Vibhuvan Sankashti Chaturthi Vrat Katha: विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पौराणिक कथा

शास्त्रों में बताई गई कहानी के अनुसार, एक शहर में एक बुढ़िया माई रहती थीं। वह रोज मिट्टी के गणेश जी बनाकर उनकी पूजा करती थीं। लेकिन उनकी मुश्किल यह थी कि मिट्टी की होने की वजह से मूर्ति रोज गल जाती थी और उन्हें हर दिन नई मूर्ति बनानी पड़ती थी।
एक दिन उनके शहर में एक सेठ का मकान बन रहा था। बुढ़िया माई ने सोचा कि क्यों न मकान बनाने वाले मिस्त्री से पत्थर के गणेश जी बनवा लूं। उन्होंने मिस्त्री से जाकर कहा, “भाई, मेरे लिए पत्थर के एक गणेश जी बना दो।” इस पर मिस्त्री ने ताना मारते हुए कहा, “अरे बुढ़िया माई! जितने समय में हम तुम्हारे पत्थर के गणेश जी बनाएंगे, उतने में तो हम अपनी दीवार खड़ी कर लेंगे।”
मिस्त्री की बात सुनकर बुढ़िया माई को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, “राम करे तुम्हारी दीवार हमेशा टेढ़ी ही बने।” इसके बाद मिस्त्री जब भी दीवार बनाते, वह टेढ़ी हो जाती और गिर जाती। वे बार-बार दीवार बनाते और वह बार-बार गिर जाती। ऐसा करते-करते शाम हो गई।
शाम को जब सेठ काम देखने आए, तो उन्होंने देखा कि आज तो कुछ भी काम नहीं हुआ। जब सेठ ने इसका कारण पूछा, तो मिस्त्री बोले, “यहां एक बुढ़िया माई आई थीं। वह पत्थर के गणेश जी बनाने को कह रही थीं, पर हमने मना कर दिया। तब उन्होंने कहा कि तुम्हारी दीवार टेढ़ी हो जाए। बस, तभी से यह दीवार सीधी बन ही नहीं रही है।”
यह सुनकर सेठ ने बुढ़िया माई को बुलवाया और कहा, “माई, हम तुम्हें सोने के गणेश जी बनवा कर देंगे, तुम बस हमारी यह दीवार सीधी करवा दो।”जैसे ही सेठ ने बुढ़िया माई को सोने की गणेश मूर्ति दी, वैसे ही सेठ की दीवार बिल्कुल सीधी और मजबूत हो गई।


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