केरल: विपक्ष के उप-नेता पद को लेकर सीपीआई और सीपीएम में खुली जंग, एलडीएफ संयोजक ने की संयम की अपील

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तिरुवनंतपुरम, 28 अगस्त (आईएएनएस)। केरल में विपक्ष के उप-नेता के पद को लेकर चल रहा विवाद अब बढ़ गया है। सीपीआई और सीपीआई-एम के नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी खुलेआम हो रही है, जिसके चलते एलडीएफ संयोजक टी.पी. रामकृष्णन को शुक्रवार को दखल देना पड़ा। उन्होंने संयम बरतने की अपील की और भरोसा दिलाया कि बातचीत के जरिए विवाद को सुलझाने की कोशिशें की जा रही हैं। रामकृष्णन ने कहा कि नेताओं को अपने सार्वजनिक बयानों में संयम बरतना चाहिए और गठबंधन के भीतर मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए। राजनीतिक हलकों में उनके दखल को बढ़ते विवाद…

तिरुवनंतपुरम, 28 अगस्त (आईएएनएस)। केरल में विपक्ष के उप-नेता के पद को लेकर चल रहा विवाद अब बढ़ गया है। सीपीआई और सीपीआई-एम के नेताओं के बीच तीखी बयानबाजी खुलेआम हो रही है, जिसके चलते एलडीएफ संयोजक टी.पी. रामकृष्णन को शुक्रवार को दखल देना पड़ा। उन्होंने संयम बरतने की अपील की और भरोसा दिलाया कि बातचीत के जरिए विवाद को सुलझाने की कोशिशें की जा रही हैं।

रामकृष्णन ने कहा कि नेताओं को अपने सार्वजनिक बयानों में संयम बरतना चाहिए और गठबंधन के भीतर मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाया जाना चाहिए।

राजनीतिक हलकों में उनके दखल को बढ़ते विवाद को रोकने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, जो सीपीआई-एम के लिए शर्मनाक हो सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि अगले महीने कोझिकोड में पार्टी की राज्य समिति की एक विस्तारित बैठक होने वाली है।

रामकृष्णन ने कहा, “समस्याओं को बातचीत के जरिए सुलझाना होगा। समाधान खोजने की कोशिशें जारी हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की पिछली टिप्पणियां गठबंधन द्वारा पहले ही लिए गए फैसले पर आधारित थीं, साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि सीपीआई-एम का आधिकारिक रुख पार्टी के राज्य सचिव द्वारा ही बताया जाना चाहिए।

इस विवाद की तत्काल वजह वामपंथी दलों की चुनावी हार के बाद सीपीआई की ओर से विपक्ष के उप-नेता का पद मांगने की मांग थी।

सीपीआई के राज्य सचिव बिनॉय विश्वम के सार्वजनिक बयान में कि उनकी पार्टी यह पद नहीं छोड़ेगी, को विजयन ने खारिज कर दिया, जिससे एक आंतरिक व्यवस्था का मामला अब सार्वजनिक टकराव में बदल गया है।

यह कड़वाहट अब सोशल मीडिया पर भी फैल गई है, जहां हमले को और तीखा बनाने के लिए सीपीआई के राजनीतिक इतिहास का जिक्र किया जा रहा है।

सोशल मीडिया पोस्ट में 1970 के दशक के उन उदाहरणों का जिक्र किया जा रहा है जब सीपीआई नेता कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे, जिससे दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच मौजूदा टकराव को एक ऐतिहासिक पहलू भी मिल गया है।

सीपीआई-एम को चिंता है कि लंबे समय तक चलने वाला टकराव राजनीतिक रूप से संवेदनशील समय में वामपंथ के भीतर की दरारों को और उजागर कर सकता है।

पार्टी पहले से ही अपनी सबसे बुरी चुनावी हार के नतीजों से जूझ रही है, जबकि विजयन की राजनीतिक साख को भी धक्का लगा है।

उनकी बेटी वीना की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा जांच ने पूर्व मुख्यमंत्री पर दबाव और बढ़ा दिया है।

इस पृष्ठभूमि में, रामकृष्णन के दखल को पीछे हटने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा सकता है, जिसका मकसद राज्य समिति की विस्तारित बैठक से पहले सीपीआई विवाद को बड़े राजनीतिक मुद्दे का रूप लेने से रोकना है।

सीपीआई-एम अपने सबसे पुराने सहयोगी के साथ सार्वजनिक बहस के एक और दौर से बचना चाहती है, खासकर तब जब पार्टी अभी तक चुनावी हार से पूरी तरह उबर नहीं पाई है, लेकिन उप-नेता के पद पर सीपीआई की जिद ने यह पक्का कर दिया है कि जो मुद्दा कभी बंद दरवाजों के पीछे सुलझाया जा सकता था, वह अब सबके सामने आ गया है।

–आईएएनएस

एससीएच/डीएससी

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IANS Agency

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