पंचायती राज और निकाय चुनाव से पहले राजस्थान सरकार ने जारी की ओबीसी सर्वे रिपोर्ट

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जयपुर, 10 अगस्त (आईएएनएस)। राजस्थान में होने वाले पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले राजस्थान अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग की विस्तृत सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी कर दी गई है। रिटायर्ड जस्टिस मदनलाल भाटी की अध्यक्षता वाले आयोग की ओर से 92 ओबीसी समुदायों का एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सर्वे किया गया। इनमें ‘सबसे पिछड़े वर्गों’ (एमबीसी) की श्रेणी में आने वाले पांच समुदाय भी शामिल थे। आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में कुल ओबीसी आबादी 3.63 करोड़ से ज्यादा है। इस सर्वे से अलग-अलग ओबीसी समुदायों के बीच आबादी के बंटवारे, सरकारी नौकरी,…

जयपुर, 10 अगस्त (आईएएनएस)। राजस्थान में होने वाले पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों से पहले राजस्थान अन्य पिछड़ा वर्ग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) आयोग की विस्तृत सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी कर दी गई है।

रिटायर्ड जस्टिस मदनलाल भाटी की अध्यक्षता वाले आयोग की ओर से 92 ओबीसी समुदायों का एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सर्वे किया गया। इनमें ‘सबसे पिछड़े वर्गों’ (एमबीसी) की श्रेणी में आने वाले पांच समुदाय भी शामिल थे।

आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में कुल ओबीसी आबादी 3.63 करोड़ से ज्यादा है।

इस सर्वे से अलग-अलग ओबीसी समुदायों के बीच आबादी के बंटवारे, सरकारी नौकरी, स्वरोजगार, श्रम भागीदारी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है।

रिपोर्ट की एक मुख्य बात यह है कि सात समुदाय मिलकर कुल ओबीसी आबादी का 55.14 प्रतिशत हिस्सा हैं। आबादी के हिसाब से शीर्ष सात समुदायों की हिस्सेदारी 55.14 प्रतिशत है। जाट और जाट सिख समुदाय सबसे बड़ा है, जिसकी हिस्सेदारी 20.14 प्रतिशत है। इसके बाद गुर्जर (9.11 प्रतिशत), कुम्हार और कुमावत (8.36 प्रतिशत) और माली, सैनी और बागवान (7.80 प्रतिशत) आते हैं।

जांगिड़/सुथार समुदाय की हिस्सेदारी 3.49 प्रतिशत, यादव/अहीर की 3.22 प्रतिशत, और मेव समुदाय की 3.02 प्रतिशत है। कुल मिलाकर, ये सात समुदाय मिलकर ओबीसी आबादी के आधे से ज्यादा हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं।

सर्वे किए गए ओबीसी समुदायों में जाट और जाट सिख समुदाय सबसे बड़े आबादी समूह हैं, जिनके बाद गुर्जर, कुम्हार-कुमावत, माली-सैनी, जांगिड़, यादव, और मेव समुदाय आते हैं।

सर्वे में सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व के मामले में भी बड़े अंतर सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान में लगभग 3.92 लाख ओबीसी सरकारी कर्मचारी हैं। नतीजों से पता चलता है कि जाट, गुर्जर, सैनी और यादव समुदाय मिलकर ओबीसी सरकारी कर्मचारियों का लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा बनाते हैं। वहीं, 18 ओबीसी समुदायों में से हर एक के सरकारी सेवा में 100 से भी कम सदस्य हैं।

इस आंकड़े से पता चलता है कि प्रतिनिधित्व की जांच सिर्फ आबादी के आधार पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी के संदर्भ में भी की जानी चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि ओबीसी समुदायों के लगभग 12.50 लाख लोग स्वरोजगार में लगे हुए हैं। प्रमुख समुदायों में कुम्हार-कुमावत 1.24 लाख; जाट 1.21 लाख; माली-सैनी 1.15 लाख; और जांगिड़ 85,114 लोग खुद का काम कर रहे हैं।

सर्वेक्षण में लेबर और दिहाड़ी मजदूरी वाले क्षेत्रों में ओबीसी समुदायों की बड़ी भागीदारी भी दर्ज की गई है। इस श्रेणी में कुम्हार-कुमावत और सैनी समुदायों की अच्छी-खासी हिस्सेदारी है।

सर्वेक्षण में ओबीसी आबादी के बारे में विस्तृत डेमोग्राफिक जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, पुरुष आबादी 1,87,50,094 (52.23 प्रतिशत) और महिला आबादी 1,71,05,082 (47.76 प्रतिशत) है। लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 914 महिलाएं है।

आयोग की रिपोर्ट राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट के ‘ट्रिपल टेस्ट’ फ्रेमवर्क के अनुसार तैयार की गई इन जानकारियों से राजस्थान की पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार मिलने की उम्मीद है।

सर्वेक्षण से पता चलता है कि ओबीसी श्रेणी में ऐसे समुदाय शामिल हैं जिनकी आबादी, आर्थिक भागीदारी, सरकारी नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर में काफी अंतर है। इसलिए, रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि जिन समुदायों की राजनीतिक और आर्थिक भागीदारी ऐतिहासिक रूप से कम रही है, वे पीछे न छूट जाएं।

यह व्यापक सर्वेक्षण राजस्थान की ओबीसी आबादी के भीतर सामाजिक और आर्थिक विविधता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय आधार प्रदान करता है। इसके निष्कर्ष उन समुदायों के लिए समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व, समान अवसर और लक्षित नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता को पुष्ट करते हैं, जिनका सार्वजनिक संस्थानों और सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व तुलनात्मक रूप से कम रहा है।

अधिकारियों ने कहा कि जैसे-जैसे राजस्थान आगामी पंचायती राज और शहरी स्थानीय निकाय चुनावों की ओर बढ़ रहा है, आयोग के निष्कर्षों का आरक्षण प्रक्रिया और जमीनी स्तर पर समावेशी प्रतिनिधित्व को मजबूत करने पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है और यह सुनिश्चित करती है कि सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांत राजस्थान के लोकतांत्रिक संस्थानों में झलकें।

–आईएएनएस

एसडी/वीसी

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