कुरुक्षेत्र : गीता महाभारत का एक अभिन्न अंग है, गीता मानव जीवन का आधार स्तंभ है, श्रीमद्भगवद्गीता संपूर्ण योग ग्रंथ है। गीता में योग शब्द का व्यवहार आत्मा का परमात्मा से मिलन के अर्थ में किया गया है। योग का व्यवहार गीता में विस्तृत अर्थ में किया गया है। योग दर्शन में योग का अर्थ चित्त वृत्तियों का निरोध है। गीता वह विद्या है है जो आत्मा को ईश्वर से मिलाने के लिए अनुशासन तथा भिन्न-भिन्न मार्गों का उल्लेख करती है। गीता का मुख्य उपदेश योग है। यह विचार विश्व प्रसिद्ध योग गुरु योगऋषि स्वामी रामदेव ने मातृभूमि सेवा मिशन के प्रतिनिधि मंडल से एक शिष्टाचार मुलाकात के दौरान व्यक्त किए।
मातृभूमि सेवा मिशन के प्रतिनिधि मंडल ने मिशन द्वारा आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रीमद्भगवद्गीता जयंती समारोह-2018 के अवसर पर संपन्न होने वाले अठारह दिवसीय कार्यक्रम के 16 दिसम्बर 2018 को अयोजित होने वाले गीता में जीवन प्रबंधन विषय पर होने वाले कार्यक्रम में उपिस्थत रहने के लिए आमंत्रित किया। स्वामी रामदेव ने कहा कि योग आत्मा के बन्धन का अंत कर उसे ईश्वर की ओर मोड़ती है। गीता में ज्ञान, कर्म और भक्ति को मोक्ष का मार्ग कहा है।
गीता में ज्ञानभोग, भक्तिभोग और कर्मयोग का संभव होने के कारण योग की त्रिवेणी कही जाती है। गीता को योग शास्त्र कहा जाता है। प्रतिनिधि मंडल के प्रमुख मातृभूमि सेवा मिशन के संस्थापक डॉ0 श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि वैदिक कर्म के अनुसार मानव वैदिक कर्मों के द्वारा अपने आचरण को शुद्ध कर सकता है। उपनिषद् में कर्म को सत्य प्राप्ति में सहायक कहा गया है। गीता में सत्य की प्राप्ति के लिए कर्म को करने का आदेश दिया गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता में ज्ञान और भक्ति में निकटता का संबंध दर्शाया गया है। गीता में ज्ञान की भक्ति तथा भक्ति में ही ज्ञान को गूँथ दिया गया है। वर्तमान युग के अशांत मानव के लिए गीता संजीवनी के समान है। गीता ही भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुम्बकम् की अवधारणा को पुनस्र्थापित करती है। प्रतिनिधि मंडल में मातृभूमि सेवा मिशन के वरिष्ठ सदस्य डॉ. जितेन्द्र सिंह, कपिल मदान सम्मलित रहे।
(रामपाल शर्मा)


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