नई दिल्ली, 4 नवंबर (आईएएनएस)। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंड देने वाले कानूनों की प्रासंगिकता खत्म हो गई है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारत में प्रजनन दर लगातार घट रही है। ऐसे में इन कानूनों का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है। इनकी फिर से समीक्षा की जरूरत है।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव की अयोग्यता को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की, जिन्हें तीसरा बच्चा होने के कारण चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किया गया था।
अपनी टिप्पणी में कोर्ट ने कहा, “पिछले दो दशकों में भारत की जनसांख्यिकीय स्थिति में बड़ा बदलाव आया है। पिछले कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण जनसंख्या विस्फोट का डर अब नहीं रहा। इसका प्रमाण यह है कि प्रजनन दर 3 से घटकर 1.9 पर आ गई है। इसलिए, दो से अधिक बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून, मौजूदा हालात में शायद अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं।”
इसलिए, अदालत ने महाराष्ट्र के एक कानून के तहत पूर्व सरपंच मंगला भीमराव के खिलाफ चल रही कार्यवाही पर रोक लगा दी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा सरकार मामले में दिए गए फैसले को आगे समीक्षा के बड़ी बेंच के पास भेज दिया। उस फैसले में तीन जजों की पीठ ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को सही ठहराया था, जिसके तहत दो से अधिक जीवित बच्चे होने पर व्यक्ति पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकता था।
कोर्ट ने बताया कि जब ‘जावेद’ मामले में फैसला आया था, तब भारत की कुल प्रजनन दर लगभग तीन बच्चे प्रति महिला थी, जिससे जनसंख्या नियंत्रण एक अहम नीतिगत मुद्दा बन गया था। हालांकि, तब से जनसांख्यिकीय संकेतकों में काफी बदलाव आया है और पूरे देश में प्रजनन दर लगातार घट रही है।
— आईएएनएस
डीसीएच/
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