लखनऊ, 31 अक्टूबर (आईएएनएस)। लखनऊ के किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में महिला डॉक्टरों के धर्मांतरण और उत्पीड़न के आरोपों की जांच का दायरा बढ़ गया है। स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएप) की रिपोर्ट के बाद संस्थान के कई प्रोफेसर, डॉक्टर और अन्य कर्मचारी जांच के दायरे में आ गए हैं।
एसटीएफ की जांच रिपोर्ट ने कई फैकल्टी सदस्यों और कर्मचारियों के आचरण और संलिप्तता पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें कुछ प्रोफेसर भी दोषी पाए गए हैं।
रिपोर्ट में लोगों पर धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने, महिला डॉक्टरों को ब्लैकमेल करने, शिकायतकर्ताओं को मानसिक रूप से परेशान करने और आरोपियों के खिलाफ शिकायतों को दबाने की कोशिश करने जैसे आरोप लगाए गए हैं।
इन निष्कर्षों के बाद राज्य सरकार ने विश्वविद्यालय प्रशासन को रिपोर्ट में पहचाने गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है।
केजीएमयू की कार्यकारी परिषद इस मामले की जांच के लिए छह सदस्यीय जांच समिति गठित करेगी। इस प्रस्तावित समिति में एक कुलपति (वाइस चांसलर), एक रजिस्ट्रार, अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग के एक शिक्षक, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) वर्ग के एक शिक्षक और कार्यकारी परिषद द्वारा नामित दो सदस्य शामिल होंगे।
खबरों के अनुसार एसटीएफ की जांच में विश्वविद्यालय के कई विभागों के डॉक्टरों और कर्मचारियों की संलिप्तता और घटनाओं का पता चला है।
रिपोर्ट में पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी और माइक्रोबायोलॉजी विभागों के साथ-साथ गांधी वार्ड से जुड़ी शिकायतों और कदाचार का विस्तृत विवरण दिया गया है।
पैथोलॉजी विभाग में एसटीएफ ने कुछ वरिष्ठ फैकल्टी सदस्यों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं, जिनमें विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमैरा कय्यूम शामिल हैं।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने प्रभावित डॉक्टरों द्वारा की गई शिकायतों को दबा दिया, आरोपियों का समर्थन किया और उचित कार्रवाई सुनिश्चित करने के बजाय शिकायतकर्ताओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया।
यह जांच लखनऊ के अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में दर्ज दो एफआईआर पर आधारित थी। पहली एफआईआर 23 दिसंबर 2025 को चौक पुलिस स्टेशन में डॉ. रमीज मलिक के खिलाफ दर्ज की गई थी। यह शिकायत पैथोलॉजी विभाग की रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. देवार्ती मित्रा ने दर्ज कराई थी।
दूसरी एफआईआर 29 दिसंबर 2025 को कैसरबाग पुलिस स्टेशन में रेजिडेंट डॉक्टर मोहम्मद आदिल के खिलाफ दर्ज की गई थी। यह मामला नर्सिंग स्टाफ की सदस्य माविया द्वारा दी गई शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था।
केजीएमयू के प्रवक्ता के.के. सिंह ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि विश्वविद्यालय ने इन मामलों के संबंध में कार्रवाई की है और खुद भी कुछ अन्य घटनाओं को सामने लाया है।
के.के. सिंह ने कहा, “दो मामले सामने आए है। एक रमीज से जुड़ा था और दूसरा नर्सिंग स्टाफ के एक सदस्य और एक बहुरूपिये से जुड़ा था। रमीज वाले मामले में शुरुआत में एक-दो दिन की थोड़ी देरी हुई थी, हालांकि बाकी दो मामलों का पता हमने खुद लगाया। यूनिवर्सिटी ने इनका पर्दाफाश किया और हमारी पहल पर ही इसमें शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई।”
एसटीएफ की रिपोर्ट में डॉ. सजीन के खिलाफ भी आरोप हैं। उन पर कई महिला डॉक्टरों के साथ प्रेम संबंध बनाने और बाद में उन पर धर्म परिवर्तन करने के लिए दबाव डालने का आरोप है।
