Jyeshtha Amavasya Kab Hai: हिंदू धर्म में अमावस्या की तिथि को अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। साल में आने वाली सभी 12 अमावस्याओं का अपना अलग महत्व होता है। यह दिन हमारे पूर्वजों को समर्पित है। मान्यता है कि इस तिथि पर पितृ लोक से पूर्वज धरती पर पधारते हैं। इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और परिवार को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। पितृ कृपा से परिवार में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है। पितृ कर्म के अतिरिक्त, अमावस्या पर पवित्र नदियों में स्नान करने, दान-पुण्य करने और भक्ति का भी विशेष विधान है। ज्येष्ठ के पावन महीने में आने वाली अमावस्या को ‘ज्येष्ठ अमावस्या’ कहा जाता है।
ज्येष्ठ महीने की अमावस्या को बर अमावस्या या बड़ अमावस्या भी कहते हैं। इसी दिन शनि जयंती मनाई जाती है, इसलिए इसे शनि अमावस्या भी कहा जाता है। इस दिन शनि देव की आराधना और पीपल के पेड़ की पूजा करना बहुत शुभ और फलदायी माना जाता है। आइए जानें कि Jyeshtha Amavasya Date 2026 कब है, साथ में पूजा विधि और महत्व के बारे में भी जानेंगे।
Jyeshtha Amavasya Kab Hai: ज्येष्ठ अमावस्या की तारीख

पंचांग के मुताबिक, ज्येष्ठ अमावस्या 16 मई 2026 (शनिवार) को सुबह 05:11 बजे शुरू होगी और 17 मई की रात 01:30 बजे खत्म होगी। इसलिए, दान-पुण्य, पवित्र स्नान और पूजा-पाठ के सारे काम 16 मई को ही किए जाएंगे। यह दिन बहुत खास है क्योंकि इसी दिन शनि जयंती और वट सावित्री का व्रत भी पड़ेगा।
Jyeshtha Amavasya Niyam: ऐसे करें पूजन

- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें।
- मन में पूर्वजों को याद कर व्रत का संकल्प लें।
- तांबे के लोटे में पानी, काले तिल और फूल लेकर पितरों को जल चढ़ाएं।
- तर्पण के समय “ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः” मंत्र बोलें।
- घी का दीपक जलाकर उसे दक्षिण दिशा की ओर रखें।
- पितरों के नाम पर खाना, कपड़े या फल दान करें।
- किसी ब्राह्मण या गरीब व्यक्ति को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें।
- पीपल या बरगद के पेड़ के 108 चक्कर लगाएं।
- वट वृक्ष की पूजा करते समय उस पर लाल धागा या सूत लपेटें और पति की लंबी उम्र की दुआ मांगें।
- पेड़ पर जल, रोली, चावल और फूल चढ़ाएं और “ॐ नमः भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
Jyeshtha Amavasya Significance: ज्येष्ठ अमावस्या का महत्व

यह दिन अपने पूर्वजों से जुड़ने का है। मान्यता है कि पवित्र नदी में नहाने से मन का बोझ हल्का होता है और गलतियों की माफी मिलती है। अपने पितरों को याद करने से घर में सुख-शांति आती है और आपसी झगड़े खत्म होते हैं। इस दिन बरगद (वट वृक्ष) की पूजा का भी बहुत महत्व है क्योंकि इसे अमरता का प्रतीक माना जाता है। इसकी पूजा करने से जीवन में खुशहाली आती है और पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।
इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथियों, कहानियों या मान्यताओं पर आधारित है। पंजाब केसरी इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।


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