है जिसमें लोग पानी भी नहीं पीते। इसमें सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है और…

Chaiti Chhath Vrat Katha: छठ का त्योहार सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है। यह साल में दो बार मनाया जाता है- एक बार कार्तिक महीने में और दूसरी बार चैत्र महीने में। चैत्र में मनाए जाने वाले छठ को ‘चैती छठ’ कहते हैं। यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बहुत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

चैती छठ का व्रत सेहत और लंबी आयु के लिए रखा जाता है। यह चार दिनों का कठिन निर्जला व्रत होता है जिसमें लोग पानी भी नहीं पीते। इसमें सूर्य देव और छठी मैया की पूजा की जाती है और व्रत रखने वाले लोग 36 घंटे तक बिना पानी पिए (निर्जला) व्रत रखते हैं। साल 2026 में चैती छठ का पर्व रविवार, 22 मार्च (नहाय-खाय) से शुरू हो चुका है और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ बुधवार, 25 मार्च को समाप्त हो जाएगा।

चैती छठ व्रत के दौरान व्रत कथा का पाठ करना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि महाभारत के समय जब पांडव जंगलों में भटक रहे थे, तब माता द्रौपदी ने अपने पतियों की परेशानियां दूर करने के लिए यह व्रत किया था।

Chaiti Chhath Vrat Katha: छठ की पौराणिक कथा

Chaiti Chhath Vrat Katha
Chaiti Chhath Vrat Katha (Source: Social Media)

छठ की पौराणिक कहानी के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हार गए और उन्हें वनवास जाना पड़ा, तो वे बहुत दुखी थे। राजा युधिष्ठिर के सामने सबसे बड़ी समस्या तब आई जब उनके आश्रम में कई ऋषि-मुनि मेहमान बनकर आए। युधिष्ठिर इस चिंता में पड़ गए कि इस गरीबी और अभाव में वे इतने सारे महात्माओं के खाने-पीने का इंतजाम कैसे करेंगे।

अपने पतियों को इतना परेशान देखकर द्रौपदी का मन भर आया। उन्होंने अपने गुरु धौम्य जी से मदद मांगी और पूछा, “हे गुरुदेव! कोई ऐसा रास्ता बताएं जिससे मेरे पतियों की तकलीफें दूर हों, उन्हें वापस वही मान-सम्मान मिले और घर में फिर से खुशियां आ जाएं।”

द्रौपदी की बात सुनकर गुरु धौम्य ने उन्हें ‘रवि षष्ठी व्रत’ (छठ पूजा) के बारे में बताया। उन्होंने समझाया कि पुराने समय में सुकन्या ने भी इसी व्रत को किया था, जिससे उनके जीवन की सारी मुश्किलें हल हो गई थीं।

गुरु की बात मानकर द्रौपदी ने पूरे मन और नियम के साथ सूर्य देव और छठी माता की पूजा की। इस व्रत से खुश होकर सूर्य देव ने पांडवों को एक ‘अक्षय पात्र’ (ऐसा बर्तन जिसमें खाना कभी खत्म नहीं होता) दिया। इससे उनकी खाने की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो गई। इसी व्रत के आशीर्वाद से पांडवों ने बाद में युद्ध जीता और अपना राज-पाट वापस पाया।

Khushi Srivastava

खुशी श्रीवास्तव मीडिया इंडस्ट्री में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। वायरल कंटेंट, लाइफस्टाइल, हेल्थ और वास्तु शास्त्र टिप्स पर प्रमुखता से काम किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के बाद पहली बार पत्रकारिता के श्रेत्र में कदम रखा। इसके बाद अमर उजाला प्रिंट (प्रयागराज) में इंटर्नशिप की। फिलहाल खुशी, पंजाब केसरी दिल्ली के डिजिटल प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट राइटिंग का काम करती हैं।