डॉ. देवारती मित्रा के अलावा इस रिपोर्ट में आरोपों के संबंध में डॉ. मानसी सक्सेना, डॉ. कृतिका पांडे और डॉ. मुस्कान का भी जिक्र है। रिपोर्ट के अनुसार, डॉ. सजीन को इस साल 9 जनवरी को गिरफ्तार किया गया था।
जांच में सामने आया एक और मामला ज्योति राव से जुड़ा है, जो केजीएमयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग में एक संविदा कर्मचारी हैं।
रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने शफात अली खान नाम के एक अन्य कर्मचारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने उस पर छेड़छाड़, पीछा करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया था। हालांकि शिकायत के बावजूद खान के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके बजाय ज्योति राव की संविदा सेवा को ही समाप्त कर दिया गया।
जांच में रेडियोलॉजी विभाग के रेजिडेंट डॉक्टर रिजवान पर भी आरोप लगे हैं। उन पर महिला डॉक्टरों को ब्लैकमेल करने और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डालने का आरोप है।
एसटीएफ की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि जब पीड़ित महिलाओं ने शिकायत करने की कोशिश की तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई। इसमें परीक्षाओं में फेल करने और उनके करियर को बर्बाद करने की धमकियां शामिल थीं।
रिपोर्ट में गांधी वार्ड में तैनात नर्सिंग स्टाफ से जुड़े कई आरोपों का भी जिक्र है। नफीस नाम के एक नर्सिंग स्टाफ सदस्य पर ज्योति सिंह के साथ प्रेम संबंध बनाने और बाद में उन पर धर्म परिवर्तन करके निकाह करने का दबाव डालने का आरोप है।
इसी तरह एक अन्य कर्मचारी फुरकान पर जागृति गुप्ता को दूसरा धर्म अपनाने और निकाह करने के लिए दबाव डालने का आरोप है। ये आरोप विश्वविद्यालय के कुछ कर्मचारियों की गतिविधियों की व्यापक जांच का हिस्सा हैं।
एसटीएफ की रिपोर्ट में केजीएमयू के कई अन्य अधिकारियों और फैकल्टी सदस्यों के आचरण पर भी सवाल उठाए गए हैं। इनमें वाइस-चांसलर के निजी सचिव एसएस अब्बास, विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ. अब्बास अली मेहदी, प्रोफेसर उस्मान कौसर और बायोकेमिस्ट्री विभाग के कुछ फैकल्टी सदस्य शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन लोगों पर आरोप है कि उन्होंने आरोपों का सामना कर रहे कुछ डॉक्टरों और कर्मचारियों को बचाया और विभागीय मामलों से जुड़े फैसलों को प्रभावित किया।
विश्वविद्यालय में शिकायतों से निपटने के तरीके को लेकर हो रही जांच के तहत इन लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। जांच एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में ‘इस्लामिक मेडिकोस’ नामक एक समूह का भी जिक्र किया है। एसटीएफ का दावा है कि एसएमएससीआई आगरा और केजीएमयू से जुड़े कुछ पूर्व और वर्तमान मेडिकल छात्रों का एक नेटवर्क सक्रिय था।
रिपोर्ट में कुछ डॉक्टरों के नामों और इस मामले के संबंध में उनके बीच हुई बातचीत का भी उल्लेख है।
एसटीएफ ने डॉ. सजीन से जुड़े साथियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच की सिफारिश की है। इसमें केजीएमयू में गठित विशाखा समिति की जांच का भी हवाला दिया गया है, जिसने डॉ. सजीन को उन आरोपों के मामले में दोषी पाया था, जिनकी जांच की जा रही थी।
एसटीएफ की जांच के नतीजों के आधार पर राज्य सरकार ने अब विश्वविद्यालय को औपचारिक रूप से निर्देश दिया है कि वह रिपोर्ट में पहचाने गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करे।
30 अक्टूबर को संयुक्त सचिव आनंद कुमार त्रिपाठी ने केजीएमयू रजिस्ट्रार को एक पत्र भेजा, जिसमें प्रशासन को निर्देश दिया गया कि वह नियमों के अनुसार संबंधित डॉक्टरों, प्रोफेसरों और अन्य कर्मचारियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करें।
–आईएएनएस
डीके/वीसी
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