तमिलनाडु चुनाव: 1952 के बाद पहली बार कोयंबटूर के चुनावी मैदान से वामपंथी दल गायब

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कोयंबटूर, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में 1952 के बाद कोयंबटूर जिले में विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों का कोई उम्मीदवार नहीं होगा। इससे स्वतंत्र भारत के पहले चुनावों से चली आ रही वामपंथी दलों की निरंतर चुनावी उपस्थिति का अंत हो जाएगा। यह अनुपस्थिति 2026 के चुनावों से पहले जिले के राजनीतिक स्वरूप में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है। इस घटनाक्रम को राज्य में बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और विकसित होते राजनीतिक समीकरणों के प्रतिबिंब के रूप में देखा जा रहा है। कभी कम्युनिस्ट पार्टियों का स्वाभाविक गढ़ माने जाने वाले कोयंबटूर में वर्षों से वामपंथी प्रभाव, विशेषकर…

कोयंबटूर, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में 1952 के बाद कोयंबटूर जिले में विधानसभा चुनाव में वामपंथी दलों का कोई उम्मीदवार नहीं होगा। इससे स्वतंत्र भारत के पहले चुनावों से चली आ रही वामपंथी दलों की निरंतर चुनावी उपस्थिति का अंत हो जाएगा।

यह अनुपस्थिति 2026 के चुनावों से पहले जिले के राजनीतिक स्वरूप में एक बड़ा बदलाव दर्शाती है। इस घटनाक्रम को राज्य में बदलती सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और विकसित होते राजनीतिक समीकरणों के प्रतिबिंब के रूप में देखा जा रहा है।

कभी कम्युनिस्ट पार्टियों का स्वाभाविक गढ़ माने जाने वाले कोयंबटूर में वर्षों से वामपंथी प्रभाव, विशेषकर संगठित श्रमिक आंदोलनों को बनाए रखने वाले घटक में लगातार गिरावट देखी गई है।

इस परिवर्तन के केंद्र में कपड़ा क्षेत्र का पतन है, जो कभी कोयंबटूर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ था। कोविड-19 महामारी के बाद से राष्ट्रीय वस्त्र निगम (एनटीसी) सहित प्रमुख मिलों के बंद होने से उन ट्रेड यूनियनों को कमजोर कर दिया गया है जो पारंपरिक रूप से इस क्षेत्र में वामपंथी दलों का समर्थन करती थीं।

औद्योगिक श्रमिकों और श्रमिक संघों के नेटवर्क की घटती उपस्थिति के साथ सीपीआई और सीपीआई (एम) जैसी पार्टियों की चुनावी ताकत धीरे-धीरे कम होती जा रही है, जिससे जिले में स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने और सीटें जीतने की उनकी क्षमता घट रही है।

सीपीआई के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि श्रमिक संघों की घटती ताकत का वामपंथी पार्टियों की चुनावी संभावनाओं पर सीधा असर पड़ा है। उन्होंने कहा, “1952 के पहले विधानसभा चुनावों से ही वामपंथी पार्टियां कोयंबटूर में लगातार स्वतंत्र रूप से या गठबंधन के हिस्से के रूप में चुनाव लड़ती रही हैं और प्रमुख निर्वाचन क्षेत्रों में जीत हासिल करती रही हैं। श्रमिक संघों के कमजोर होने से यह स्थिति बदल गई है।”

ऐतिहासिक रूप से सीपीआई (एम) को कोयंबटूर पूर्व जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता मिली है, जहां उसने पांच सीटें जीतीं, जबकि पेरूर और सिंगनल्लूर में उसे दो-दो सीटें मिलीं। दूसरी ओर सीपीआई ने 1980 और 2011 में वालपराई विधानसभा सीट जीती थी।

संसदीय स्तर पर सीपीआई ने कोयंबटूर लोकसभा क्षेत्र में पांच बार जीत हासिल की, जबकि सीपीआई (एम) ने इसे तीन बार जीता। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि 2026 में वामपंथी उम्मीदवारों की अनुपस्थिति का मुख्य कारण डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन में सीटों के बंटवारे की व्यवस्था है।

खबरों के मुताबिक, सीपीआई और सीपीआई (एम) दोनों ने वालपराई और सिंगनल्लूर जैसी सीटों पर चुनाव लड़ने की कोशिश की थी, लेकिन अंततः उन्हें सीटेंमममममम नहीं मिलीं। जिले में सीधे चुनाव न लड़ने के बावजूद, वामपंथी दलों ने अपना ध्यान डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन की संभावनाओं को मजबूत करने पर केंद्रित कर लिया है। नेताओं ने संकेत दिया है कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में कार्यकर्ताओं को संगठित करने और जमीनी स्तर पर प्रचार कार्य पहले से ही चल रहा है।

–आईएएनएस

ओपी/पीएम

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