Pradosh Vrat Katha: प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा

कुछ समय बाद, ब्राह्मणी दोनों बच्चों को लेकर एक मंदिर गई। वहां उनकी मुलाकात मशहूर ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि ने अपनी दिव्य शक्ति से पहचान लिया कि वह बालक कोई साधारण बच्चा नहीं बल्कि एक राजकुमार है। जब उन्होंने ब्राह्मणी को बालक के माता-पिता की दुखद मौत के बारे में बताया, तो वह बहुत उदास हो गई। तब ऋषि ने उन्हें अपनी किस्मत बदलने के लिए प्रदोष व्रत रखने की सलाह दी और उसकी पूरी विधि समझाई। ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने पूरी श्रद्धा से वह व्रत किया।
एक दिन जब दोनों बालक जंगल में घूम रहे थे, तो उनकी मुलाकात कुछ सुंदर गंधर्व कन्याओं से हुई। राजकुमार धर्मगुप्त को अंशुमती नाम की कन्या से प्रेम हो गया। जब अंशुमती के पिता (गंधर्वराज) को पता चला कि धर्मगुप्त विदर्भ का राजकुमार है, तो उन्होंने भगवान शिव की मर्जी से दोनों की शादी करा दी। इसके बाद राजकुमार ने अपनी सेना तैयार की, दुश्मनों से युद्ध किया और अपना खोया हुआ राज्य वापस जीत लिया।
बाद में राजकुमार को समझ आया कि यह सब उस प्रदोष व्रत का ही फल था जो उसने ब्राह्मणी के साथ मिलकर किया था। भगवान शिव उसकी भक्ति से खुश थे और उन्होंने उसे मुश्किलों से लड़ने की ताकत दी। तभी से यह माना जाने लगा कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से प्रदोष व्रत करता है और इसकी कथा सुनता है, उसे कभी गरीबी या दुखों का सामना नहीं करना पड़ता।


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