उत्तर प्रदेश विधायकों की पेंशन और भत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, याचिका पर जारी किया नोटिस

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नई दिल्ली, 10 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ‘लोक प्रहरी’ की याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें उत्तर प्रदेश के उस कानून के प्रावधानों को चुनौती दी गई है जो राज्य विधानसभा और विधान परिषद के मौजूदा और पूर्व सदस्यों को वेतन, भत्ते, पेंशन और अन्य सुविधाएं देते हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार, विधानसभा और विधान परिषद के प्रधान सचिवों को नोटिस जारी किया। यह याचिका ‘लोक प्रहरी’ के महासचिव एसएन शुक्ला ने दायर की थी, जो खुद अदालत में पेश हुए थे। इस मामले की सुनवाई के लिए…

नई दिल्ली, 10 सितंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को ‘लोक प्रहरी’ की याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें उत्तर प्रदेश के उस कानून के प्रावधानों को चुनौती दी गई है जो राज्य विधानसभा और विधान परिषद के मौजूदा और पूर्व सदस्यों को वेतन, भत्ते, पेंशन और अन्य सुविधाएं देते हैं।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार, विधानसभा और विधान परिषद के प्रधान सचिवों को नोटिस जारी किया। यह याचिका ‘लोक प्रहरी’ के महासचिव एसएन शुक्ला ने दायर की थी, जो खुद अदालत में पेश हुए थे।

इस मामले की सुनवाई के लिए फिलहाल 9 अक्टूबर की तारीख तय की गई है।

याचिका में उत्तर प्रदेश राज्य विधानमंडल (सदस्यों के वेतन-भत्ते और पेंशन) अधिनियम, 1980 के कई प्रावधानों को चुनौती दी गई है। इनमें निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, रेलवे कूपन, यात्रा भत्ता, दैनिक भत्ता, सदस्यों को दिए जाने वाले लोन और पूर्व विधायकों व एमएलसी और उनके परिवारों को मिलने वाले पेंशन लाभ शामिल हैं।

‘लोक प्रहरी’ का तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 195 राज्य विधानमंडल को अपने सदस्यों को वेतन और भत्ते देने का अधिकार देता है, लेकिन इसमें पेंशन या रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले लाभों का स्पष्ट रूप से कोई जिक्र नहीं है।

याचिका में अन्य राहतों के अलावा, पूर्व विधायकों और एमएलसी और उनके जीवनसाथी को पेंशन और पारिवारिक पेंशन का भुगतान रोकने, कथित तौर पर गैर-कानूनी प्रावधानों के तहत हुए खर्च की वसूली करने और वेतन-भत्तों में बदलाव की सिफारिश करने के लिए एक स्वतंत्र व्यवस्था बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है।

इससे पहले, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 13 मई को दिए अपने फैसले में पीआईएल को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि जिन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, वे राज्य विधानमंडल के विधायी अधिकार क्षेत्र में आते हैं और किसी भी संवैधानिक सीमा का उल्लंघन नहीं करते हैं।

जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की डिवीजन बेंच ने कहा था कि अनुच्छेद 195 और सातवीं अनुसूची की सूची II की एंट्री 38 को मिलाकर पढ़ने पर राज्य विधानमंडल को अपने सदस्यों को विभिन्न भत्ते देने का अधिकार मिलता है।

हाई कोर्ट ने ‘लोक प्रहरी बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें संसद सदस्यों के लिए पेंशन और अन्य लाभों से जुड़ी ऐसी ही चुनौतियों पर विचार किया गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि लिस्ट I की एंट्री 73 में “अलाउंस” (भत्ते) शब्द का दायरा इतना बड़ा है कि इसमें सांसदों और पूर्व सांसदों के लिए पेंशन और अन्य लाभ शामिल हो सकते हैं।

कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि पेंशन केवल सरकारी कर्मचारियों को ही दी जा सकती है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की उस बात का हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि राज्य द्वारा दिए जाने वाले भुगतान की कई श्रेणियां हैं जिन्हें पेंशन कहा जाता है, जैसे बुढ़ापा पेंशन, विधवा पेंशन और विकलांगता पेंशन।

हाई कोर्ट ने गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान हाई कोर्ट के उन फैसलों पर भी ध्यान दिया जिनमें विधायकों के लिए पेंशन लाभ को सही ठहराया गया था। कोर्ट ने माना कि पेंशन और भत्तों की राशि तय करना मुख्य रूप से विधायी नीति का मामला है और अदालतें केवल इसलिए दखल नहीं दे सकतीं कि वे ऐसे लाभों के पीछे की नीति से सहमत नहीं हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, “लाभों की राशि तय करना पूरी तरह से विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा केवल तभी की जा सकती है जब कोई स्पष्ट मनमानापन, अनुचितता या संविधान का स्पष्ट उल्लंघन हो। यह मानते हुए कि चुनौती मुख्य रूप से नीतिगत असहमति पर आधारित थी, न कि किसी साबित हो सकने वाली संवैधानिक कमी पर, हाई कोर्ट ने जनहित याचिका को खारिज कर दिया।

–आईएएनएस

एएसएच/डीकेपी

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IANS Agency

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