नई दिल्ली, 26 जनवरी (आईएएनएस)। स्वाद में मखमली और दिखने में आकर्षक, मैदा हमारे रोजमर्रा के खाने का ऐसा हिस्सा बन गया है, जिसे छोड़ पाना लगभग नामुमकिन लगता है। बिस्किट हो, समोसा हो, भटूरा हो या पिज्जा, हर जगह मैदा ही दिखता है। क्या आप जानते हैं कि यह ‘सफेद आटा’ आपके पेट के लिए कितना खतरनाक हो सकता है? विशेषज्ञ और आयुर्वेद डॉक्टर इसे ‘साइलेंट क्राइसिस’ कहते हैं।
असल में, गेहूं से मैदा बनाने के दौरान उसकी बाहरी परत और भ्रूण निकाल दिए जाते हैं, जिसमें फाइबर, विटामिन और मिनरल्स होते हैं। जो बचता है, वह केवल स्टार्च यानी खाली कैलोरी है। आयुर्वेद इसे ‘निःसत्व आहार’ कहता है। बिना फाइबर के यह आंतों में बिल्कुल ऐसे काम करता है जैसे बिना ग्रीस के मशीन घिसती है, जाम करती है और पचने में दिक्कत पैदा करता है।
मैदा पानी में मिलते ही चिपचिपा हो जाता है और हमारी आंतों को इसे आगे बढ़ाने में कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। छोटी आंत के विली, यानी पोषण सोखने वाले छोटे-छोटे बाल, भी इसके चिपकने से ठीक से काम नहीं कर पाते। इस वजह से न सिर्फ मैदा बल्कि साथ में खाए गए पोषक तत्व भी अच्छे से अवशोषित नहीं होते।
इसके अलावा, मैदा को चमकदार सफेद बनाने के लिए ब्लीचिंग किया जाता है, जिससे एलोक्सन नामक रासायनिक पदार्थ बनता है। यह स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है और आप अनजाने में वही खा रहे हैं। मैदा एसिडिक होता है, ज्यादा खाने से शरीर हड्डियों से कैल्शियम खींचता है, जिससे हड्डियां कमजोर हो सकती हैं।
इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स बहुत ज्यादा होता है, जिससे शुगर अचानक बढ़ती है और इंसुलिन रेजिस्टेंस जैसी परेशानियां होती हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपको मैदा पूरी तरह छोड़ देना चाहिए। आयुर्वेद कुछ आसान उपाय बताता है। मैदा खाने के बाद गुनगुना पानी और त्रिफला लेना आंतों को साफ करता है। अजवाइन और काला नमक खाने से पाचन तेज होता है।
इसके साथ ही कोशिश करें कि मैदे की जगह मल्टीग्रेन आटा, जौ या रागी का इस्तेमाल करें।
–आईएएनएस
पीआईएम/एबीएम
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