त्रिपुरा सरकार ने सरकारी नौकरियों से हटाई पीआरटीसी की अनिवार्यता, विपक्ष ने वापस लेने की मांग की

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अगरतला, 16 अगस्त (आईएएनएस)। त्रिपुरा सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए स्थायी निवासी प्रमाणपत्र यानी पीआरटीसी की अनिवार्यता को खत्म करने के फैसले से राज्य में विवाद खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों और कई आदिवासी संगठनों ने इस फैसले को वापस लेने की मांग की है। राज्य के पर्यटन और परिवहन मंत्री तथा सरकार के प्रवक्ता सुशांत चौधरी ने कहा कि अब त्रिपुरा की सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को पीआरटीसी देना अनिवार्य नहीं होगा। इसके बजाय अभ्यर्थियों को यह साबित करना होगा कि उन्होंने राज्य के किसी भी स्कूल में लगातार पांच साल…

अगरतला, 16 अगस्त (आईएएनएस)। त्रिपुरा सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए स्थायी निवासी प्रमाणपत्र यानी पीआरटीसी की अनिवार्यता को खत्म करने के फैसले से राज्य में विवाद खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों और कई आदिवासी संगठनों ने इस फैसले को वापस लेने की मांग की है।

राज्य के पर्यटन और परिवहन मंत्री तथा सरकार के प्रवक्ता सुशांत चौधरी ने कहा कि अब त्रिपुरा की सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों को पीआरटीसी देना अनिवार्य नहीं होगा। इसके बजाय अभ्यर्थियों को यह साबित करना होगा कि उन्होंने राज्य के किसी भी स्कूल में लगातार पांच साल तक पढ़ाई की है।

चौधरी ने बताया कि यह निर्णय राज्य मंत्रिमंडल ने त्रिपुरा उच्च न्यायालय में एक दिल्ली निवासी द्वारा दायर याचिका और अदालत के निर्देशों के बाद लिया है। अदालत ने पीआरटीसी की अनिवार्यता के मुद्दे पर पुनर्विचार करने को कहा था।

सीपीएम और कांग्रेस समेत विपक्षी दलों और कई आदिवासी संगठनों ने सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध किया और नए प्रावधान को तुरंत वापस लेने की मांग की।

विपक्ष के नेता और सीपीएम के राज्य सचिव जितेंद्र चौधुरी ने कहा कि सरकारी नौकरियों से पीआरटीसी की अनिवार्यता हटने से अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए रास्ता खुल जाएगा। खासकर भाजपा शासित पश्चिम बंगाल, असम और बिहार के अभ्यर्थियों को इसका लाभ मिलेगा।

जितेंद्र चौधुरी, जो पूर्व मंत्री और लोकसभा सांसद भी हैं, ने कहा कि पिछली वाम मोर्चा सरकार ने त्रिपुरा के नौकरी चाहने वालों के हितों की रक्षा के लिए पीआरटीसी शुरू किया था। लेकिन 2018 में भाजपा सरकार बनने के बाद पीआरटीसी के प्रावधानों को अनौपचारिक रूप से ढीला कर दिया गया और पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और अन्य राज्यों के लोगों को सरकारी नौकरियां दी गईं।

उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार ने पहले ही सरकारी रोजगार के अवसर कम कर दिए हैं और पीआरटीसी पर ताजा फैसला त्रिपुरा के बेरोजगार युवाओं के हितों को और नुकसान पहुंचाएगा।

कांग्रेस नेता और अधिवक्ता राखू दास ने भी पीआरटीसी मुद्दे पर भाजपा सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इस फैसले से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा और अन्य राज्यों के लोग स्कूल प्रमाणपत्रों में हेरफेर कर त्रिपुरा की सरकारी नौकरियां हासिल कर लेंगे।

राखू दास, जो त्रिपुरा प्रदेश युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भी हैं, ने कहा कि स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए असम ने पहले ही राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी लागू किया है, जबकि कई पूर्वोत्तर राज्यों में इनर लाइन परमिट व्यवस्था है। लेकिन त्रिपुरा सरकार उल्टी दिशा में जा रही है और स्थानीय लोगों के हितों को नुकसान पहुंचा रही है।

एक अन्य कांग्रेस नेता ने पिछले सप्ताह अरुणाचल प्रदेश की भाजपा सरकार के फैसले का हवाला दिया। इसके तहत अरुणाचल प्रदेश में सरकारी नौकरी चाहने वाले अभ्यर्थी को भारतीय नागरिक होना चाहिए और सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध स्थायी निवास प्रमाणपत्र यानी पीआरसी होना चाहिए। अभ्यर्थी को अरुणाचल प्रदेश का मूल निवासी भी होना चाहिए और भारत सरकार द्वारा समय-समय पर संशोधित संविधान अनुसूचित जनजाति आदेश 1950 के तहत अधिसूचित जनजातियों की सूची के अनुसार अरुणाचल प्रदेश अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र यानी एपीएसटी प्रमाणपत्र भी होना चाहिए। इसके अलावा उसे अरुणाचल प्रदेश की किसी अधिसूचित आदिवासी भाषा बोलनी भी आनी चाहिए।

कांग्रेस नेता ने कहा कि असम में सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करते समय अभ्यर्थियों को तीन पीढ़ियों के निवास का अधिवास प्रमाणपत्र देना होता है।

विपक्षी नेताओं ने पड़ोसी पूर्वोत्तर राज्यों के विपरीत प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि त्रिपुरा को भी स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की रक्षा के लिए सुरक्षा उपाय बरकरार रखने चाहिए।

त्रिपुरा ट्राइबल एम्प्लॉइज एसोसिएशन, त्विप्रा स्टूडेंट्स फेडरेशन और कई अन्य संगठनों ने भी सरकारी नौकरियों के लिए पीआरटीसी की अनिवार्यता हटाने के राज्य सरकार के फैसले को वापस लेने की मांग की है।

संगठनों ने कहा कि मौजूदा प्रावधान स्थानीय नौकरी चाहने वालों के हितों की रक्षा के लिए था और इसे हटाने से राज्य के बाहर के अभ्यर्थियों से प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका है।

-आईएएनएस

डीएससी

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IANS Agency

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