आईआईटी मद्रास ने शुरू की हाईटेक मरीन रिसर्च, और शक्तिशाली बनेंगे भारतीय युद्धपोत

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नई दिल्ली, 25 मई (आईएएनएस) भारत अपनी समुद्री ताकत को लगातार मजबूत कर रहा है। इसी मिशन को नई गति देते हुए आईआईटी मद्रास ने मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के साथ मिलकर एक नई पहल की है। इसके अंतर्गत एक ऐसी अत्याधुनिक रिसर्च सुविधा शुरू की है, जो भारतीय जहाजों, पनडुब्बियों और नौसैनिक तकनीक को और ज्यादा शक्तिशाली, सुरक्षित व आधुनिक बनाएगी। दरअसल मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स देश की एक प्रमुख युद्धपोत निर्माण कंपनी है। यह अब तक 33 युद्धपोत व 8 पनडुब्बियां बना चुकी हैं। आईआईटी मद्रास ने मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स की मदद से 4.5 करोड़ रुपए की लागत वाली…

नई दिल्ली, 25 मई (आईएएनएस) भारत अपनी समुद्री ताकत को लगातार मजबूत कर रहा है। इसी मिशन को नई गति देते हुए आईआईटी मद्रास ने मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के साथ मिलकर एक नई पहल की है। इसके अंतर्गत एक ऐसी अत्याधुनिक रिसर्च सुविधा शुरू की है, जो भारतीय जहाजों, पनडुब्बियों और नौसैनिक तकनीक को और ज्यादा शक्तिशाली, सुरक्षित व आधुनिक बनाएगी।

दरअसल मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स देश की एक प्रमुख युद्धपोत निर्माण कंपनी है। यह अब तक 33 युद्धपोत व 8 पनडुब्बियां बना चुकी हैं। आईआईटी मद्रास ने मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स की मदद से 4.5 करोड़ रुपए की लागत वाली यह हाईटेक ‘सर्कुलेटिंग वॉटर टनल फैसिलिटी’ विकसित की है। यह समुद्री रिसर्च व स्वदेशी तकनीक विकास का नया केंद्र बनने जा रही है। यह सुविधा आईआईटी मद्रास के ‘डिस्कवरी’ सैटेलाइट कैंपस में स्थापित की गई है और अब पूरी तरह संचालन में आ चुकी है।

यह केवल एक साधारण रिसर्च लैब नहीं, बल्कि समुद्री इंजीनियरिंग की ऐसी हाईटेक प्रयोगशाला है जहां वैज्ञानिक नियंत्रित जल और वायु प्रवाह के जरिए जहाजों, प्रोपेलर, समुद्री वाहनों और पानी के भीतर काम करने वाली संरचनाओं का व्यवहार समझ सकेंगे। यहां परीक्षणों के माध्यम से यह जाना जाएगा कि तेज धाराओं, समुद्री दबाव और कठिन परिस्थितियों में जहाज और उपकरण किस तरह प्रदर्शन करते हैं।

इस सुविधा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह भारत में स्वदेशी समुद्री तकनीक विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाएगी। अब कई महत्वपूर्ण परीक्षणों और रिसर्च के लिए विदेशी संस्थानों पर निर्भरता कम हो सकेगी। इससे रक्षा क्षेत्र, जहाज निर्माण उद्योग और समुद्री अनुसंधान को सीधा लाभ मिलेगा। आईआईटी मद्रास के डीन प्रो. अश्विन महालिंगम के मुताबिक मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के साथ यह साझेदारी ओशन इंजीनियरिंग और उससे जुड़े क्षेत्रों में रिसर्च को नई दिशा देगी। उनके अनुसार इस सुविधा से छात्रों, वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं को विश्वस्तरीय प्रयोग और प्रशिक्षण का अवसर मिलेगा।

उन्होंने बताया कि यहां जहाजों के मॉडल, प्रोपेलर, ब्लफ बॉडी, समुद्री वाहन, ऑफशोर सिस्टम और अंडरवॉटर स्ट्रक्चर पर उन्नत अध्ययन किए जा सकेंगे। मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स के सीएमडी कैप्टन जगमोहन ने कहा कि भारत की समुद्री शक्ति को मजबूत बनाने के लिए रिसर्च, नवाचार और अकादमिक संस्थानों के साथ साझेदारी बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह सुविधा भविष्य की नौसैनिक तकनीकों को विकसित करने और आत्मनिर्भर भारत मिशन को गति देने में अहम भूमिका निभाएगी।

मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड अब तक 808 से अधिक पोत तैयार कर चुकी है। इनमें 33 युद्धपोत और 8 पनडुब्बियां शामिल हैं। अत्याधुनिक डेस्ट्रॉयर, मिसाइल बोट और ऑफशोर स्ट्रक्चर के निर्माण में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नई सुविधा से न केवल रक्षा क्षेत्र बल्कि समुद्री परिवहन, ऑफशोर ऊर्जा परियोजनाओं और समुद्री संरचनाओं के विकास को भी मजबूती मिलेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारतीय समुद्री उद्योग में नई तकनीकों और नवाचारों का रास्ता खुलेगा।

आईआईटी मद्रास और मझगांव डॉक भविष्य में कई और बड़े संयुक्त प्रोजेक्ट्स पर भी काम करने की तैयारी कर रहे हैं। इनमें सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना ‘हाइड्रा सेंटर’ मानी जा रही है, जिसमें 500 मीटर लंबा विशाल टोइंग टैंक बनाया जाएगा। इस टैंक में बड़े जहाजों और समुद्री प्रणालियों का अत्याधुनिक परीक्षण किया जा सकेगा। इसके अलावा दोनों संस्थान नौसेना की पनडुब्बियों और छोटे समुद्री जहाजों के लिए स्वदेशी हाई-एफिशिएंसी मल्टीस्टेज थर्मोइलेक्ट्रिक सब-जीरो रेफ्रिजरेशन सिस्टम विकसित करने पर भी काम करने की योजना बना रहे हैं।

यह तकनीक भविष्य में भारतीय नौसेना की परिचालन क्षमता को और अधिक मजबूत कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई सुविधा केवल एक रिसर्च प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत को समुद्री विज्ञान, जहाज निर्माण और नौसैनिक तकनीक में वैश्विक ताकत बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

–आईएएनएस

जीसीबी/पीएम

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